
इस लेख के माध्यम से मैं केवल आपके ही नहीं, आपके समस्त परिवार के लिये एक ऐसी महत्तवपूर्ण सुखद् साधना का रहस्योद्घाटन करने जा रहा हूँ, जो अपने आप में दुर्लभ और अद्वितीय है-
विश्वास करना मैं एक सच्ची घटना पर आधारित बात बता रहा हूँ, बात उन गर्मीयों की है, जब में कुछ दिन के लिये के लिये देहरादून-मसूरी भ्रमण पर था। उन दिनों कुछ दिन में देहरादून में अस्थायी निवास किये हुये था। एक दिन साधुवेश में एक सज्जन मुझसे मिलने आये, वे आये तो थे अपनी हस्तरेखा दिखाने परंतु बातों ही बातों में बहुत ही गहरी और विचित्र कथा सुनाने लगे। वास्तव में उनके आने का उद्देश्य हस्तरेखा दिखाना था ही नहीं। वे जब अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाने लगे तब मेरी रूची भी उनमें गहरी होने लगी, और मैं भी उनकी उस कथा में लगा अपना स्वार्थ ढूढने। उस साधु की पूर्वजन्म की कथा इस प्रकार थी-
पूर्वजन्म के मेरे पिताजी सही अर्थो में एक महान तांत्रिक थे, और भारत के समृद्ध राज्य पंजाब में एक नगर के कुल पुरोहित थे। उस नगर का इतिहास ही ऐसा था कि उस नगर के महाराजा की तीन पीढ़ियों को तंत्र और राजनीति का गहन ज्ञान विरासत में मिला था। फिर भी उनके अनेक प्रयोजन सिद्ध करने का उत्तरदायित्व मेरे पिता का ही था।
उस नगर के महाराजा ने मेरे पिताजी को, जब वे चौदह साल के थे, तो उन्हें बंगाल में रहने वाले एक विख्यात तांत्रिक के पास भेजा था, उस समय वे तांत्रिक पूरे भारत-वर्ष में विख्यात् थे। अंग्रेजों ने भी उन्हें सम्मान देते हुये विशेष उपहार प्रदान किये थे। जब वे प्रसिद्ध तांत्रिक अपने गुरूदेव के आश्रम (बनारस) से आये थे तो उन्होंने उस क्षेत्र के तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर के सामने जल पर सहज चलने और आकाश में शरीर को उड़ाकर दिखाने की क्रिया प्रत्यक्ष करके दिखाई थी, उस समय बनारस के उनके गुरूदेव ने कहा था कि मेरे इस शिष्य के पास अचरज भरा व्यक्तित्व है, जो भी असंभव कार्य हो, जिसे कोई बडे से बडा योगी या तांत्रिक भी नहीं कर सकता हो, उस कार्य को मेरा यह शिष्य कर देता है।
वे तांत्रिक स्वामी स्वर्ण विज्ञान के भी सिद्धहस्त आचार्य थे, उन्होंने बनारस में ही अनेक विद्वानों के सामने पारद से स्वर्ण बनाकर दिखा दिया था कि वेदकालीन स्वर्ण विज्ञान की कला अभी जीवित है। उस समय के अनेक विद्वानों ने भी बंगाल के उन तांत्रिक स्वामी की प्रशंसा की थी। मेरे पिता जी का सौभाग्य था की उस समय के तंत्र क्षेत्र के एक मात्र सिद्ध आचार्य से उन्होंने अनेक विद्यायें सीखी थी। ऐसे तेजस्वी तांत्रिक स्वामी जी के सान्ध्यि में रहने का अवसर मेरे पिताजी को मिला था। अनेक विद्याओं में सिद्धहस्थ होकर पिताजी जब महाराजा की आज्ञा से अपने नगर लौट आये थे, और वहाँ उन्होंने पूरे 26 वर्ष लगातार अलौकिक शक्तियों की साधनायें सम्पन्न की थी। उन्होंने पूरा जीवन उस ज्ञान तथा सिद्धियों का भरपूर लाभ राजपरिवार को दिया था। मुझे यह भी ज्ञात है कि पूर्वजन्म के मेरे पिताजी की मृत्यु 108 वर्ष की अवस्था में हुई और उस समय भी वे पूर्ण स्वस्थ एवं निरोगी थे।
मुझे स्मरण है कि अंत समय में पिताजी ने मुझसे कहा था- संसार की सर्वाधिक तेजस्वी और अदभुत साधनाओं में से एक साधना चौसठ योगिनियों की शक्ति साधना है। यह एक ऐसी सुखद् साधना है, जिसे योगी तो कर ही सकता है इस के अतिरिक्त गृहस्थ जीवन के लिये भी यह साधना वरदान स्वरूप है, वास्तव में यह साधना है ही केवल गृहस्थ जीवन का पूर्ण आनन्द लेने के लिये। इस लिये जो साधक पूर्ण गृहस्थ सुख चाहते हैं उनके लिये यह साधना फलदायक और कामधेनु के समान अमृतमयी है।
यह साधना केवल तीन दिन की साधना है, वर्ष में केवल एक ही अवसर पर की जा सकती है, इस साधना को सम्पन्न करने के लिये सर्वोत्तम मुहूर्त मेष राशि में सूर्य की संक्रांति का अवसर (बैशाखी पर्व) है। अर्थात् जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश कर रहा हो तब इस साधना को प्रारम्भ करना चाहिये। मात्र तीन दिनों में ही यह साधना सम्पन्न हो जाती है। इस वर्ष 2012 में यह पर्व 13 अप्रैल के दिन है। इस दिन दोपहर के बाद सांयकाल से ही इस साधना की सिद्धि आरम्भ की जानी चाहिये। इस साधना से पूरी चौंसठ योगिनी शक्तियाँ एक साथ सिद्ध हो जाती हैं, और साधक शून्य में देखकर किसी भी स्थान पर घटित होने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं को चलचित्र की भाँती देख सकता है।
वस्तुतः वे जिस साधना की चर्चा कर रहे थे वे चौसठ योगिनीयों की एक महत्वपूर्ण साधना थी, जिसकी चर्चा स्कन्दपुराण में इस प्रकार मिलती है- काशी में चौसट्टीघाट पर चतुष्षष्टि देवी के मन्दिर में इन चौंसठ देवियों के पूजन से सम्यक् फल की प्राप्ति होती है। ये काशी में नित्य निवास करती हैं। एक दिन के लिये भी ये काशी का परित्याग नहीं करती। घूमने के लिये तीनों लोको में अवश्य जाती हैं, किंतु काशी के अतिरिक्त और कहीं निवास नहीं करतीं। स्कन्दपुराण (45।23)।
काशी से तो इनका सदा से ही लगाव रहा है। इनका काशी में इतना गहरा अनुराग है कि जब भगवान् विश्वनाथ ने इनको काशी भेजा तो ये बहुत प्रसन्न हुईं, क्योंकि काशी के दर्शनों के लिये ये पहले से ही उत्कण्ठित थीं। काशी आने में इनको देर कितनी लगती। दूर से ही इन्होंने आँखे फैलाकर काशी को देखा और बहुत प्रसन्न हुईं तथा अपनी आँखो की उपलब्धि को धन्य माना। इन्होने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों की इसलिये प्रशंसा की कि बड़ी होने के नाते काशी को ये इच्छा भर देख पायीं (45।1)।
इन मातृयोगिनियों का काशी निवासियों से भी बहुत प्रेम है, इसलिये शास्त्रों में आदेश दिया गया है कि काशी के निवासी वर्ष में एक बार चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को माताओं का दर्शन अवश्य किया करें। कहा तो यह भी गया है कि इनके केवल नाम स्मरण मात्र से ही मनुष्य विघ्नों से पीड़ित नहीं होता।
चैत्रकृष्णप्रतिपदि तत्र यात्रा प्रयत्नतः। क्षेत्रविघ्नप्रशान्त्यर्थं कर्तव्या पुण्यकृज्जनैः।। मेरा कोई शिष्य भी यदि चाहे तो तीन रात्रि की इस साधना को सम्पन्न कर इससे संबंधित पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकता है। इस साधना से किसी भी प्रकार का भय व्याप्त नहीं होता, वैसे तो ये 64 शक्तियाँ प्रत्येक साधारण मनुष्य के आस-पास ही रहती हैं परंतु वे उन्हें न तो देख पाता है और न ही पहचान पाता है। परंतु साधक की साधना से यह उसकी सहायक होकर उसे मार्गदर्शन भी करने लगती हैं।
चौसठ योगिनी शक्तियाँ-
यहाँ स्कन्दपुराण के काशीखण्डोक्त मातृकाओं के चौंसठ नाम दिये जाते हैं-
1-गजानना, 2-सिंहमुखी, 3-गृध्रास्या, 4-काकतुण्डिका, 5-उष्ट्रग्रीवा, 6-हयग्रीवा, 7-वाराही, 8-शरभानना, 9-उलूकिका, 10-शिवारावा, 11-मयूरी, 12-विकटानना, 13-अष्टवक्त्रा, 14-कोटराक्षी, 15-कुब्जा, 16-विकटलोचना, 17-शुष्कोदरी, 18-ललज्जिह्वा, 19-अश्वदंष्ट्रा, 20-वानरानना, 21-ऋक्षाक्षी, 22-केकराक्षी, 23-बृहत्तुण्डा, 24-सुराप्रिया, 25-कपालहस्ता, 26-रक्ताक्षी, 27-शुकी, 28-श्येनी, 29-कपोतिका, 30-पाशहस्ता, 31-दण्डहस्ता, 32-प्रचण्डा, 33-चण्डविक्रमा, 34-शिशुघ्नी, 35-पापहन्त्री, 36- कालीरूधिरपायिनी, 37-वसांधया, 38-गर्भभक्षा, 39-शवहस्ता, 40-अन्त्रमालिनी, 41-स्थूलकेशी, 42-बृहत्कुक्षिणी, 43-सर्पास्या, 44-प्रेतवाहना, 45-दन्दशूककरा, 46-क्रौचीं, 47-मृगशीर्षा, 48-वृषानना, 49-व्यात्तास्या, 50-धूमनिःश्वासा, 51-व्योमैकचरणा, 52-ऊर्ध्वदृक्, 53-तापनी, 54-शोषणीदृष्टि, 55-कोटरी, 56-स्थूलनासिका, 57-विद्युत्प्रभा, 58-बलाकास्या, 59-मार्जारी, 60-कटपूतना, 61-अट्टाट्टहासा, 62-कामाक्षी, 63-मृगाक्षी और 64-मृगलोचना।
साधना सामग्री-
इस साधना के लिये केवल एक थाली में 1 तांत्रोक्त नारियल और भोजपत्र पर निर्मित चौसठिया यंत्र स्थापित कर उनकी पूजा कर सिद्ध शक्ति माला से मंत्र जप प्रारम्भ कर देना चाहिये, उपरोक्त दो महत्वपूर्ण पूजा सामग्रीयाँ अर्थात् ‘तांत्रोक्त नारियल’ तथा ‘चौसठिया यंत्र’ एवं इसके साथ ही साथ ‘सिद्ध शक्ति माला’ की आवश्यकता भी अवश्य होती है।
साधना प्रयोग-
मेष संक्रांति के दिन साधक स्नान कर रात्रि में उत्तर दिशा की ओर मुंह कर लाल आसन पर बैठ जाये और स्वयं लाल धोती धारण कर लें। सर्वप्रथम आग्नेय (दक्षिण पूर्व) कोण की एक चौंसठ कोष्ठ वाली वेदी में सभी चौंसठ देवियों की स्थापना कर आवाहन पूर्वक नाम मंत्रों से उनका पंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। सर्वप्रथम वेदी के पूर्व भाग में दक्षिण से उत्तर की ओर तीन कलशों में महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती की स्थापना कर उनकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार इन 64 योगिनी मातृ शक्तियों के अनुग्रह से गृहस्थों के सभी दुःखों का विनाश, अभय प्राप्ति एवं सर्वविध कल्याण होता है।
सामने किसी पात्र में ‘सिद्ध चौसठिया यंत्र’ और ‘तांत्रोक्त नारियल’ स्थापित कर दें और मीठे तेल के नौ दीपक लगा दें, फिर चौसठ योगिनी शक्तियों के नाम ले कर उस यंत्र पर अक्षत् (चावल) चढ़ावें पुष्प समर्पित करें। सभी चौसठ योगिनी शक्तियों के नाम से अक्षत, पुष्प चढ़ा कर फिर साधक एकाग्र मन से दीपक की लौ पर नजर रखते हुये निम्न मंत्र की 51 माला प्रतिदिन (3 रात्रि) जप करे, यह मंत्र जप केवल ‘सिद्ध शक्ति माला’ से ही सम्पन्न होना चाहिये, और मंत्र जप होने के बाद दिन भर साधक उस माला को अपने गले में धारण किये रहे। तीसरे दिन मंत्र जप पूरा होते ही देवियाँ पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करती हुई जीवन भर उसके लिये सहायक बनी रहती हैं।
मंत्र- हृं क्रीं शक्ति स्वरूपपायै क्रीं हृं।
वास्तव में अपने आप में यह एक महत्वपूर्ण और अद्वितीय साधना है, जो उस साधु महाराज के पूर्वजन्म की एक विशेष उपलब्धि है। मैं समझता हूँ कि इस साधना की गोपनीय पद्धति को प्रकाशित करने की आज्ञा देकर उन्होंने साधक वर्ग पर एक बहुत बडा उपकार किया है। यह एक साधना ही किसी साधक को जीवन में आर्थिक समृद्धि तथा सम्मान के लिये पर्याप्त है।
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