रामभक्त श्रीहनुमान

रामभक्त श्रीहनुमान

भगवान् श्रीराम सम्पूर्ण विश्व के लिये महान् आदर्श हैं और भक्तों के लिये तो वे सर्वस्व ही हैं। मर्यादा-पुरूषोत्तम भगवान् श्रीराम के अत्यन्त प्रिय हैं- पवनपुत्र श्रीहनुमान्जी। ये अपने प्राणाराध्य के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते, इसी कारण जहाँ-जहाँ भगवान् श्रीसीता-रामजी के मन्दिर एवं श्रीविग्रह हैं, वहीं श्रीमहावीर जी भी सेवक रूप में दर्शन देते हैं। विद्या, बुद्धि, बल, तेज, वीरता, पराक्रम, सेवा एवं भक्ति के मुर्तस्वरूप तथा नैष्ठिक ब्रह्मचर्य के अद्भुत आदर्श श्रीहनुमान्जी के प्रति उनके भक्तों तथा साधकों की अत्यधिक निष्ठा एवं अपार श्रद्धा है। ये भक्तजनों के प्रेरणास्त्रोत होने के साथ ही उनके गुरू भी हैं। इनकी कृपा से भक्त को भगवान् मिलते हैं। इसीलिये सर्वत्र श्रीहनुमान्जी के मन्दिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहती है। भाग्यशाली उपासकों को भगवान् श्रीमहावीर अपना प्रत्यक्ष दर्शन देकर उनका कल्याण करते हैं।

श्री हनुमान चालीसा तो भक्तों के लिये संजीवनी की तरह है। श्री हनुमान चालीसा के पाठ द्वारा तो लाखों भक्त प्रतिदिन न केवल अपने जीवन की समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हैं, अपितु प्रचूर मात्रा में मनोबल भी प्राप्त करते हैं। वास्तव में संत श्रीतुलसी दास जी ने इसकी रचना कर मानव जाति पर बहुत बडा उपकार किया है।

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।

हनुमानचालीसा अत्यन्त सरल और सर्वत्र प्रचलित है। इस चालीसा के गठन में संत तुलसीदास जी ने कितनी सावधानी बरती है, इसका एक दृष्टिकोण आप के समक्ष प्रस्तुत है- ‘मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा’

श्रीमहावीरजी के दो प्रमुख गुण हैं- पहला अपनी प्रंशसा अथवा बड़ाई की ओर न ध्यान देना और न सुनना। दूसरा राम-कथा एवं प्रभु-चर्चा जहाँ भी हो वहाँ उपस्थित रहना। अब विचारणीय यह है कि जो अपनी प्रंशसा सुनना न चाहे उसके प्रति चालीसा अथवा चालीस चौपाई वन्दना के रूप में किस प्रकार कही जायँ? हनुमान्जी के अमानी होने का प्रमाण रामायण में द्रष्टव्य है-

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा।।

श्रीजाम्बवंत ने हनुमान्जी के समक्ष ही उनके गुण बताये, पर उन्होंने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। परतु जब जाम्बवंत जी ने उनसे कहा कि तुम्हारा अवतार ही रामकाज के लिये हुआ है तब वे तुरंत समुद्र लाँघने के लिये उद्यत हो गये और अपना शरीर पर्वत के समान बड़ा कर लिया।
ऐसे देवता की किस प्रकार स्तुति की जाये? फिर यह भी आवश्यक है कि उस देवता के आवाहन किये बिना उसकी स्तुति कैसे हो? श्रीमारूतनन्दन अन्य देवताओं की भाँति अपनी प्रशंसा सुनने पर नहीं पधारते हैं। उनके आवाहन का मंत्र अथवा पद्धति संत श्रीतुलसीदास को पूर्णतया ज्ञात थी, अतः हनुमान चालीसा का पहला दोहा हनुमान्जी के प्रति न होकर श्रीरामजी के प्रति है, जिसे सुनकर श्रीमारूतनन्दन निश्चित ही आ जाते हैं। यह विख्यात दोहा अयोध्याकाण्ड के आरम्भ में आया है-

श्रीगुरू चरन सरोज रज निज मनु मुकुरू सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।

इस दोहे को सुनने के बाद कोई संशय नहीं रह जाता कि श्रीराम कथा प्रारम्भ होने वाली है। बस, श्रीमहावीरजी तुरंत विराजमान हो जाते हैं और वहाँ शान्तिपूर्वक बैठ जाते हैं, इसलिये कि पूरी कथा जो सुननी है। अब संत श्रीतुलसीदास उनके ही सामने हनुमान चालीसा प्रारम्भ कर देते हैं, परंतु कवि की कुशलता तो देखिये कि वे श्रीमारूतनन्दन को चालीसा के अन्त तक बिठाये रखते हैं। उनका मन उचटने नहीं देते। उनके इष्टदेव श्रीराम का सम्बन्ध लेकर वे अपनी प्रशंसा सुनने को विवश हो जाते हैं; क्योंकि उनके इष्टदेव की महिमा और कृपा भी उसमें ग्रथित हुई है-

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहुमोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।।

यह मात्र हनुमान्जी की प्रशंसा एवं प्रार्थना है। इससे जब उनका मन उचटने लगा तब संत तुलसीदास ने उनके चित्त को स्थिर करने के लिये कहा-

राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

हनुमान्जी तुरंत प्रसन्न हो गये। उन्हें रामदूत की उपाधि मिल गयी, इससे अधिक और क्या चाहिये। दूसरी उपाधि अतुलित बल धामा की मिली। महावीरजी स्वयं बली न होकर अपने इष्टदेव के बल के धाम हैं। जो भी वे हैं वह अपने प्रभु का बल और कृपा हैं। फिर गोसाईंजी कहते हैं-

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै।।
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर।

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