
ज्यौतिष शास्त्र में रवि, चन्द्र, मंगल आदि सात ग्रहों को मुख्य स्थान दिया गया है एवं राहू-केतु को छाया ग्रह के रूप में माना है। मगर हमारे विचार में सात ग्रहों से भी कहीं अधिक इनका महत्व है। जब हम नवग्रह पूजन या नवरत्न का धारण करते हैं तो राहू-केतु गौण या छाया ग्रह कैसें? हमारे विचार से इनकी स्थिति एक राज दरबारी की तरह है, जो गौण होते हुए भी बड़ा महत्व रखते हैं। क्या कोई व्यक्ति इनको प्रसन्न किये बिना आगे बढ़ सकता है? इस लेख में केवल केतु ग्रह की ही व्याख्या की जायेगी।
अर्थ एवं स्वरूपः-
केतु का अर्थ है ध्वजा। इसका सही अर्थ ही कुण्डली में लिया जाता है। शुभ केतु विजय एवं यश की पताका लहरा देता है और अशुभ केतु भरे बाजार में इज्जत उतार देता है। राहू का स्वरूप धड़ है और केतु का स्वरूप पूछ है। इसका रंग मटियाला धूएं जैसा होता है। आंखे, मक्कार, टेढी, काईयाँ तथा बिलावत होती हैं। इसलिये इसका नग भी ब्ंजश् मलम यानी लहसनियाँ कहलाता है। इसकी दृष्टि पंचम, सप्तम और नवम होती है।
जाति एवं स्वभावः-
पाराशर होंरा शास्त्रम् के अनुसार इसकी जाति वर्ण-संकर है, और यह सदैव वक्रगति से चलता है। यह सत्य है कि केतु के प्रभाव मे जातक वर्ण संकर, मक्कार एवं गहरा चालबाज होता है। यह धनु राशि में उच्च एवं मिथुन राशि में नीच माना गया है। केतु के स्वभाव की तुलना मंगल के साथ की गई है। दुर्घटना, क्रोध, अग्नि एवं युद्ध आदि प्रभाव केतु और मंगल के एक जैसे हैं केतु में कुछ बातें ऐसी हैं जो मंगल में नहीं हैं। यह चालाक, चोर, चंचल डरपोक एवं गुप्त-प्रवृति वाला होता है। जब कि मंगल का केतु से ऊंचा स्थान है। अंतर केवल इतना है कि मंगल सेना नायक है, तो केतु घुमपेठिया है। जिसने भी गुप्तचर या सी. बी. आई. आदि में कार्य किया है, उनका केतु अवश्य प्रबल होता है।
रोगः-
केतु से प्रभावित व्यक्ति को चर्म रोग, सिर पीड़ा बवासीर एवं गुप्त रोग होते हैं शनि की युति होने पर कुष्ट रोग भी हो जाता है। मगर यह ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है।
व्यवसाय :-
केतु गुप्त है मक्कार है अतः राजनीति, गुप्तचर विभाग एवं सुरक्षा विभाग से गहरा सम्बन्ध रखता है। केतु के आश्रय में व्यक्ति कुशल राजनीतिज्ञ, गुप्तचर एवं संचालन करने वाला होता है। विज्ञान के क्षेत्र में गुप्त स्थलों की खोज समुद्र तल में गोते लगाने वाला, पुरातत्व विभाग में कार्य करने वाला, तथा सितारों की खोज करने वाला अन्वेषक शोधकर्त्ता, वकील, गुप्त रोगों का विशेषज्ञ एवं कुष्टरोग तथा चर्म रोग का डाक्टर आदि होता है। जिस जातक का केतु नीच राशि का होगा ऐसा जातक चोर, तस्कर एवं डाकू भी बन सकता है।
विभिन्न भावों में केतु की स्थिति :-
लग्न- लग्न में केतु मनुष्य को शराबी, मक्कार, डरपोक एवं चालाक बनाता है। ऐसे व्यक्ति की आँखें नीली य भूरी होती है तथा मुख पर फुंसियाँ या धुंधलापन होता है। ऐसे व्यक्ति गुप्तचर होते हैं, वाकपटु एवं सभी विद्याओं में निपुर्ण होते हैं। यदि कलात्मक ग्रहों की दृष्टि एवं युति हो तो ऐसा व्यक्ति कुशल अभिनेता होता है।
लग्न में केतु होने से इसकी पंचम दृष्टि सन्तान भाव पर तथा नवम दृष्टि नवम भाव पर पड़ती है। ऐसे जातक को सन्तान सुख कम ही प्राप्त होता है। तथा नवम भाव फल के सम्बन्ध में कुछ घिराव जरूर रहता है।
लग्न में मंगल एवं केतु हों तो जातक को आग लगने का भय रहता है साथ ही शनि की दृष्टि हो तो दुर्घटना, गोल एवं बाण आदि से चोट लगती है। केतु सिर में पीड़ा तथा मदहोशी देता है।
दूसरा भाव :- धन वांणी एवं कुटुम्ब का होता है, दूसरे भाव में केतु हो तो जातक वांणी द्वारा धन कमाता है अच्छा केतु जातक को ओजस्वी वाणी प्रदान करता है। एवं कुशल राजनीतिज्ञ, यश य कीर्ति प्राप्त करने वाला नेता बना देता है। केतु वकील भी बनाता है क्योंकि केतु झूंठ बोलने, बात बनाने, एवं बात में बात निकालने में चतुर होता है। महात्मा गांधी की जन्म कुण्डली के द्वितीय भाव में केतु था इसलिये वे कुशल वक्ता व सफल राजनीतिज्ञ थे। अगर केतु अशुभ प्रभाव में हो तो जातक झूठी सच्ची कथाएं एवं कविताएं रचकर अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करता है। सारहीन भाषण करता है। ऐसे व्यक्ति को यदाकदा धन प्राप्ति भी हो जाती है। यदि अशुभ हो तो जातक तुतला कर बोलता है।
तृतीय भावः- ऐसे जातक का भाई धूर्त एवं चालाक होता है। जिसके तीसरे भाव में हेतु हो उसका छोटा भाई या बहन जारज योग में पैदा हुआ होता है। वह पराक्रमी भी होता है, परन्तु उसकी विजय दावपेचों से होती है। यदि प्रभावहीन केतु के साथ मंगल का प्रभाव हो तो ऐसे जातक की भुजायें दुर्घटना से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं अथवा टेढ़ी हो जाती हैं। तृतीय भाव का केतु मनुष्य को भूत-प्रेतों का भक्त बना देता है। ऐसा व्यक्ति मतवाले साथियों के साथ धूमता है।
चतुर्थभावः- यदि चौथे भाव में केतु हो या केतु की दृष्टि हो तो व्यक्ति मित्र एवं भ्रातृ-प्रेम से वंचित रहता है। ऐसे व्यक्ति के मित्र दुरंगी चालें चलते हैं और माता कपटी स्वभाव की होती है। वह पर पुरूष को अधिक महत्व देती है। तथा वर्ण संकर सन्तान पैदा करती है। जातक की माता परिवार की बातों का सदैव विरोध करती है। चतुर्थ भाव पर कभी-कभी तो केतु के प्रभाव पर या शनि की दृष्टि होने पर निश्चय ही वर्ण-संकर सन्तान का जन्म होता है। यहाँ पर एक ऐसे ही बच्चे की कुण्डली प्रस्तुत है- लग्न तुला, दूसरे भाव में मंगल, छठे भाव में चन्द्रमा एवं राहू, सप्तम में शनि, अष्टम में शुक्र, नवम में सूर्य, दशम में बुध, बाहरवें भाव में केतु एवं वृहस्पति।
मातृभाव का मालिक शनि हो और उसकी युति केतु से हो तो भी जारज योग होता है।
दूसरी कुण्डली इस प्रकार है। लग्न वृश्चिक –लग्न में चन्द्र दूसरे राहू, तीसरे शुक्र, चौथे बुध, सूर्य, गुरू सातवें मंगल, आठवें शनि एवं केतु। यदि चतुर्थ भाव पर केतू के साथ-साथ शनि एवं मंगल का प्रभाव हो तो जातक की वाहन से दुर्घटना हो जाती है। या वाहन को आग लग जाती है। शुभ केतु गौ- धन एवं राज सम्मान देता है।
पंचम भावः- यह भाव सन्तान, मंत्रणा एवं प्रेमिका का होता है। पाँचवें भाव का केतु संतान एवं शिक्षा में बाधा डालता है। शिक्षा तिकड़म बाजी से पूर्ण हो ही जाती है। कोई न कोई सन्तान भी तिकड़म बाजी से घर आ जाती है। निश्चय ही जातक पर पुरूष के वीर्य की सन्तान को अपने घर पालता है। कभी-कभी दत्तक पुत्र का योग भी इसी केतु से बन जाता है। निम्न कुण्डली के स्वामी के घर एक दत्तक एवं एक वर्ण-संकर सन्तान पल रही है।
लग्न- कर्क पाचवें केतू छठे शनि सातवें सूर्य, चन्द्र एवं बुध नवम शुक्र दशम बृहस्पति एकादश में राहू व मंगल है। अतः यह निश्चित है कि ऐसा व्यक्ति पर-पुरूष की सन्तान पालता है और उसकी वास्वतिकता से अनभिज्ञ रहता है। ऐसे जातक की बड़ी भाभी उस पर आसक्त भी होती है। इन सब योगों के लिये पंचम भाव पर अन्य प्रभाव भी देखने आवश्यक हैं।
छठे भाव में :- केतु हो तो जातक के शत्रु गुप्त रूप से वार करते हैं। और गुप्तरूप से स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं। गुप्त रोगों की वृद्धि होती है। केतू के साथ यदि नीच शनि हो और कोई शुभ प्रभाव न हो बुध भी नीच हो तो चर्म रोग एवं कुष्ट रोग होता है ऐसे व्यक्ति का मामा शकुनी टाईप होता है।
सातवा भावः- यह भाव स्त्री, विक्रय साझेदारी एवं दैनिक व्यापार का होता है। यदि सातवें घर मे केतु हो या सप्तमेश पर शनि एवं मंगल का प्रभाव हो तो जातक की स्त्री को आग लग जाती है। उसकी पत्नी बात-बात में फरेब करती है और झूठ बोलती हे। वह चिल्ला-चिल्ला कर पति को परेशान करती है। यदि केतु के साथ शुक्र हो तो जातक की पत्नी की आंखें नीली बाल सुनहरी एवं वर्ण गौर होता है। जातक के साझीदार जातक को व्यापार में धोखा देते है यदा-कदा केतु के प्रभाव में जातक तस्करी की हुई वस्तुओं का व्यापार भी करता है। सप्तम भाव वीर्य का भाव है। यदि इसमें केतू हो तो उसके वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान भी होता है।
आठवां भाव :- आठवें भाव का शुभ केतु जातक को राज सरकार के खजाने की नौकरी देता है, धन देता है। उसे लाटरी का भी धन प्राप्त होता है। आठवाँ भाव मल-मूत्र विसर्जन का भी माना गया है। और केतु खूनी माना गया है। अतः आठवें भाव में केतु होने से जातक को खूनी व्वासीर होती है। यहाँ का केतु चतुर्थ स्थान पर दृष्टि डालता है अतः जारज योग भी माना जाता है। इसकी सच्चाई अन्य ग्रहों के प्रभाव को देख कर करनी चाहिये।
नवम भाव :- यह स्थान धर्म दान एवं भक्ति आदि का होता है। यहाँ पर केतु की स्थिति अत्यधिक गौर करने योग है। केतु लग्न एवं पंचम भाव को भी प्रभावित करता है। अतः जिस जातक के नवम भाव में केतु होगा ऐसा जातक व्यसनी होगा। शराबी जुआरी के अतिरिक्त धर्म के नाम पर गलत धन कमाने वाला होगा धर्म की आढ़ में वह अपने दोषों को छुपाता है। कभी-कभी ऐसा व्यक्ति मन्दिरों में मूर्ति एवं गहने आदि गुराकर बेच देता है। या मूर्तियों की स्मगलिंग करता है। ऐसा जातक अपने चोरी किये हुए धन को मन्दिर की मूर्तियों में भी छुपाता है। यदि शुभ केतु हो तो ऐसा जातक चोरीयाँ कर चोरी आदि धन से मन्दिर आदि धर्म स्थल बनवा देता है। उसकी साली उस पर आसक्त रहती है और उसके साथ सहवास करती है।
दशम भाव :- का शुभ केतु जातक को कुशल शासक एवं नीतिज्ञ बनाता है। ऐसा जातक वीर चक्र, परमवीर चक्र या अन्य उच्चपद प्राप्त करता है। अशुभ केतु की दशम भाव में अच्छी स्थिति नहीं मानी गई, ऐसी स्थिति मे जातक को पिता से सुख नही होता जातक के पीछे सी. बी. आई. लगी रहती है उसके घर में छापे पड़ते हैं। पिता दुव्यर्सनी होता है।
एकादश भावः- में केतु किसी भी प्रकार का क्यों न हो, शुभ ही माना गया है। ऐसे जातक के द्वार पर पहरा लगता है, यश दूर-दूर तक फैलता है। राज-सरकार में मान प्राप्त होता है। परन्तु बड़े भाई से कोई लाभ नहीं मिलता । उसका बड़ा भाई जायदाद एवं धन हडपने की कोशिश करता है। बड़ा भाई सौतेला या वर्ण संकर भी हो सकता। ऐसे व्यक्ति की एक सन्तान दुःखदायी होती है। जातक स्वयं रोगी होता है।
व्ययभाव :- इस भाव में केतु बुरे कार्यो में खर्च कराता है। मुकद्दमों मे जीत होती है। दुःख प्रभावीय केतु आंखों में पीड़ा देता है। यहाँ से केतु की पंचम दृष्टि होती है। जो माँ के कुकर्मो का व्यौरा देती है।
केतु के लिए दान :- लोहा, सप्तधान्य, तेल, ध्रूम्रवस्त्र, नारियल, बकरा एवं लहसुनियाँ का दान अशुभता के लिए शुभ कार्य करता है।
मंत्र :- ऊँ स्त्रां स्त्री स्त्रौं सः केतवे नमः। 7000 मंत्र जप संख्या है, मंगलवार के दिन जप करें। इन सब बातों के लिए ग्रह की दशा अर्न्तदशा जानना आवश्यक है।
Tags: astrologer, astrological remedies, astrology, grah, horoscope, ketu, ketu remedies, planet, remedies, varn-sankar