ज्योतिष की पाठशाला

ज्योतिष की पाठशाला

मंगल – मंगल मेष तथा वृश्चिक दो राशियों तथा दक्षिण दिशा का स्वामी है। यह पुरूष ग्रह है, अग्नितत्व है, मध्य में कृश है अर्थात उसकी पतली कमर है। उसकी दृष्टि में क्रूरता है और स्वभाव में उग्रता है। यह पित्त प्रधान ग्रह है। यह स्वभाव से प्रचण्ड है किन्तु अति उदार है, भाई-बहनों का कारक है, शरीर में यह वीरता, हिंसा, बल, शस्त्र, युद्धकला सम्बन्धी विषय वस्तुओं का व पराक्रम, रक्त के लाल कण तथा शरीर के मज्जा भाग पर इसका विशेष अधिकार है। (इसका आशय यह हुआ कि जिसकी जन्मकुण्डली में मंगल बलवान है उसके शरीर की मज्जा बलवान होगी, जिसका मंगल निर्बल है उसकी मज्जा निर्बल होगी) यह शक्ति का प्रतीक है। ग्रहों में इसे सेनापति का दर्जा प्राप्त है। शरीर में यह मांस तथा रक्त की लालिमा का कारक है। इसकी जाति क्षत्रिय और युवावस्था बताई गई है। यह नैसर्गिक पाप ग्रह माना गया है।

मंगल के मुख का रंग रक्त जैसा लाल है। उसके सिर के केश घुंघराले और चमकीले हैं, लाल वस्त्र धारण किये हुए और इसके शरीर का वर्ण भी लाल ही है। दशम भाव में इसकी स्थिति उत्तम मानी गई है, क्योंकि दशम भाव में मंगल दिग्बली होता है।

आधुनिक कारक तत्त्वों में सुवर्ण, ताँबा आदि धातु पर तथा प्रवाल रत्न पर इसका विशेष अधिकार है। सर्विस में- सेना, पुलिस की नौकरी या किसी भी सिक्योर्टी सर्विस सें अथवा होटल, रैस्टोरेंट, इलैक्ट्रोनिक्स अथवा इलैक्ट्रिक वस्तुओं के कार्य से या अग्नि सम्बंधी कार्य जैसे फर्निश इत्यादि अथवा आतिशबाजी या विनाशक अस्त्र-शस्त्र, हिंसा आदि ऐसा व्यवसाय जिसमें साहस की आवश्यकता हो, सरकस, स्टन्ट आदि कार्य। लूट, हिंसा आदि का भी मंगल से सम्बंध है। मंगल का सम्बंध सूर्य-बुध तथा दशम भाव से हो तो, ऐसा मंगल सर्जन बनाता है। भारतीय ज्योतिष में मंगल को तृतीय तथा षष्ठ भाव का स्थिर कारक कहा गया है।

बुध- बुध मिथुन तथा कन्या राशि तथा उत्तर दिशा का स्वामी है। यह नपुसंक ग्रह है, यह पृथ्वी तत्व का ग्रह है। इसकी सुन्दर देह है, यह हास्य, प्रिय, मधुर भाषा बोलने वाला, वाक्चातुर्य युक्त, स्पष्ट वक्ता है, इसे वाँणी, मामा तथा चमड़ी का कारक कहा गया है। ग्रहों में इसे युवराज का दर्जा दिया गया है, बुध के शरीर की कांति नवीन दूब के समान है। इसमें वात, पित्त, कफ, त्रिदोषों का सम्मिश्रण है। इसका आशय यह है कि- जन्मकुण्डली में बुध यदि पीड़ित हो तो अपनी दशा-अन्तर्दशा में वात- पित्त व कफ तीनों से उत्पन्न रोग उत्पन्न करता है। बुध का अधिकार तंत्रिका-तंत्र (शरीर में जो स्नायुमंडल है, जिसे अंग्रेजी में निर्वस सिस्टम कहते हैं) पर है। यदि बुध पीड़ित हो तो नर्वस सिस्टम में खराबी होगी। इसके शरीर के अंग बराबर हैं अर्थात सुडौल हैं। जो जितना बड़ा होना चाहिए वह अंग वैसा ही है। जिन स्त्रियों या पुरुषों की कुण्डलियों में बुध चन्द्रमा से युक्त होता है वे मजाक पसंद होते हैं। जिस प्रकार मंगल में मज्जा प्रधान है इसी प्रकार बुध त्वचा प्रधान है। त्वचा शरीर के सबसे ऊपर की चमडी को कहते हैं। बुध अच्छा होने से त्वचा सुंदर व कोमल होती है, बुध के पाप ग्रह से पीडित होने पर त्वचा (चमड़ी) के रोग होंगे। बुध के नेत्र लम्बाई लिये हैं और वह हरे वस्त्र धारण करता है।

आधुनिक कारक तत्त्वों में कांसा धातु तथा पन्ना रत्न पर बुध का विशेष अधिकार है। कागज, लेखन, प्रकाशन, पत्रकारिता, दुतावास, गुप्तचर विभाग, औषधी निमार्ण, वकालत इत्यादि पर इसका विशेष अधिकार है। यह वैश्य वर्ग का ग्रह होने के कारण कुशल व्यापारी बनाता है। गणित में कुशल शेयर इक्नॉमी का ज्ञाता, तथा अच्छा ज्योतिषी भी बनाता है।

भारतीय ज्योतिष में इसे नपुसक ग्रह कहा गया है। यह कुण्डली में दशम भाव का स्थिर कारक भी है। इस ग्रह को नैसर्गिक नपुंसक ग्रह मानते हैं, यह जिस शुभाशुभ ग्रह के साथ बैठ जाता है वैसा ही शुभाशुभ फल देने लग जाता है। यदि बुध शुभ स्थान का स्वामी होकर और बलवान होकर शुभ स्थान में हो तो अत्यंत शुभ फल देता है। यदि अशुभ तथा निर्बल होकर अशुभ स्थान में हो अथवा अशुभ स्थान के स्वामीयों या ग्रहों से सम्बंध बना रहा हो तो पाप फल भी देता है।

बृहस्पति – बृहस्पति धनु तथा मीन राशि तथा ईशान (पूर्वोत्तर) दिशा का स्वामी है। यह पुरूष ग्रह है, आकाश तत्व है। बृहस्पति की वाँणी शेर या शंख की भांति गंभीर है। बृहस्पति प्रधान जातक ऊँचे कद का अर्थात् यह विशाल देह तथा शरीर में स्थूलता (मोटापा) लिये होता है क्योंकि यह ग्रह चर्बी का कारक है। यह ज्ञान, सदगुण, संतान तथा स्त्रीयों के लिये पति का और सभी के लिये धन का कारक है। यह कफ प्रधान ग्रह है। इसकी जाति ब्राह्मण तथा देवता इन्द्र हैं। वैद्यक शास्त्र में कफ प्रकृति वालों में जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस व्यक्ति मे घटित होंगे जिसकी कुण्डली में बलवान बृहस्पति लग्न में होगा या बलवान होकर नवांश का स्वामी है। बृहस्पति बलवान होने से मनुष्य बहुत विद्वान होता है। श्रेष्ठ मति होना बृहस्पति का लक्षण है। इसीलिए इसे देवताओं का गुरु कहा गया है। यह धन प्रधान ग्रह है अर्थात् धन का कारक है। बृहस्पति यदि कुण्डली में अच्छा होगा तो मनुष्य धनी होगा। ग्रहों में इसे राजपुरोहित का पद प्राप्त है, ज्योतिष में इसे देवगुरू, ब्राह्मण वर्ण, ज्ञान का कारक ग्रह तथा नैसर्गिक शुभ ग्रह मानते हैं।

गुरू पीत वर्ण, विशाल देह, इसकी छाती पुष्ट है, पिंगल वर्ण के केश और नेत्र वाला। कफ, प्रकृति, सर्व शास्त्रों का ज्ञाता, पुष्ट छाती, वांणी सिंह या शंख की भाँति तथा सतोगुणी, आकाश तत्व प्रधान पुरूष ग्रह है। सदाचरण वाला, श्रुति, शास्त्र यज्ञ, तपस्या, मंगल कार्य, तीर्थ यात्रा, अध्ययन अध्यापन, का विचार इस ग्रह से करते हैं। शुभता प्रदान करने में यह प्रथम कोटि का शुभ ग्रह है। गोचर में जब बृहस्पति अनुकूल होगा तो धन दिलावेगा। जन्मस्थ बृहस्पति जब पापाक्रान्त हो अर्थात पाप ग्रहों से पीड़ित हो तब धन का नाश होता है।

आधुनिक कारक तत्त्वों में सुवर्ण धातु तथा पुखराज रत्न पर बृहस्पति का विशेष अधिकार है। धर्म से सम्बंधित वस्तुयें मूर्तियाँ, मालायें इत्यादि, आश्रम, मठ, धार्मिक पुस्तकें, शिक्षा संस्थान अध्यापक प्रोफेसर, कथा वाचक, प्रवचन कर्ता, फाईनेंस, सूद, बैंक, बीमा इत्यादि पर बृहस्पति का अधिकार है। भारतीय ज्योतिष में बृहस्पति को 2, 5, 9, 10 तथा 11वें भाव का कारक कहा गया है। बृहस्पति यदि कुण्डली में शुभ स्थान का स्वामी होकर शुभ ग्रहों के साथ अथवा बलवाल हो तो, बृहस्पति से सम्बन्धित विषयों का शुभ फल प्राप्त होगा। यदि बृहस्पति निर्बल होकर अशुभ स्थान में हो या अशुभ स्थान के स्वामीयों या ग्रहों से सम्बंध बना रहा हो तो पाप फल और रोगों में अस्थमा तथा हृदय रोग देता है।

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