वैवाहिक सुख देखें हाथ की रेखाओं से

वैवाहिक सुख देखें हाथ की रेखाओं से

आदिकाल से ही विवाह, एक पवित्र व आवश्यक बन्धन माना गया है। यह ठीक है कि भिन्न-भिन्न राष्ट्रों में, जातियों में, यह अपना-अपना अलग महत्व रखता है। कहीं एक पत्निव्रत को महत्व देते हैं। तो कहीं किसी जाति में बहुपत्नी, पति प्रथा आज भी समाज-द्वारा स्वीकृत है। कहीं विवाह को आजन्म के लिये स्वीकार करते हैं तो कहीं तलाक प्रथा की भरभार है। यह संसार विविधता का संग्रहालय है, यहाँ सभी बातें देखने को मिल सकती हैं। इस उपरोक्त शीर्षक के अन्तर्गत विवाह कब, कितने, कैसे, रहेंगे? आदि बातों पर हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार वचनों, तथा अनुभव के आधार पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है। ज्योतिर्विज्ञ जहाँ कुण्डली का सप्तभाव, और भावेश की ग्रह-स्थिति, दृष्टि आदि के द्वारा इस विषय में पृच्छक को उत्तर देता है। उसी प्रकार हस्तरेखाविज्ञ हस्तेरखाओं से जो कनिष्ठिका अंगुली के नीचे स्थित रेखाओं से, शुक्र पर्वत (जो अंगुठे का आधार भाग कलाई के पास है) से, उस शुक्र पर्वतस्थित प्राभाविक रेखाओं से, भाग्यरेखा में चन्द्र क्षेत्र से आकर मिलने वाली प्रभाविक रेखाओं से, सप्तवर्गीय हस्तानुसार इस प्रश्न के विषय में विचार करता है। मंगल क्षेत्र, जो गुरू अंगुली के नीचे शुक्र क्षेत्र के साथ है। इस पर ही प्रभाविक रेखा व मंगल रेखा आदि के द्वारा इस विषय पर विचार किया जाता है। पौर्वात्य-पाश्चात्य मतों का ज्ञान होना इसलिये आवश्यक है कि जब तक हम हर देश-जाति के नियमों को दृष्टि में न रखेंगे। तो इस बारे में कहने मे भूल कर जायेंगे। जैसा लेख के प्रारम्भ में संकेत दिया गया है कि देश काल, सामाजिक, नियमः- एक पत्नि, बहु पत्नी, पति, पति-पत्नी की त्याग-प्रथा आदि सभी पृच्छक से सम्बन्धित होती हैं। इन सभी बातों को ध्यान में रख कर ही भिन्न-भिन्न देश व जाति वर्ग के हाथ की छाप लेकर शास्त्र के नियमों को हस्त छाप की रेखाओं से अनुभव की कसोटी पर परख कर शास्त्रीय ज्ञान को स्वानुभूमि में परिणित कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। आइये, अब अपने शीर्षक की पुष्टि में लिखी सभी बातों को विस्तार से विचारें-सब से पहले बुधांगुली (सबसे छोटी) कनिष्ठिका के नीचे के क्षेत्र पर बाहर से भीतर आनेवाली रेखा को ही लें।

हाथ की मुट्ठी बन्द कीजिये ताकि स्पष्टता से विवाह रेखा के दर्शन हो सकें। इस क्षेत्र पर जितनी स्पष्ट, लम्बी रेखाएँ होंगी, विवाह की संख्या बतायेंगी अगर छोटी और अस्पष्ट रेखा हुई तो केवल प्रेम-सम्बन्ध या विवाह विषयक चिन्ता प्रकट करेंगी। इन्ही रेखाओं को हृदय-रेखा व बुधांगुली के मध्य के स्थान से अन्तर माप लेने से विवाह के अनुमानित वर्ष ज्ञात हो सकेंगे। इस विषय में पौर्वात्य-पाश्चात्य विद्वानों के दो मत हैं- हृदयरेखा के अधिक निकट 15 से 20 वर्षायु तक कुछ दूर 25 से 35 तक अर्ध विभाग से थोड़ा ऊपर 35 के उपरान्त तथा कनिष्ठका के निकट होने पर 55 से 70 तक। इसके विपरीत दूसरा मत है- कनिष्ठिका के अति निकट 15-20 वर्ष तक कुछ आगे 25 से 35 तथा और हृदयरेखा की ओर 40 से 50 तथा हृदयरेखा के निकट 55 से 70 वर्ष तक। यह मोटा हिसाब है। पाठकों को इससे सन्तोष होना कम समझ में आता है, अतः थोड़ा अधिक गहराई में उतरने से विवाह के वर्षो का ज्ञान स्पष्ट हो सकेगा। हाँ तो आप रेखा पर ध्यान देकर किस वर्ग की रेखा है? जान लें, फिर देखें, यदि बुध क्षेत्र उच्च व स्पष्ट तथा बुध की अंगुली पर चक्र हो तो 16-18 वें वर्ष में विवाह हो जाना चाहिये। सूर्यांगुली की श्रेष्ठ स्थिति स्पष्ट रेखा व चक्रादि चिह्नों से 19 से 21 वर्ष के मध्य, इसी प्रकार से शनि व गुरू की स्थिति व अंगुली से 22 से 24 व 25 से 27 वें वर्ष में यह कार्य सम्पन्न होगा। इसके अतिरिक्त चन्द्रक्षेत्र की सबलता से 24 वें वर्ष सूर्य से 21-22 वें वर्ष शुक्र से 25 वें वर्ष गुरू से 16 वें वर्ष को भी ग्रहण किया गया है। इसके अतिरिक्त आप दांये-बांये हाथ की रेखाओं पर ध्यान दें यदि दायाँ हाथ अधिक सबल रेखायुक्त है, चक्रादि चिह्न युक्त है। गुरू पर स्पष्ट मुद्रिका या महत्वकांक्षी सीधी रेखा बनी है। तो पूर्वोक्त वर्षो में तथा बांये हाथ पर अधिक सबल हो तो 22 से 30 वर्ष तक के वर्ष महत्वपूर्ण समझें। किसी भी एक प्रश्न का उत्तर केवल मात्र उसी रेखा पर दृष्टिपात करने से नही मिल सकता। यदि हाथ में प्रबल रूप से मंगल, शनि राहु आदि का दुष्प्रभावः रेखा से स्पष्ट हो तो समझे विवाह के वर्ष 28 के उपरान्त ही प्रभावपूर्ण रहेंगे। चाहे कितनी ही बुध क्षेत्रस्थ विवाह रेखा निकट हो, साधक बाधक-योग देखना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त विवाह हो जाना मात्र जीवन में वैवाहिक आनन्द या सुख का प्रतीक नही होता है। पत्नी-पति का स्वभाव मिलना, शारीरिक आरोग्यता क्षमता आदि भी होना आवश्यक है जिनके प्रभाव में भारत में कम किन्तु विदेशों में अत्यधिक तलाक की प्रथा के अनुसार कितने ही युगल बन्धन टूटते रहते हैं। इन सब बातों का विचार करना भी परमावश्यक है। अभी तक तो बुध क्षेत्रस्थ रेखा का ही विचार किया गया है।

अब चन्द्र-क्षेत्र प्रभाविक रेखाएंः- जो भाग्य रेखा से सम्बन्ध बनाती हों, विवाह रेखा मानी गई हैं इन रेखाओं की उत्पति चन्द्र क्षेत्र की सबलता, निर्बलतार किसी अवरोध रेखा से दूषित होना, सभी बातें ध्यान में रखें। चन्द्र क्षेत्र पर विवाह रेखाओं की संख्या भी देखनी चाहिये। यदि थोड़े-थोड़े अन्तर से यह रेखा, एक की समाप्ति से पहिले ही दूसरी, और दूसरी की समप्ति से पहिले ही तीसरी इसी तरह रेखायें बनी हों। और हृदयरेखा शनि की अंगुली (मध्यमा अंगुली के मूल मे गई हो तो अधिक विलासिता, काम वासना के कारण चन्द्र क्षेत्रस्थ रेखा की संख्यानुसार 1-2-3 पत्नियाँ अथवा सम्बंध होते हैं। जैसे जन्म कुण्डली में ग्रह बल होते हैं। वैसे ही हाथ में ग्रह पर्वत की उच्चता अनुच्चता आत्युच्चता का प्रभाव होता है। सप्तवर्षीय नियम द्वारा जिस वर्ष में चन्द्रस्थित प्रभाव रेखा भाग्य रेखा से संयोग कर वही हो, वह वर्ष विवाह का समझें। जिस ग्रह का पर्वत-स्थान सबल हो उसी के महीनों में विवाह होता है। चन्द्र क्षेत्र की ऐसी रेखायें प्रेम-विवाह आदि को विशेषकर बताती हैं।

शुक्र पर्वत स्थित प्रभाव रेखायें- जीवन रेखा से शुक्र क्षेत्र भाग्य रेखा से सम्बंध बनाने वाली रेखायें भी विवाह की संख्या बताती हैं। शुक्र क्षेत्र से सरल व सीधी प्राभाविक रेखा यदि भाग्य रेखा से संयोग बनाये तो संयुक्त स्थल पर वर्ष में विवाह समझें। यदि ऐसी अनेक रेखायें हों तथा उससे पहिले पत्नी-पति का अभाव चिह्न बना हो तो पुनः विवाह का योग समझें। जीवन रेखा के साथ चलने वाली रेखायें भी भिन्न-भिन्न हाथों में भिन्न-भिन्न प्रभाव डालती हैं। यह विषय जीवन का महत्वपूर्ण विषय है। जिसके लिये अत्यधिक अध्ययन, मनन व अनुभव के द्वारा सफलता मिलना सम्भव है। रेखाओं की आकृति, गति आदि पर ध्यान देने से तत्रस्व पर्वत की स्थिति से पति-पत्नी की आकृति गुणादि के विषय में भी जाना जा सकता है। यह तो सर्व सम्मत बात है कि किसी भी क्षेत्र की स्पष्ट सुन्दर सबल रेखा से वैवाहिक जीवन सानन्द व्यतीत होता है। किन्तु ऐसा नही होने पर वैवाहिक जीवन दुःखद हो जाता है। उसे भी उसके अन्तर्गत विचार लेना सांगोपांग विचार बन जायेगा। अतः निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखें। यह ठीक है यदि लेख की स्पष्टता के लिये श्भ्ंदक च्तपदजेश् हस्त छाप’ भी साथ हो तो अधिक अच्छा रहे। परंतु हस्त छाप के चित्र के स्थान पर हस्त्र चित्र दिया गया है।

1. बुधक्षेत्र स्थित विवाह-रेखा स्पष्ट सुन्दर, सबल हो तो वैवाहिक जीवन सुखद रहेगा।
2. यदि यही रेखा आगे बढ़ कर सूर्य रेखा तक पहुँचे तो अधिक मान- प्रतिष्ठा धन-लाभ व सुन्दर भविष्य बनेगा।
3. यदि यह रेखा सूर्य-रेखा को काटे तो अशुभ फल होगा, सूर्य रेखा का हृदय रेखा से दूर रहने पर यह फल होगा अन्यथा नही।
4. यह विवाह रेखा यदि हृदय रेखा पर शुरू से ही झुके या धीरे मोड़ लेती झुके तो अशुभ फल कारक समझें।
5. यदि इसी रेखा में से अन्य रेखायें निकल कर हृदय रेखा को छू लें तो संख्यानुसार स्त्री व पुरूष की मृत्यु सूचक है या अन्य अशुभ फल रोग अपमान आदि की सूचक समझें।
6. यदि इस रेखा पर द्वीप- चिह्न हो तो मतभेद, अलगाव की भावना फल लायेंगी। द्वीप चिह्न का आदि मध्य अंत के स्थानों पर होने से क्रमशः प्रारम्भ मध्य व वृद्धावस्था में अशुभ फल होगा।
7. यदि यह विवाह रेखा टूटी हो तो निराशा, मृत्यु आदि समझें। स्त्री के हाथ में पुरूष का तथा पुरूष के हाथ में स्त्री के विषय में समझें।
8. इसी रेखा पर नक्षत्र-चिह्न होना भी स्त्री के लिये वैधव्य व पुरूष के लिय वियोग का प्रतीक है। अन्य योग भी देखना आवश्यक है केवल एक योग के आधार पर गलत धारणा से किसी को निराश या दुःखी करना शास्त्र के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करना होगा।
9. इसी रेखा में से छोटी-छोटी बारीक रेखायें निकलना रोग के लक्षण समझें।
10. इस रेखा के अन्त में त्रिशुलवत् रेखा विभाग हो तो रोग अशुभ फल, आचरण विषय में शुद्धता समझें।
11. सभी रेखाओं के लिये यह नियम ध्यान में रखना आवश्यक है कि रेखा का कटाव अन्य रेखा से होना अशुभ है। हाँ इसके साथ ही यह भी नही भूलना चाहिये कि कटने वाली रेखा यदि काटने वाली रेखा से सशक्त है तो अशुभ फल पूरा नही होगा। विपरीत होने पर अशुभ फल पूरी तरह घटित होगा। इसके अतिरिक्त द्वीप-चिह्न चाहे बुध क्षेत्रीय रेखा पर हो या चन्द्र या शुक्र क्षेत्रीय प्रभाव रेखा पर हो अवश्य अपना पर्वतानुसार स्थानानुसार आयु में अशुभ फल करेगा। प्राभाविक रेखा का भाग्यरेखा में मिलन होने के उपरान्त भाग्यरेखा यदि हल्की हो जावे तो भाग्य में धीरे-धीरे क्षीणता, शक्तिशाली हो जावे तो विवाह सौभाग्य वृद्धि कारक समझें। यदि भाग्य रेखा पर विवाह की प्रभाविक रेखा मिलन के उपरान्त द्वीप-चिह्न बन जाये तो पूरी तरह अशुभ समझें। निकृष्ट, समकोण, व्यावसायिक, दार्शनिक आदि सप्तविध हाथों में अलग-अलग विवाह रेखाओं का उद्गम शुभ-अशुभ फल निर्धारित है। मंगल रेखा, राहु रेखा आदि का प्रभाव भी इसी के अनुसार पड़ता है।

अब जन्म मासानुसार कुछ आवश्यक बातें इसी विषय पर-

(1) चैत्रमास में जन्मे स्त्री या पुरूष का विवाह, जन्म मास से 5 वें 7 वें 9 वें महिने में जन्मे स्त्री पुरूष से शुभ रहता है। यथा श्रावण, आश्विन व मार्गशीर्ष। विवाह के वर्ष 16, 18, 19, 21, 22, 25, 27, 30 तक। चैत्र कार्तिक माघ फाल्गुन में प्रायः शुभ-अशुभ ग्रहरेखा से 2-3 विवाह तक संभव है।
2. बैसाख में जन्म होने पर जन्म मास से 5, 7, 9 वें मास मे जन्में व्यक्ति से शुभ। 20 से 28 वर्ष तक सम्भव है। आषाढ़, भाद्रपद, मार्गशीर्ष व पौष शुभ हैं।
3. ज्येष्ठ मास में जन्मे व्यक्ति का विवाह प्रायः 18 से 26 तक सम्भव है। रेखा-दोष से 28, 30, 37 तक। जन्म मास से 5, 7, 9 वें मास में जन्मे व्यक्ति से विवाह या मित्रता शुभ है।
4. आषाढ़ का जन्म हो तो जीवन साथी का जन्म मास 5, 7, 9वां चुनिये। वर्ष विवाह 16, 18, 20, 21, 23, 25, 28, 32, 36, 37 तक होगा।
5. श्रावण मास का जन्म हो तो भी 5, 7, 9 वें मास में जन्मे साथी चुनिये। 14 से 21, 24, 26, 28, 32, 42 वर्ष तक सम्भव है।
6. भाद्रपद मे जन्म हो तो इसी महीने से गिनें 5, 7, 9वां मास जीवन साथी का जन्म मास हो तो शुभ। 16 से 23 तक 25, 27, 29, 32, 42 तक।
7. आश्विन में जन्मे व्यक्ति का 17 से 21, 23, 24, 28, 45 वें वर्ष तक।
8. कार्तिक में जन्में व्यक्ति का 15 से 20, 24, 25, 27, 28, 30, 32, 34, 42, 46, 52 तक।
9. मार्गशीर्ष में जन्में व्यक्ति का 17, 18 से 23, 25, 27, 28, 30, 32, 33, 35, 36, 38, 42, 46 वें वर्ष में।
10. पौष में जन्में व्यक्ति का 17 से 24, 27 से 31, 39 तक।
11. माघ मास में जन्में व्यक्ति का 14 से 21 तक 24, 25, 26, 28, 32, 41वें वर्ष में।
12. फाल्गुन में जन्में व्यक्ति का 14 से 24, 26, 32, 38, 42 तक।

जन्म मास से हर 5वां 7वां 9वां जन्म का मास जीवन साथी चुनने में शुभ समझा गया है।

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