
चौरासी लाख योनियों में से सिवा मनुष्य के किसी को भी अपने जीवन के उद्देश्य का पता नहीं है। मनुष्य और पशु समान रूप से आहार, निद्रा, भय और मैथुन में प्रवृत्त होते हैं। पशु को केवल एक ही वस्तु नहीं मिली है और वह है विवेक। मनुष्य को पशुओं की अपेक्षा केवल विवेक ही अधिक मिला है। प्रभु ने मनुष्य को विवेक इसी लिये दिया कि वे इसका उपयोग करे और इसके द्वारा अपने सच्चे उद्देश्य की ओर बढ़े।
ईश्वर क्या है? गुरु क्या है? हम कौन हैं? कहाँ से आये है? कहाँ जाना है और अपने ध्येय स्थान तक पहुँचने के लिये हमें क्या करना चाहिये? इसका ज्ञान केवल मनुष्य को प्राप्त होता है। ऐसा सुन्दर शरीर और निर्मल विवेक पाकर विषयों के चिन्तन में ही समय बिताना मूर्खता है। पशु के समान विषयों मे रच-पचकर मरना कहाँ की बुद्धिमानी है?
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होंहि बिषय अनुरागी।।
मनुष्य शरीर बडे़ भाग्य से मिला है। बडे़ भाग मानुष तन पावा। ऐसे दुर्लभ शरीर को पाकर विषयों का चिन्तन करना अपने जन्मसिद्ध अधिकार मोक्ष को जानबूझकर खोना है। ये विषय नित्य नहीं हैं। यदि सौ वर्ष की आयु मानी जाये तो उसमें से पचास वर्ष तो हम सोकर नष्ट कर डालते हैं। शेष पचास वर्ष, मे बचपन का समय खेलकुद में, जवानी का भोग विलास में और उसके आगे विषय प्रपंच, घर गृहस्थी सँभालने में नष्ट हो जाता है। गुरुकृपा से कुछ काल ही हरि चिन्तन में लगते हैं। यह सौभाग्य भी कुछ ही पुरुषों को प्राप्त होता है। विषाद, व्याधि, रोग, शोक, परिताप आदि में जीवन का बहुमूल्य समय नष्ट होता है। श्वास आवे या न आवे इसका क्या भरोसा? महात्माओं ने विचार करके देखा है कि यह सब अनित्या है, अन्त में सब साथ छोड़ने वाले ही हैं- हम इन्हें अभी भले न छोड़ें-
अन्तहुँ तोहि तजैंगे पामर तू न तजै अबही ते।
इस सारी अनित्यता में एक ही नित्य वस्तु है और वह है हरि की शरण में जाना, हरि को पहचानना और पहचान कर सर्वतोभाव से उसी को अपनाना सच्चे सुख का यही साधन है-
सुखी मीन जहँ नीर अगाधा। जिति हरि सरन न एकौ बाधा।
परमात्मा की शरण में जाकर उनका अनन्य भजन करना ही परम साधन है, वही एकमात्र नित्यव्रत है-
उमा कहौं में अनुभव अपना।
संत हरिभजन जगत सब सपना।।
परमात्मा की शरण में ही परमगति है। तीनों काल में वहाँ एक रस है। उस भगवच्चरण कमल की प्राप्ति के लिये यज्ञ, तप, दान, पूजा आदि अनेक साधन बतलाये गये हैं- इस युग में यज्ञ, तप आदि सहज ही सम्भव नहीं। यज्ञ सफल होने के लिये यह आवश्यक है कि देश, काल, द्रव्य शुद्ध हो। कर्मकाण्ड प्रायः लोप-सा हो गया। द्विजातिमात्र प्रायः सन्ध्या पूजन तक छोड़ बैठे हैं। यज्ञ तथा कर्मकाण्ड में जरा सी चूक हो जाने पर पुण्य के स्थान में पाप होना भी सम्भव है। यदि हम धर्म की रक्षा करना चाहें तो गोस्वामी तुलसीदास जी की नानापुराण- निगमागम-सम्मत पवित्र श्रीरामायणजी का पाठ करें और तदनुकूल आचरण बनावें। सबसे सरल साधन नाम स्मरण और नाम संकीर्तन ही आजकल के लिये है। इसमें कोई भेदभाव नहीं है। ब्राह्मण और चाण्डाल समान रूप से भगवन् का नाम ले सकता है। साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिये कि इससे भी वह वस्तु प्राप्त होती है। जो योग यज्ञ आदि से। अन्तःकरण की शुद्धि, ब्रह्मविद्या की प्राप्ति सब कुछ नाम स्मरण से सुलभ हो जाता है। श्रद्धा विश्वास पूर्वक नाम की रट लगानी चाहिये तब उसका आनन्द मिलेगा। चित्तरूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाला केवल श्रीहरिनाम ही है। वियोग विषाद के भयंकर हाहाकार भरे जगत् में दुःख से छूटने का कोई उपाय है तो बस भगवन्नाम का संकीर्तन ही है। ब्रह्मविद्या का आधार भी नाम है। नाम का स्मरण और संकीर्तन श्रद्धापूर्वक होना चाहिये। यों तो भाव, कुभाव, उनख, आलस्य चाहे जिस प्रकार भगवान् का नाम लिया जाये उससे दसों दिशाओं में मंगल ही है। नाम लेते ही संसार सागर सूख जाता है। मल, विक्षेप, और आवरण दूषित अन्तःकरण में नाम के द्वारा एक दिव्य प्रकाश का आविर्भाव होता है और सारा कल्मष सदा के लिये मिट जाता है।
विश्वास करके भगवन्नाम का आधार पकडे़ं। पूर्ण श्रद्धा के साथ नाम का आश्रय लें। श्रद्धा से ही ज्ञान प्राप्त होता है। हरिनाम की रट लगाते ही आनन्द का समुद्र उमड़ आता है। भगवान् के जितने असंख्य नाम हैं उतनी ही सबमें अपार शक्ति है। किसी भी नाम का आधार लेकर मनुष्य अपने अंतःकरण को शुद्ध कर सकता है। नाम का जप हर समय होता रहे। रात-दिन जो हम अपने मन को विषयों के चिंतन में लगा रहे हैं। उसे वहाँ से बलपूर्वक हटाकर भगवत् चिंतन और भगवत् स्मरण में लगावें। इस युग में सबसे सरल और सबसे अधिक फल देनेवाला साधन भगवन्नाम का स्मरण तथा कीर्तन ही है। अभ्यास बढ़ने पर सब काम करते हुये ही हम अहर्निश सोते-जागते भगवन्नाम स्मरण कर सकते हैं उपनिषदों में नाम के स्मरण की बड़ी महिमा है। उससे जीवमात्र का कल्याण होता है।
प्रणवों धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्वव्यं शरवत्तन्मयो भेवत्।।
शुद्व आचार से ही विचारों में शुद्वता आती है और शुद्ध विचारों से ही जीवन शुद्ध होता है। आहार के व्यवहार की शुद्धि करके नाम का चिन्तन करने से शीध्र लाभ होता है। सात्विक अन्न भी यदि न्यायपूर्वक कमाई का नहीं है तो उससे हानि ही होती है और भजन साधन में विध्न ही पहुँचता है। इसलिये यह ध्यान रहे कि जो पैसा हम कमाते हैं वह न्यायपूर्वक अर्जित हो। न्यायपूर्वक अर्जन किये हुये धन से जो सात्विक भोजन होता है उससे बहुत शीध्र लाभ होता है। आहारानुसार ही मन बनता है। मन शुद्ध हुये बिना भक्ति का रस प्राप्त नहीं होता। शुद्ध अंतःकरण में ही भगवद्भक्ति ठहरती है और आचरण शुद्ध हुये बिना अन्तःकरण शुद्ध हो नहीं सकता। इसलिये इन्द्रियों के संयम के साथ-साथ नाम स्मरण हो तो शीध्र ही भगवत् चरणों में अनुराग होता है। और सब साधनों का परम फल श्रीहरि चरण में अनुराग ही है और इसी में मनुष्य जन्म की सफलता है।
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