
सुहृद् गृह ग्राम चतुष्पदानां श्रेत्रोद्यमालोकनकं चतुर्थे।
‘जातकाभरमण्’ का मत है कि मित्र, बन्धु, पशु और कृषि कर्म का विचार चतुर्थ भाव से करना चाहिये। ‘भावकुतूहलम्’ ग्रन्थ के अनुसार-
सुखपतिः सुखगस्तनुनाथं युग जन यति प्रवरालमगिंनाम्। त्रिकगतोविरीतमिहादिभिः सुख जनुः पतिखे तथा बुधैः।
यदि चौथे घर का स्वामी लग्नेश के साथ बैठा हो तो मनुष्य को बहुत बड़े-बड़े महल मिलते हैं। यदि उक्त दोनों ग्रह छठे, आठवें या बारहवें घर में हां तो पूर्वजों का बनवाया हुआ उत्तम गृह भी बिक जाता है। प्राचीन आचार्यों न ऐसा ही फल कहा है।
सुखाधीशे जीवे सुखनिवह चिंता भृगुसते,
विभूषादी षागंप्रवर तुरगणामपिबुधे।
अगोमन्दे नीचोद् भवसुख मतेखे दिनयेः
पितृश्रच्न्द्रे मातुः क्षितिनिकर चिन्ता क्षिति सुते।।
यदि चतुर्थेश गुरू हो तो व्यक्ति अपने सुख की विशेष चिंता करता है। शुक्र या बुध चतुर्थेश हो तो भूषण, स्त्री, शरीर तथा बड़े-बड़े घोड़े (वर्तमान संदर्भ में मोटर, कार आदि) सवारियों का सुख होते हुये भी अधिक के लिये चिन्तित रहता है। राहु या शनि चतुर्थेश हो तो नीच मनुष्यों से विशेष सुख पाने की चिंता रखता है। सूर्य चतुर्थेश हो तो पिता के सुख की , चंद्रमा चतुर्थेश हो तो माता के सुख की, मंगल यदि चतुर्थेश हो तो भूमि लाभ होने की चिंता करता है।
त्रिकोण वाहनाधीशे केन्डें चवलसंयुते।
निजोच्चादि पदेनूनं वाहन नूतनं भवेत्।।
यदि चौथे भाव का स्वामी बलवान होकर त्रिकोण (5, 9) या केन्द्र (1, 4, 7, 10) भाव में हो तो मनुष्य को नये-नये वाहनों का सुख अवश्य मिलता है।
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र के अनुसार-यदि चतुर्थेश शनि एवं चंद्रमा से युक्त हो तो बहुत बड़ा महल होता है। चौथे भाव में शुभग्रह हो तथा चतुर्थेश अपनी उच्च राशि में हो या स्वगृही अथवा तीसरे घर में मित्र राशि में हो शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो जातक बहुत भूमि वाला होता है। यदि चतुर्थेश केन्द्र में हो, केन्द्र में ही बुध एवं शुक्र अपनी उच्च राशि में हों तो जातक विद्वान, मेघावी तथा सुखी होता है। चतुर्थ भाव में शनि सूर्य के साथ हो तथा भाग्य स्थान में चंद्र हो और मंगल लाभ भाव में हो तो जातक पशुओं का मालिक होकर सुखी रहता है, उसके पास अनेक गाय, भैंसें होती हैं। यदि लग्न मिथुन या कन्या राशि की हो, चौथे भाव का स्वामी नीच राशि में हो, मातृ कारक द्वादश भाव में हो तथा सुखेश लाभ स्थान में हो तो जातक वाहन सुख खूब पाता है।
वृद्ध यवन जातक के अनुसार यदि चतुर्थ भाव में सूर्य अपनी उच्च राशि में हो तो मनुष्य को अनेक कष्टों के बाद सुख मिलता है। यदि सूर्य उच्च नवांश मे हो तो कम सुख मिलता है। यदि चतुर्थ भाव स्थित सूर्य उच्च नवांश का हो तो व्यक्ति को पर स्त्री से सुख मिलता है अर्थात् दूसरे की स्त्री की सहायता से सुख पाता है। यदि सूर्य चतुर्थ भाव में नीच राशि में स्थित हो तो व्यक्ति सुख से हीन होता है। नीच नवांश का सूर्य भी व्यक्ति को कभी सुख तो कभी दुःख देता है। चतुर्थ भाव स्थित सूर्य पाप वर्गों में हो तो मनुष्य को कर्ज सहित कई दुःख झेलने पड़ते हैं। चतुर्थ भावस्थ सूर्य मित्रराशि का हो तो व्यक्ति पाप कर्मों से सुखी होता है अर्थात् सुख लाभ हेतु उसे अपना नैतिक पतन करना पड़ता है। शत्रु राशि में सूर्य होने से व्यक्ति चोरी आदि से सुख पाता है। चतुर्थ भावस्थ सूर्य वर्गोŸाम नवांश का हो तो जुये से भौतिक सुख, शत्रुग्रह की राशि में हो तो युद्ध, लड़ाई से सुख, शत्रु नवांश में होने पर सेवा करने से सुख, मूलत्रिकोण में होने पर व्यक्ति को वध, हत्या, अपहरण आदि अपराधिक कार्यां से सुख मिलता है।
चंद्र :- चतुर्थ भाव में उच्चराशि का चंद्रमा वाहन सुख खूब देता है। उच्च नवांश में हो तो सोने चांदी आदि का सुख, षडवर्ग शुद्ध, चंद्रमा सभी प्रकार के सुख देता है। चतुर्थ भाव में नीच राशि का चंद्रमा जुये से, लाटरी से, नीच नवांश में कृषि कार्य से भरपूर सुख, पाप वर्गों में होने पर अनेक पाप कर्मों से सुख, मित्र राशि में होने पर अत्यधिक सुख, वर्गोŸाम नवांश में भौतिक सुख मित्र नवांश मे होने पर पुत्रों से सुख, देता है।
चतुर्थ भाव में शत्रु राशि का चंद्रमा मनुष्य को अन्याय एवं अनीतिमार्ग से धनसुख, शत्रु नवांश में हो तो कपट कार्य से सुख, मूलत्रिकोण राशि में हो तो सत्कार्यों से धन सुख आदि मिलता है।
मंगल :- यदि चतुर्थ भावस्थ मंगल उच्च राशि में हो तो मनुष्य अपने शत्रुओं का नाश करके सुख पाता है। यदि यही मंगल उच्च नवांश में हो तो मनुष्य को दूसरों को बंधन, गुलामी या नियंत्रण में रखने से सुख मिलता है। षड्वर्ग शुद्ध मंगल हो तो मनुष्य दूसरो को धोखा देकर सुख पाता है। नीच नवांश का मंगल हो तो व्यक्ति को दूसरों की देखभाल एवं पालन पोषण करने से सुखी होता है। पाप वर्ग का मंगल वध बंधन से सुख देता है। चतुर्थ भावस्थ मित्र राशि का मंगल परदेश सम्पर्क से लाभ देता है। मित्र नवांश का मंगल सुख क्रिया से सुख देता है। वर्गोŸाम नवांश का मंगल हो तो दूसरों का धन नष्ट करके व्यक्ति भौतिक सुख पाता है। चतुर्थ भाव में मंगल अपने शत्रु की राशि में हो तो व्यक्ति वेश्यागमन या वेश्याओं की दलाली आदि से सुख पाता है। शत्रु नवांश में मंगल व्यक्ति को व्यभिचार से सुख देता है। यदि चतुर्थ भावस्थ मंगल मूल त्रिकोण में हो तो व्यक्ति दूसरों को मोहित करके सुख पाता है।
बुध :- चतुर्थ भाव में उच्च राशि का बुध महान लोगों के सम्पर्क से सुख देता है। उच्च नवांश में होने पर व्यक्ति राज पक्ष से लाभ पाता है। यदि चतुर्थस्थ बुध षड़वर्ग शुद्ध हो तो मनुष्य खूब भोग विलास पाता है। नीच राशि में हो तो मनुष्य को क्लेशपूर्वक सुख मिलता है। नीच नवांश में दूसरों की सेवा करके, पापवर्गों में बुध होने पर विचित्र कार्य करने से सुख मिलता है। चतुर्थस्थ बुध मित्र राशि में हो तो श्रेष्ठपुत्रों से मित्र नवांश में व्यक्ति को अपनी पत्नी के सान्निध्य से, वर्गोŸाम नवांश में होने पर पुत्री से, शत्रु राशि में होने पर क्रय-विक्रय स,े शत्रु नवांश में हो तो पशुपालन से तथा मूल त्रिकोण में हो तो बंधु-बान्धवों से सुख मिलता है।
गुरू :- चतुर्थ भावस्थ गुरू शत्रु राशि में हो तो नीच मनुष्यों की सेवा से सुख मिलता है। चतुर्थ भाव में गुरू अपने उच्च में हो तो सर्व प्रकार का पूर्ण सुख व्यक्ति पाता है।
यदि गुरू उच्च नवांश में हो तो सुख में कुछ कमी रहती है। चतुर्थ भाव स्थित गुरू षड्वर्ग में शुद्ध हो तो व्यक्ति को सद्धर्म पालन करने से सुख होता है। नीचराशि में होने पर नीच मनुष्यों की संगति से सुख, नीच नवांश में होने पर विचित्र प्रकार की विचार धाराओं के कारण सुख, पापवर्ग में होने से दूसरों के पालन-पोषण से सुख, गुरू मित्र राशि में होने पर अपनी कुल परम्परा से सुख, मित्र नवांश में होने पर सेवकों से सुख, वर्गोŸामी होने पर बहन के सहयोग से सुख, यदि गुरू अपने शत्रु नवांश या मूल त्रिकोण में हो तो राजा के सम्पर्क से सुख होता है।
शुक्र :- चतुर्थ भाव स्थित शुक्र की स्थिति देखते हैं- यदि शुक्र उच्च राशि में हो तो अनेक प्रकार के धन का सुखः नीच राशि में हो तो मनुष्य पर स्त्रियां के सम्पर्क से सुख, उच्च नवांश में होने पर सवारी सुख तथा षड्वर्ग शुद्ध होने पर उच्च वाहन से सुख, नीच नवांश में होने पर सुंदर स्त्रियों से सुख, पाप ग्रहों के वर्ग में शुक्र हो तो गुरू पत्नी के सम्पर्क से सुख, मित्र राशि में होने पर पशु धन से सुख, मित्र नवांश में होने पर भेड़ बकरियों से सुख, वर्गोŸामी नवांश में होने पर भैंस आदि धन से सुख, शत्रुराशि में होने पर दुष्ट लोगों की सेवा से सुख, शत्रु नवांश में होने पर परदेश में निवास से सुख, मूल त्रिकोण में होने पर ब्राह्मण से, देवताओं के सम्पर्क से सुख मिलता है।
शनि :- चतुर्थ भाव स्थित शनि हो और वे उच्च राशि में हो तो मनुष्य शिकार आदि से तथा किसी भी प्रकार से पशु पक्षी, भैंसे से सुख पाता है। उच्च नवांश में होने पर मांस भक्षण से सुख, षड््वर्ग होने पर कृषि कार्य से सुख, नीच राशि, में होने पर सुख कभी नहीं, नीच नवांश में होने पर लोगों को डरा-धमका कर सुख, पाप वर्ग में होने पर दूसरों के दोषों से सुख, मित्र राशि में होने पर अपनी स्त्री से सुख, मित्र राशि के नवांश में होने पर अपने कुटुम्ब की हानि या नाश से सुख, वर्गोŸामी होने पर दूसरों को सताने से सुख, मित्र राशि में होने पर दूसरों को ठगने से सुख, मित्र नवांश में होने पर मनुष्य को बेचने से सुख तथा मूल त्रिकोण में होने पर व्यापार आदि से सुख पाता है।
कितना सुख देते हैं ग्रह :- यदि गुरू चतुर्थ भाव में हो तो अनंत सुख देते हैं। बुध से सैकड़ां सुख, चंद्रमा से हजारों सुख, सूर्य, शनि व मंगल साठ प्रकार के सुख देते हैं। यदि ये ग्रह परमोच्च हों तो बताये गये सुख पूर्ण मात्रा में मिलते हैं। नीच राशि में होने पर बिल्कुल भी सुख नहीं देते हैं। षड्वर्ग शुद्ध होने पर या परमोच्च होने पर परिपूर्ण सुख देते हैं।
चतुर्थेश/सुखेश का प्रभाव भी देखें :- यदि चतुर्थेश लग्न में हो तो जातक का अपने माता-पिता से विशेष प्रेम लगाव रहता है। यद्यपि पितृ पक्ष के लोग उससे ईर्ष्या रखते हैं, लेकिन वह पिता के नाम से जाना जाता है। यदि चतुर्थेश सूर्य, मंगल या शनि हो तथा द्वितीय भाव में हो तो जो जातक अपने पिता से विरोध रखता है। सोम, बुध, गुरू, शुक्र चतुर्थेश होकर द्वितीय भावस्थ हो तो जातक पिता की सेवा करने वाला तथा प्रसिद्ध होता है। तृतीय भावस्थ चतुर्थेश हो तो जातक का पिता प्रसिद्ध व्यक्ति होता है। जातक माता-पिता में मतभेद का कारण बनता है तथा पिता के बंधुओं की हानि करता है। यदि चतुर्थेश चौथे भाव में हो तो जातक माता-पिता की आदर पालन करने वाला धनी एवं सुखी होता है। पंचम भाव में चतुर्थेश हो तो पिता दीर्घायु, लाभ कमाने वाला, योग्य पुत्रों वाला, पुत्रों से सुखी एवं धनवान होता है। शुभ ग्रह चतुर्थेश छठे भाव में होने पर मनुष्य पुत्रवान और धनवान रहता है। चतुर्थेश क्रूर ग्रह होकर छठे भाव में हो तो जातक पिता के धन का नाश करने वाला तथा पिता से शत्रुता रखने वाला होता है। सप्तम भाव स्थित क्रूर चतुर्थेश हो तो मनुष्य अपनी पत्नी का पालन नहीं करता है और यदि सौम्य चतुर्थेश हो तो पत्नी की देखभाल भली-भांति करता है। यदि चतुर्थेश मंगल या शुक्र हों और सप्तम भाव में स्थित हों तो मनुष्य की पत्नी के चारित्रिक पतन की पूर्ण आशंका रहती है। अष्टम भाव में गया चतुर्थेश मनुष्य को रोगी, द्ररिद्री, क्रोधप्रिय तथा दुष्कर्मी बनाता है। नवम भाव में चतुर्थेश हो तो जातक अपने बलबूते पर सफलता पाता है। पिता से कम मोह रखता है, लेकिन पैतृक धर्म का पालन करता है। यदि क्रूर ग्रह चतुर्थेश होकर दशम भाव में हो तो जातक का पिता उसकी माता को त्याग देता है। शुभ ग्रह चतुर्थेश हो तो यह दुष्प्रभाव नहीं होता है। एकादश भाव स्थित शुभ चतुर्थेश व्यक्ति को राजा बना देता है। पापग्रह हो तो भी व्यक्ति दीर्घायु, माता-पिता का पोषक होता है। द्वादश भाव में गया चतुर्थेश जातक के पिता सुख की हानि करता है।
इस प्रकार चतुर्थ भाव, भावेश, कारक ग्रह, भाव में स्थित शुभ ग्रह शुभाशुभ ग्रहों की भाव एवं भावेश पर दृष्टि, अष्टक वर्ग में भाव एवं भावेश की स्थिति आदि से व्यक्ति के सुख-दुःख का ज्ञान हो जाता है।
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