अचूक हनुमत मंत्र

अचूक हनुमत मंत्र

श्रीहनुमानजी की उपासना से सम्बन्धित एक अचूक प्रयोग लेख रूप में लिपिबद्ध किया जा रहा है। आशा है, पाठक गण श्रद्धा-विश्वास पूर्वक इससे अवश्य लाभ उठायेंगे-

प्रयोग विधि-
किसी भी परोपकार-भावना या उचित एवं योग्य स्वकार्य की सिद्धि के लिये यह प्रयोग किया जा सकता है। किसी भी मास में शुक्लपक्ष के मंगलवार को इसका श्रीगणेश कर सकते हैं, परंतु उस दिन रिक्ता (4-9-14) तिथि एवं प्रयोग-कर्ता की राशि की राशि से 4 थे, 8 वें या 12 वें चन्द्रमा का होना निषिद्ध है। जननाशौच या मरणाशौच में भी इसका प्रारम्भ नहीं करना चाहिये। यदि प्रयोग-काल में ऐसा कोई संयोग आ ही जाये तो किसी कर्मनिष्ठ कुलीन ब्राह्मण के द्वारा इसे पूर्ण कराना चाहिये, बीच में छोड़ना उचित नहीं है।

पुरूषों के अतिरिक्त ऐसी महिलायें भी इसका अनुष्ठान कर सकती है, जिनका प्रौढावस्था के बाद प्राकृतिक रूप से मासिक धर्म सदा के लिये बंद हो चुका हो। प्रयोग के समय क्षौरादि कर्म का त्याग एवं सात्त्विक आहार के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है। एक ही समय भोजन किया जाये तो अति उत्तम है, पर यह अनिवार्य नहीं है, परंतु दो बार से अधिक अन्न ग्रहण करना वर्जित है।
प्रयोग काल के बीच में यदि देव-कृपावश संकल्पित कार्य की सिद्धि हो जाये तो भी प्रयोग को पूरा करना ही चाहिये; अन्यथा बने हुए कार्य के बिगड़ने की सम्भावना रहती है।

प्रयोग-
प्रयोग प्रारम्भ के लिये शुक्ल पक्ष के जिस मंगलवार का निश्चय किया जाये, उसके पहले दिन सोमवार को सवा पाव अच्छा गुड़, एक छटाँक भूने हुए अच्छे चने और सवा पाव गाय का शुद्ध घी संग्रह कर लें। गुड़ के छोटे छोटे इक्कीस टुकड़े कर लें, शेष वैसे ही रहने दें। स्वच्छ रूई की 22 फूल बत्तियाँ बनाकर घी में भिगो दें। तीनों वस्तुएँ अर्थात् गुड़, चने और बत्ति सहित घी अलग अलग तीन स्वच्छ एवं शुद्ध पात्रों में रखकर घर में किसी एक स्वच्छ ऊँचे स्थान या आलमारी में ढककर रख दें, जहाँ बच्चों के हाथ न पहुँच सकें। उनके पास ही एक दियासलाई और एक अन्य छोटापात्र-छन्नी आदि, जिस में प्रतिदिन उपर्युक्त वस्तुएँ ले जायी जा सकें, भी रख दें, जिससे प्रतिदिन इधर-उधर पात्र की खोज न करनी पड़े। बस, सामग्री तैयार है। शेष रहा केवल एक स्वच्छ पवित्र श्रीहनुमानजी का मन्दिर, जो गाँव या शहर के कोलाहल से दूर जितने भी निर्जन एवं एकान्त स्थान में हो, उतना ही अच्छा है; अन्यथा अपने निवास स्थान से कम से कम सवा डेढ़ फर्लीग दूर होना तो अनिवार्य ही है।

जिस मंगलवार से प्रयोग आरम्भ करना हो, उस दिन हो सके तो ब्राह्ममुहूर्त में अन्यथा सूर्योदय के पहले अवश्य उठ जाना चाहिये। फिर शौचादि से निवृत्ति हो स्नान कर कपड़े पहन ललाट पर रोली चन्दन आदि लगाकर सबसे पहले वहाँ जायें जहाँ तीनों पात्रों में गुड़, चने और घी बत्ति रखी है। वहाँ पहले से ही रखे हुये छन्नी आदि खाली पात्र में एक गुड़ की डली, 11 चने, एक घृत-बत्ति और दियासलाई लेकर पवित्र धुली हुई रूमाल आदि किसी स्वच्छ पवित्र वस्त्र से उसे ढक लें। वहाँ से लौटते समय मन्दिर में श्रीहनुमानजी की मूर्ति के सम्मुख पहुँचने तक न तो पीछे न दायें-बायें ही घूमकर देखें और न छन्नी उठाने के बाद घर में, रास्तें में, या मन्दिर में किसी से एक शब्द भी बोलें, चाहे कोई कितने भी आवश्यक कार्य के लिये आवाज क्यों न देता हो। इस प्रकार पूर्णरूप से एकदम मौन रहें।

बिना जूता-चप्पल पहने श्रीहनुमानजी के सम्मुख पहुँचकर बिना इधर-उधर देखे मौन धारण किये हुए ही पहले घी की बत्ति जलायें, फिर 11 चने और 1 गुड़ की डली श्रीहनुमानजी के सामने रखकर साष्टांग प्रणाम कर हाथ जोड़ पूर्वसंकल्पित होकर अपनी मनःकामना की सिद्धि के लिये मन ही मन श्रद्धा, विश्वास, भक्ति एवं प्रेमपूर्वक उनसे प्रार्थना करें। फिर यदि कोई अन्य प्रार्थना, स्तुति श्रीहनुमान चालीसा आदि का पाठ करना चाहें तो मौन ही रहकर करें। घर की ओर जाने के लिये मूर्ति के सामने से हटने के बाद जब तक अपने घर पहुँचकर वह खाली पात्र निश्चित स्थान पर न रख दें, तब तक पीछे या दायें-बायें घूमकर न तो देखें और न किसी से एक शब्द भी बोलें, मौनी ही बने रहें। फिर छन्नी रखकर सात बार ‘राम-राम’ कहकर मौन भंग करें। इसी क्रम से 21 दिनों तक लगातार एक सा प्रयोग करते रहें। रात्रि में सोते समय श्रीहनुमान चालीसा का 11 पाठ करके अपनी मनःकामना सिद्धि के लिये प्रार्थना करना अनिवार्य है।

बाईसवें दिन मंगलवार को नित्यकर्म से निवृत्ति हो सवा सेर आटे का एक रोट बनाकर गोबर की अग्नि में सेंककर पका लें, यदि असुविधा हो तो पाव-पाव की पाँच रोटी बनाकर उनमें आवश्यकतानुसार गाय का शुद्ध घी और अच्छा गुड़ मिलाकर उनका चूरमा बना लें। 21 डलियों के बाद जो गुड़ बचा हो, उसे चूरमे में मिला दें। फिर चूरमे को थाली में रखकर बचे हुए सारे चने तथा शेष घी सहित 22 वीं अन्तिम बत्ति लेकर प्रतिदिन की तरह ही मौनपूर्वक बिना पीछे या दायें-बायें देखे मन्दिर में जायें और बत्ति जलाकर श्रीहनुमानजी को चने एवं चूरमे का भोग लगाकर उसी प्रकार घर को वापस आयें और घर में प्रवेश करने के बाद ही मौन भंग करें। प्रयोगकर्ता उस दिन दोनों समय केवल उसी चूरमे का भोजन करे। शेष चूरमें को प्रसाद रूप में बाँट दें।
ऐसा करने से श्रीहनुमानजी की कृपा से मनोरथ अवश्य सिद्ध होता है। किसी कारणवश प्रयोग में भूल भी हो जाये तो निराश न हों, उसे फिर करें। श्रीहनुमानजी श्रद्धालु, विश्वासी, आस्तिक, सच्चे साधक की मनःकामना अवश्य पूर्ण करते हैं।

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