एकाग्रता में अलौकिक ऊर्जा

एकाग्रता में अलौकिक ऊर्जा

अनेक व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में सफल हैं या नहीं? यह निर्णय करना कठिन कार्य नहीं है। किन्तु जब हम सफल और असफल व्यक्तियों के बीच अंतर के कारणों को ढूंढ़ने लग जाते हैं तो मुश्किल में पड़ जाते हैं। किसने कितने समय तक कौन सा कार्य किया इसे आधार बनाकर लोग सफलता और असफलता का अक्सर मूल्यांकन करते हैं। तथापि यह सही मापदण्ड नहीं है। अपने उद्ददेश्य को सिद्ध करने के लिये किसने कितनी बुद्धिमत्ता के साथ अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों का सदुपयोग किया, यह कहीं अधिक कारगर और महत्वपूर्ण मापदण्ड है। सफलता और असफलता के बीच अंतर में समय का तत्व गौण है, जबकि-बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से शक्तियों का सदुपयोग एक प्रधान तत्व है।
बुद्धियन्तापूर्ण ढंग से शरीर और मानसिक शक्तियों का सदुपयोग एकाग्रता का केन्द्र बिन्दु है। संभवतः यही कारण है कि जो कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी किसी एक विषय पर चित्त को एकाग्र करके सफलता प्राप्त करते देखे जाते हैं, जबकि शक्तिशाली व्यक्ति अपने मन मटकाव के कारण अपने ध्यान को केन्द्रित न कर सकने के कारण असफलता प्राप्त करते हैं। सचमुच एकाग्रता एक वेगवान ऊर्जा है और इसके फलस्वरूप कुछ सीमाओं के भीतर, मनुष्य जो चाहे हासिल कर सकता है।

एकाग्रता क्या है :-
चित्त की एकाग्रता एक प्रकार की सहन शक्ति है, यह आंतरिक मनोबल है, यह मानसिक दृढ़ संकल्प है, धैर्यपूर्वक किये जाने वाले कार्य का यह परिणाम है। एकाग्रता मूलतः चुनाव मूलक है, अर्थात् अन्य सब बातों को छोड़कर इसमें किसी एक बीज पर अपने मस्तिष्क और शक्तियों को स्थिर करना पड़ता है। एकाग्रता अथवा ध्यान, वस्तुतः एक ऐसी शक्ति है जो किसी कार्य को सिद्ध करने में उपयोगी सेवा प्रदान करती है, विचारों के बहकाव से चित्त को सुरक्षा प्रदान करती है, मनुष्य की उपलब्धि को सुनिश्चित बनाती है, उसके परिश्रम को पुरस्कृत करती है, उसके प्रयत्नों में सिद्धि सभ्यता का गुण उत्पन्न करती है।

एकाग्र ध्यान से कल्पना को साकार होने की स्वर्ण सन्धि सुलभ हो जाती है। जिन व्यक्तियो ने अपनी जीवन में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं और महान कार्य किये हैं वे अपनी स्वाभाविक मनः प्रकृतियों की तुलना में चित्त की एकाग्रता पर कही अधिक अवलम्बित रहे हैं।
किसी विशिष्ट समस्या या विषय पर ध्यान केन्द्रित करके जब तक सफलता हाथ न लग गयी, उस समस्या या विषय पर चित्त को पूर्णतया स्थिर करके ही वे अपने कर्म पथ पर बढ़े हैं।

पांच सिद्धान्तः-
एकाग्रता की मानसिक शक्ति के विकास और प्रयोग में निम्नलिखित पांच सिद्धान्तों का पालन उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

1. उत्कट रूचि :- सर्वप्रथम जो कार्य पूरा करना हो उसमें तीव्र उत्कृष्ट और सक्रिय रूचि होनी चाहिये। काम चाहे कोई भी हो, यदि मनुष्य उसमें प्रबल रूचि दर्शाये, मन-प्राण से उसमें जुट जाये, खुद को उसमें तल तक डूबो दे, तो सफलता की मंजिल दूर नहीं रह सकती। यदि किसी विषय में स्वाभाविक रूचि हो तो उन उपायों और साधनों को ढूँढ़ना जरूरी है, जो सफलता के प्रयत्नों को प्रभावकारी बनाने के लिये रूचि को प्रोत्साहित कर सकें। यदि वर्तमान परिश्रम और उसमें उत्पन्न नितशा पर विचार करने की अपेक्षा भविष्य में इच्छित परिणामों पर ध्यान दिया जाये तो ऐसे उपाय ढूँढ निकालना कठिन काम नहीं है।

2. सूचना सामग्री संग्रह :- दूसरे कर्म को फलीभूत बनाने वाली विचार धारा के लिये सुव्यवस्थित ढंग से उपयुक्त सामग्री का संग्रह आवश्यक है। विचारों के पिष्टिपेषण से बचा जा सकता है बृद्धि को तेज बनाया जा सकता है। अनुभव को आंच पर परखकर निर्णयों को सही बनाया जा सकता है एवं निष्कर्ष फलदायक बन सकते हैं। यदि सोचविचार की शक्ति कुठित हो गयी, विचारों में बासीपन आ गया, मस्तिष्क भर गया तो प्रयत्नों में सफलता मिलना मुश्किल है।

3. तथ्य विभाजनः- सूचनाओं के संग्रह के उपरांत समस्या से संबंधित बातों को मुख्य तथ्य और गूढ़ बातें इन दोनों वर्गो में विभाजित करना चाहिये तथा मुख्य तथ्यों को प्रधानता देना चाहिये। गौण (गूढ़) बातों की उपेक्षा की जा सकती है।

4. सहजता :- समस्या या विषय और उस पर विचार को सहज रूप में लेना चाहिये। सहजता से मानसिक और शारीरिक शक्ति का कुशलतापूर्वक और मितव्ययिता के साथ उपयोग करना संभव होगा। परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही बोझिल, प्रतिकूल, अनावश्यक और अग्कुल व्याकुल करने वाली हां, प्रभावशील बनने के लिये मनुष्य को धैर्यपूर्वक तथा सहज और हल्का होकर काम करने की आदत डालनी चाहिये। चाहे कितना ही कठिन काम हो, चाहे कितना ही जटिल विचार हों, चाहे कितनी ही उत्तेजनापूर्ण और भड़काने वाली स्थिति हो, सफलता के अभिलाषी मनुष्य के लिये यह आवश्यक है कि वह अपना शरीर स्थिल, रखे और मन स्वच्छ तथा शांत रखे। हाँ सुनिश्चित दिशा में उसे अपने मस्तिष्क को अधिक से अधिक केन्द्रित अवश्य रखना चाहिये। तनावपूर्ण मानसिक और शारीरिक स्थिति को शांत करने के लिये सबसे सरल ओैर उपयोगी उपाय यह है कि यह कुछ समय के लिये मन-वचन-कार्य की गतिविधियों को रोक कर निढ़ाल और निश्चेष्ट पड़ जाना चाहिये।

5. निरन्तर प्रयत्नः- मस्तिष्क की बनावट कुछ ऐसी है कि लगातार कोशिशों के बावजूद वह रिक्त होता रहता है। हाँ पुनः प्रयत्न करने पर वह भर अवश्य जाता है। अतएव प्रयोजन सिद्ध करने के प्रयन्तों में शिथिलता नहीं आनी चाहिये। क्योंकि समस्या का अंतिम समाधान कभी-कभी बड़े ही असंभावित तरीके से मिलता है। कार्य हमारी चेतना का अवचेतन भाग होना चाहिये।

किसी समस्या पर काफी लम्बे समय तक सोच विचार करने बैठना भी ठीक नहीं है। उससे विचार बासी पड़ जाते हैं दिमाग कुन्द पड़ जाता है और समस्या सारहीन हो जाती है। यदि काफी लम्बे समय तक समस्या से जूझ कर भी निदान समझ में न आये तो मन को किसी दिशा में मोड़ देना, विचारों को बदल देना या शारीरिक विचलन उपयोगी सिद्ध हो सकता है। कार्यकलापों में परिवर्तन और मानसिक केन्द्रीयकरण में अपर से विरोधाभास दिखलाई देता है, परन्तु गहराई से सोचने पर सुनियोजित विचलन भी केन्द्रीभूत करने का यही एक उपाय है।

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