उपवास चिकित्सा में कैसे सहायक है

उपवास चिकित्सा में कैसे सहायक है

ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की शान्ति के लिये अनेक उपाय बताये जाते हैं। यथा- रत्नों से, मंत्रों से, यंत्रों से, टोटकां से, दान-पुण्य से या अन्य उपायों से ग्रहों को शान्त करने के अनेक विधान ज्योतिष महर्षियों ने सुझाये हैं। इन सबमें सबसे सरल एवं सहज उपाय व्रत है, जिसमें कुछ भी खर्च नहीं करना पडता। भारत में सनातन धर्मी 90 प्रतिशत महिलाऐं व्रत रखती हैं। लेकिन उन्हे व्रत विधान की सही जानकारी नहीं होती, फलस्वरूप गलत समय पर शुरू और समाप्त किया गया व्रत निष्फल हो जाता है। व्रत की शास्त्रीय जानकारी होना उतना ही आवश्यक है जितना व्रत को रखना। व्रतों से न केवल प्रतिकूल ग्रहों को अनुकूल किया जा सकता है। वरन् उससे आत्म विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति भी संचित होती है। विचारों में संकल्प शक्ति की वृद्धि होती है। व्रत वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसलिये लाभकारी हैं कि इससे पेट की बीमारियाँ नहीं होती। शरीर के अंगो को स्फूर्ति मिलती है। जिस प्रकार राजकर्मी सात दिन में एक दिन का अवकाश प्राप्त कर अगले दिन उत्साहित मन से काम में लग जाता हैं, उसी प्रकार शरीर के अंग भी व्रत के पश्चात तेजी से अपना काम उत्साहित होकर करने लगते हैं भविष्य पुराण ने तो यहॉ तक धोषणा की है कि –

व्र्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा नृप।
देवादयो भवन्तयेय तेषां प्रीता न संशय।।

अर्थात-व्रताचरण उपवास नियमों के परिपालन तथा विविध दानों से व्रतियों पर सभी देवता, ऋर्षि-मुनि तथा संसार के प्राणी निश्चित रूप से प्रसन्न हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं।

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयोप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्वा माप्नोति श्रद्वया सत्यमाप्यते।।

(यजु 19/13)

अर्थात-व्रत धारण करने से मनुष्य दीक्षित होता है। दीक्षा से उसे दक्षिण्य (दक्षता-निपुणता) प्राप्त होती है। दक्षता की प्राप्ति से श्रद्वा का भाव जाग्रत होता है और श्रद्वा से ही सत्य स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति होती है।

रोगी होने पर व्यक्ति चिकित्सक के पास चिकित्सा कराने जाते हैं। रोग के उपचार में लाखों रूपये व्यय भी हो जाते हैं। लेकिन फिर भी रोगी पूर्ण स्वस्थ्य हो जाये इसकी कोई गारन्टी नहीं होती। लेकिन ईश्वर से बडा कोई चिकित्सक नहीं है। जब चिकित्सक को पता लग जाये कि यह रोगी नहीं बचेगा तो चिकित्सक भी यही कहते है कि ईश्वर पर भरोसा रखो सब ठीक हो जायेगा। इससे यह सिद्ध होता है कि चिकित्सक तो एक माध्यम मात्र है रोगी को ठीक करने वाला तो ईश्वर ही है। आयुर्वेद में चार प्रकार के रोग बताये गये है- (1) स्वभाविक (2) आगन्तुक (3) कायकान्तर और (4) कर्म दोषज। शार्डधर संहिताः- ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा हैः-

स्वभाविकागन्तुकायकान्तरा रोगा भवेयुः किल कर्मदोषजा।।

भूख, प्यास, निद्रा, बुढापा, और मृत्यु ये स्वभाविक हैं। भय, लोभ मोह, काम, क्रोध, लज्जा, अभिमान, ईष्या, दीनता, शोक, अपस्मार, पागलपन, भ्रम, तम, मूर्छा, सन्यास और भूतावेश आदि आगन्तुक हैं। पाण्डुरोग, जलोदर आदि कायकान्तर हैं तथा पूर्व जन्म में किये हुए पाप जन्य दोषों के कारण होने वाले सभी रोग कर्मदोषज हैं। अभिप्राय यह है कि जो रोग दिखने में सरल, बडे-बडे उपायों से भी ठीक नहीं होते कभी-कभी साधारण उपायों से भी ठीक हो जाये वे कर्मदोषज यानि पूर्व जन्म या इस जन्म में जाने-अनजाने में किये गये पापों का परिणाम होते हैं। जप, व्रत, अनुष्ठान आदि से पापों की निवृति हो जाती है साथ ही असाघ्य से असाघ्य रोग भी ठीक होते दिखाई देते हैं। इस प्रकार रोग का मूल कारण पाप ही हुआ अतः यदि मूल कारण ही समाप्त कर दिया जाये तो जीवन में कभी रोग निकट ही नहीं आयेगा। शास्त्रों में कौन सा रोग किस व्रत अथवा जप से ठीक हो सकता है? बताया गया है-

1. ज्वर निवारण व्रतः- शास्त्रों में ज्वर को रोगों का राजा कहा हैः-

देहेन्द्रियमनस्तापी सर्वरोगाग्रजो बली।
ज्वरः प्रधानों रोगाणामुक्तो भगवता पुरा।।

-माघव निदान
ज्वर के निवारण हेतु वैसे तो शास्त्रों में अनेक विधान वर्णित है लेकिन सरलतम उपचार भवानी सहस्त्रनाम में बताया है रविवार को प्रातः काल में काँसी के पात्र को जल से भरकर उस में सात सूई डालें और उनका गन्ध पुष्पादि से पूजन करके सातों को एकत्र कर के-

ऊँ वज्रहस्ता महाकाया वज्रपाणिर्महेश्वरी। हरते स्ववज्रतुण्डेन भूमि गच्छ महाज्वर।।

इस मंत्र का उच्चारण करते हुए सात बार घुमायें फिर उसमें से एक सूई निकालकर भूमि में गाड दें इस प्रकार दूसरे दिन दूसरी और तीसरे दिन तीसरी आदि निकालकर सात दिनों में सात सूईयाँ गाड दें तथा एक भुक्त व्रत करें। ज्वर से मुक्ति मिल जायेगी।

2. अजीर्ण निवारण व्रतः- ‘ऋग्वेद विधान’ में इसका उल्लेख है- अधिक दिनों तक अजीर्ण रहती हो तो ‘अग्निरस्मि’ ऋचा के एक हजार जप करके सोंठ, मिर्च, और पीपल की एक सौ आहुति देकर उपवास करें। दुसरे दिन ब्राम्हण को भोजन करावें। अर्जीण रोग से मुक्ति मिलेगी।

3. पाण्डुरोग निवारण व्रतः- शास्त्रों मे पूर्व या इस जन्म में देवता या ब्राह्मण का धन हरण करने से यह रोग होता है। इसके निवारण हेतु ‘धर्मनुसधांन’ मे कहा गया है कि कृच्छातिकृच्छ चान्द्रायणव्रत करें तथा अपनी शक्ति अनुसार सुवर्ण का दान करें तथा कूष्माण्डी हवन करें। रोग समाप्त हो जायेगा।

4. श्वांस, कास और कफ से मुक्ति व्रतः- शिव पूजा से यह रोग समाप्त हो जाता है। रूद्रपाठ सहित सहस्त्रघटाभिषेक करावें। ब्राम्हण को भोजन कराकर लाल वस्त्र या श्रद्धा हो तो सुवर्ण का दान करें। नक्तव्रत करें। रोग समाप्त हो जायेगा।

5. बहुमूत्र निवारण व्रतः- ‘सूर्यारूण’ में कहा गया है कि दूध आदि चुराने अर्थात पानी आदि मिलाकर दूध को नष्ट भ्रष्ट करने वालों को यह रोग हो जाता है। इसकी निवृति का उपाय काश्यप ऋषि ने दुग्ध धेनु का दान और नक्तव्रत (रात्रि मे एक बार) भोजन करना बताया है। रोग से छुटकारा मिलेगा।

6. कुष्ठरोग निवारण व्रतः- पूर्व जन्म में अगणित जीवों की हत्या कर देने के फल स्वरूप यह रोग होता है। इस रोग का छींटा भी दिखाई पढ़ जाये तो समाज में उस व्यक्ति के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है ‘सूर्याख्ण’ में कहा गया है कि रोगी की सामर्थ अनुसार उतमी तौल का वृषभ (नन्दिकेश्वर) बनवाकर उसे रेशमी वस्त्र में रखकर दान करें रात्रि में व्रत रखें। तथा इस मंत्र के संकल्प के साथ उसका दान करे- पूर्वजन्मार्जित समस्त पापनिरसन- पवूर्वक प्रस्तुत कुष्ठोपशमन कामनया। शिवप्रीतये सुवर्ण वृषभं वयोवद्धाय वेदाभ्यासिने सत्यात्रब्रम्हणायह दास्ये ।।

7. चर्म रोग निवारण व्रत – किसी के बार-बार फुन्सी, फोडे, खुजली, आदि चर्म रोग हों तो उसे मंगलवार का व्रत रखना चाहिये। यह रोग जन्म पत्री मे मंगल के नीच राशि पर होने, अस्त होने या छठे, आठवें बारहवें स्थान पर होने से होता है। दो रूपये की रेवडी तथा दो ख्पये के बताशे ओम भोम भोमाय नमः का 11 बार पाठ करके बहती नदी मे मंगलवार के दिन प्रवाहित कर दें निश्चित राहत मिलेगी।

8. गुप्त रोग निवारण व्रत – जन्म पत्री मे यदि शुक्र अपनी नीच राशि कन्या पर हो या सप्तमेश छठे अथवा आठवें भाव मे हो तो गुप्त रोग होने की संभावना रहती है। इसके निवारण हेतु शुक्रवार का व्रत रखें अपने भेजन मे से एक रोटी सफेद रंग की गाय को 43 दिन तक दें, रोग समाप्त होगा।

शास्त्रों में विभिन्न रोगों के अनेक उपाय वर्णित हैं यदि विश्वास पूवर्क व्रत किये जायें तो रोग से मुक्ति अवश्य मिलेगी। व्रतो का विधान भी शास्त्रों में वर्णित है। धर्म शास्त्र में बताये गये विधान का उल्लंघन करने पर व्रत निष्फल तो होगें ही साथ ही अपना प्रतिकूल प्रभाव भी प्रकट करेंगे अतः कोई भी व्रत प्रारम्भ या समाप्त करने से पूर्व किसी विद्वान से सम्बंधित व्रत विघान की जानकारी अवश्य कर लेनी चाहिये। व्रत करते समय किन विशेष बातों का घ्यान रखें इसकी सूक्ष्म जानकारी प्रस्तुत है-

1. बृहस्पति और शुक्र का अस्त तथा अस्त होने से पहले के तीन दिन वृद्वत्व में और उदय होने के बाद तीन दिन बालत्य के समय व्रत आरम्भ करना वर्जित है।
2. मलमास में न तो व्रत का आरम्भ ही करना चाहिये न ही उद्यापन करना चाहिये।
3. बृहस्पति ग्रह जब अपनी नीच राशी मकर पर हो अथवा टेढे बैठे हों या अस्त हों अथवा नियत राशि को लांध कर दूसरी अनियत राशि पर चले गये हों उस समय व्रत आरम्भ नहीं करने चाहियें।
4. सूर्य नारायण के उदय के समय में जो तिथि हो पर मध्यान्ह के समय में वह न रहे उस खण्डा तिथि मे न तो व्रत का आरम्भ करना चाहिये न ही व्रत की समाप्ति करनी चाहिये।
5. व्रत के समय बार-बार जल पीने, दिन में सोने, ताम्बूल (पान) चबाने तथा सहवास करने से व्रत बिगड जाता है।
6. उपवास में और श्राद्ध में दातौन नहीं करना चाहिये, आवश्यक हो तो जल के बारह कुल्ले कर लें।
7. किसी भी व्रति मनुष्य को माँस का सेवन नहीं करना चाहिए।

अतः व्रती को चाहिये कि व्रत का आरम्भ एंव इति करते समय उक्त विघान का पूर्ण ध्यान रखें, जिससे व्रत निष्फल न हो तथा व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। शास्त्रों मे लगभग सभी बीमारियों के उपचार की विघि व्रतों के द्धारा बताई गई है। इसके अतिरिक्त जन्मपत्री के द्धारा भी बीमारी का पता सहजता से लगाकर उसका उपचार किया जा सकता है।

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