
वैदिक काल से लेकर आज तक सनातन मत परम सत्ता की माता और पिता के रूप में उपासना करता आया है। सनातन मार्ग हमें यह भी सिखाता है कि इन दो भावों में से किसी एक का आश्रय लेकर हम धर्म के परमोच्च आदर्श तक पहुँच सकते हैं। ऋग्वेद में ईश्वर का पितृरूप प्रजापति कहलाया, जिसका अर्थ है समस्त जीवों के प्रभु और पिता। दशम मंडल के 121 वें सूक्त में इन प्रजापति का बहुत ही सुन्दर वर्णन है। इस सूक्त में सगुण परमात्मा का जैसा निरूपण किया गया है उससे अधिक सुन्दर निरूपण गत पाँच हजार वर्षों में किसी अन्य धर्म ग्रन्थों में नहीं हुआ। प्राचीन वैदिक युग के किसी मंत्र द्रष्टा ऋषि से यह पूछा गया कि हमें कौन से देवता की स्तुति एवं पूजा करनी चाहिये (कस्मै देवाय हविषा विधेम?) उन्होंने इन 10 ऋचओं में इस प्रश्न का उत्तर दिया जिनमें से दो ऋचाएँ नीचे उद्धृत की जाती हैं-
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुते मां तस्मैं देवाय हविषा विधेम।।
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः।
यस्य च्छायाऽमृतं यस्य मृत्यु स्तस्मै देवाय हविषा विधेम।।
आरंभ में प्रजापति हुये जो समस्त भूतों के पूर्वज एवं स्वामी थे। वे अपनी शक्ति से पृथ्वी और आकाश को धारण करते हैं। हमें चाहिये कि उन्हीं की स्तुति ओर पूजा करें। जो समस्त भूतों को जीवन तथा शक्ति प्रदान करते हैं, जिनके शरीर से अग्नि में से स्फुलिंग के समान जीव प्रकट होते हैं, जो समस्त जीवों को पावन करने वाले हैं, जिनकी आज्ञा का सभी प्राणी आदरपूर्वक पालन करते हैं, मृत्यु और अमृतत्व जिनकी छाया है। उन्हीं (प्रजापति) की हम लोग स्तुति एवं पूजा करें।
इन्हीं प्रजापति को जो विश्व के सच्चे एवं धर्मपरायण न्यायशील प्रभु हैं, जो देवाधिदेव हैं, ऋग्वेद में एक स्थान पर द्यौः पिता कहा गया है, जिसका अर्थ है स्वर्ग में रहने वाला पिता और सबका रक्षक। ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के तीसरे अध्याय के 20वें मंत्र (सूक्त 164। 33) में आता है-
द्यौर्मे पिता जनिता नाभिस्त्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्।
अर्थात् ‘वह ज्योतिर्मय स्वप्रकाश आत्मा जिसका निवास स्वर्ग में है, मेरा पिता और रक्षक, मेरा जन्मदाता है वही सबका कारण है।’ आगे चलकर वही द्यौः पिता यूनान के पुराण ग्रंथों में ज्यूपितर ;र्मन.च्पजंतद्ध अथवा जूपिटर ;श्रनचपजमतद्ध कहलाये। वही यहूदियों के जेहोवा ;श्रमीवअंद्ध और ईसाइयों के यवेह (स्वर्ग में रहने वाला पिता हो गये)।
ईश्वरीय मातृ रूप को ऋग्वेद में अदिति कहा गया है, जो विश्व का अटल अचल आधार है। ऋग्वेद के एक दूसरे सूक्त में उसका वर्णन है- अदिति स्वर्ग में है तथा स्वर्ग और भूलोक के बीच का जो द्युलोक (अंतरिक्ष) है वहाँ भी विद्यमान है। वह समस्त देवताओं की जननी है, और चराचर भूतों की रचने वाली है। सबकी पिता एवं रक्षक भी वही है। वह स्रष्टा और सृष्टि दोनों है। अपने उपासकों की आत्माओं को वह अपनी अनुकम्पा द्वारा पापों से मुक्त कर देती है। वह अपनी सन्तान को देने लायक सभी कुछ दे डालती है। वह सभी देवताओं अथवा दिव्य आत्माओं के विग्रह में निवास करती है। भूत एवं भव्य सब कुछ उसी का रूप है। वही सब कुछ है। (ऋ० 2। 6 । 17)
इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में प्राचीन काल में ईश्वर की उपासना विश्व के माता और पिता दोनों रूपों में हुई है। सगुण परमात्मा का जगत् के माता-पिता तथा निमित्त एवं उपादान कारण दोनों रूपों में वर्णन वेद के सिवा किसी भी ग्रन्थ में और सनातन के सिवा किसी मत में नहीं हुआ है।
जब तक ईश्वर को विश्वातीत एवं निष्क्रिय प्रकृति से भिन्न एवं बाहर मानते हैं तब तक उसकी जगत् के पिता अथवा निमित्त कारण के रूप में प्रतीति होती है और प्रकृति की उसके उपादान कारण के रूप में प्रतीति होती है। परंतु ज्यों-ज्यों हमारी समझ में यह आता जायेगा कि ईश्वर प्रकृति में ओत-प्रोत एवं प्रकृति से अभिन्न है उतना ही स्पष्ट रूप में हम समझने लगेंगे कि ईश्वर हमारी माता भी और पिता भी। जब हमें इस बात का अनुभव हो जायेगा कि जगत् की उपादान-भूता प्रकृति अथवा ईश्वर का नारी रूप ईश्वर के व्यक्त स्वरूप का ही एक अंश है और विराट् पुरुष अथवा परमात्मा के पुरुष रूप से सर्वथा अभिन्न है, तब यह बात हमारी समझ में आ जायेगी कि ईश्वर इस जगत् की रचना बढ़ई अथवा कुम्हार की भाँति ऐसे उपादानों से नहीं करता जो उसके शरीर से बाहर हैं अपितु वह एक मकड़ी की भांति सब कुछ अपने शरीर में से ही निकालता है और संसार के सभी पदार्थ और शक्तियाँ उसके शरीर में ही विद्यमान रहती हैं। उपर्युक्त सिद्धांत विश्व व्यापिनी शक्ति के वैज्ञानिक स्वरूप के साथ भी पूरा-पूरा मेल खाता है। आधुनिक विज्ञान सनातन शक्ति को ही समस्त बाह्य प्रपंच का कारण मानता है। विकास वाद का सिद्धांत तथा शक्तियों के परस्पर संबंध एवं शक्ति की नित्यता आदि सिद्धांतों से यह बात स्पष्टतया प्रमाणित होती है कि अखिल विश्व की स्थूल घटनाएँ, तथा बाह्य एवं आन्तरिक जगत् की भिन्न-भिन्न शक्तियाँ एक सनातन शक्ति की अभिव्यक्ति मात्र हैं। विकास वाद का सिद्धांत तो केवल उस प्रक्रिया का निदेर्शन करता है जिसके अनुसार वह सनातन शक्ति इस बाह्य प्रपंच को रचती है। विज्ञान ने इस प्राचीन मत का खण्डन कर दिया है कि, एक विश्वातीत परमात्मा की आज्ञा से-शून्य से जगत् की उत्पत्ति हुई है और इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि अभाव से भाव की उत्पत्ति नहीं हो सकती। विज्ञान हमें सिखलाता है कि विश्व उस आदि शक्ति के अंदर अव्यक्त रूप में विद्यमान था और धीरे-धीरे विकास क्रम से जो कुछ अव्यक्त था वह प्रकट हो गया। वह सनातन शक्ति जड़ अथवा अचेतन नहीं है, चेतन है। बाह्य अथवा अभ्यंतर जगत् में जहाँ कहीं हमारी दृष्टि जाती है वहाँ हम स्थूल पदार्थों तथा जड़ शक्तियों के आकस्मिक संयोग का ही विलास नहीं पाते अपितु एक निश्चित उद्देश्य के अनुकूल नियमों की क्रिया को देखते हैं। यह जगत् अव्यवस्थित नहीं है अपितु एक सुव्यवस्थित एवं सुसंगठित संस्था है। यह परिवर्तनों की एक निरुद्देश्य शृंखलामात्र नहीं है जिसे हम विकास कहते हैं प्रत्युत विकास के पग-पग पर एक सुनियोजित उद्देश्य छिपा हुआ है। इसी से वह शक्ति ज्ञान सम्पन्न कही जाती है। हम इस स्वतंत्र, ज्ञान संपन्न, सनातन विराट् शक्ति को विश्व की जननी कह सकते हैं। वह अनन्त शक्तियों और अनन्त प्राकृतिक घटनाओं का मूलस्तोत्र है। इस सनातन शक्ति का संस्कृत में प्रकृति और लैटिन भाषा में प्रोक्रियोट्रिक्स ;च्तवबतमंजतपगद्ध कहते हैं जिसका अर्थ है-विश्व की उत्पादिका शक्ति। सनातन मत के शास्त्रों में उसका वर्णन इस प्रकार किया गया है-
त्वं परा प्रकृतिः साक्षाद् ब्रह्मणः परमात्मनः।
त्वत्तो जातं जगत्सर्व त्वं जगज्जननी शिवे।।
‘हे शिवे! तुम्हीं परब्रह्म परमात्मा की परा प्रकृति हो, तुम्ही से सारे जगत् की उत्पत्ति हुई, तुम्हीं विश्व की जननी हो।’
प्रकृति की जितनी भी शक्तियाँ हैं वे सब ईश्वरीय शक्ति की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। इसी से उस मूल शक्ति को सर्व सामर्थ्य युक्त कहा गया है। विश्व में जहाँ कहीं शक्ति का स्फुरण दिखता है वहाँ सनातन प्रकृति अथवा जगदम्बा की अधिक युक्ति संगत प्रतीत होता है क्यांकि जननी की भाँति वह सृष्टि को विकास के पूर्व अपने उदर में रखती है। उसकी वृद्धि एवं पोषण करती है, उसका प्रसार करती है तथा उत्पन्न हो जाने पर उसकी रक्षा करती है। वह ब्रह्मा-विष्णु- महेश की जननी है। वह समस्त क्रिया की मूल है। वही क्रियाशील शक्ति है। सृष्टिकर्ता अपनी सृजनाकरणी शक्ति से हीन होने पर सृष्टिकर्ता नहीं रह जाता। उत्पादिका शक्ति भी उस परम सनातन शक्ति की अभिव्यक्ति मात्र है इसीलिये सनातन धर्मशास्त्र सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, सृष्टि पालक विष्णु एवं सृष्टि संहार रुद्र को उस जग जगज्जननी से उत्पन्न हुआ मानते हैं। ऋग्वेद के दशम मण्डल के 125वें सूक्त में आदि शक्ति जगदम्बा कहती हैं-
‘मैं ही ब्रह्माण्ड की अधीश्वरी हूँ। मैं ही सारे कर्मों का फल भुगताने वाली और ऐश्वर्य देने वाली हूँ। मैं चेतन एवं सर्वज्ञ हूँ। मैं एक होते हुए भी अपनी शक्ति से नाना तप भासती हूँ। मैं मानव जाति की रक्षा के लिये युद्ध ठानती हूँ और शत्रु का संहार कर पृथ्वी पर शान्ति की स्थापना करती हूँ। मैं ही भूलोक और स्वर्गलोक का विस्तार करती हूँ। मैं जनक की भी जननी हूँ। जैसे वायु अपने आप चलती है वैसे ही मैं भी अपनी इच्छा से समस्त विश्व की स्वयं रचना करती हूँ। मैं सर्वथा स्वतंत्र हूँ। मुझ पर किसी का प्रभुत्व नहीं है। मैं आकाश और पृथ्वी से परे हूँ। अखिल विश्व मेरी विभूति है। मैं अपनी शक्ति से यह सब कुछ हूँ।’ इस प्रकार जगदम्बा को सब कुछ कहा गया है। उस जगज्जननी के अंदर ही हम जीवन धारण करते हैं, चलते-फिरते हैं और अपना अस्तित्व बनाये हये हैं। ईश्वरीय शक्ति अपनी लीला का संवरण कर ले तो फिर किसकी मजाल है जो क्षण भर भी जीवित रह सके। संसार में जो कुछ होता है वह सब उसी की प्रेरणा से होता है। एक आदमी भला मालूम होता है तथा आध्यात्मिक एवं ईश्वरीय गुणों से युक्त प्रतीत होता है, और इसके विपरीत दूसरा दुरात्मा एवं पापी नजर आता है। यह सब उसी का खेल है क्योंकि सत्पुरुष को सत्कर्म करने की और दुष्कृति को दुष्कर्म करने की शक्ति यही देती है। परंतु यह सब होते हुये भी वह स्वयं सत्-असत् से परे है, पाप-पुण्य से अलग है। उसकी शक्तियाँ न तो अच्छी हैं और न बुरी ही हैं। हमें अपने- अपने दृष्टिकोण से तथा आपेक्षिक दृष्टि से वे भली-बुरी प्रतीत होती हैं।
जब वह सर्वव्यापिनी ईश्वरीय शक्ति अपने को अभिव्यक्त करती है तब यह दो परस्पर विरोधी शक्तियों के रूप मे प्रकट होती है। उनमें से एक शक्ति ईश्वरोन्मुख होती है; इसे संस्कृत में विद्या कहते हैं; दूसरी शक्ति संसार प्रवण होती है और अविद्या कहलाती है। पहली मोक्ष और आनन्द की देने वाली है और दूसरी बंधन और दुःख का कारण होती है।
हे जगज्जननी! तुम्हीं सनातन शक्ति हो, तुम्हीं विश्व के अनन्त की मूलस्त्रोत हो। व्यक्त अनेक नाम रूपों में तुम्हारी ही शक्ति अभिव्यक्ति हो रही है। तुम्हारी अविद्या शक्ति से मोहित होकर हम तुम्हें भूल जाते हैं और संसार के तुच्छ पदार्थों में सुख का अनुभव करने लगते हैं। परंतु जब हम तुम्हारी पूजा करते हैं और तुम्हारी शरण आते हैं तब तुम हमें अज्ञान से एवं संसार की आसक्ति से मुक्त कर देती हो और अपने बच्चों को शाश्वत सुख प्रदान करती हो।
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