सदगुरू की महिमा

सदगुरू की महिमा

अनेक जन्मों के संस्कार जब अभिव्यक्त होकर इस अवस्था में आते हैं कि उन पर भगवत्कृपा हो सके तब मनुष्य के अनतःकरण में यह लालसा पैदा होती है कि मुझे अपने परम लक्ष्य परमात्मा को पहचानने के लिये प्रयत्न करना चाहिये। सत्संग और सद्विचार के आधार पर इस लालसा को उजीवित एवं उद्दीप्त करना चाहिये। जब ऐसा परिवर्तनीय समय आये तब शिष्य को अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा देनी चाहिये। कहीं प्राचीन असत्कर्मो की संस्कार धरा आकर इसको दबा न दे, इसलिये ऐसे शुभ अवसर जीवन में जब आते हैं। तब परिक्षा के तत्व भी साथ लाते हैं। अर्थात् ऐसे समय में बहुत बडी कठिनाईयाँ भी सामने आती हैं कि कौन सा साधन किया जाये साधारण साधक को अपने पूर्व जन्म की प्रवृत्तियों ओर वर्तमान अधिकार का तो पता होता नहीं, इतनी मंजी हुई बुद्धि भी नहीं होती कि वह अपने अधिकार के अनुसार साधन का चुनाव कर सके। इसी समय बहुत से साधक किसी भी साधना की प्रशंसा सुनकर उन्हें करने लग जाते हैं, परन्तु अपनी ही बुद्धि से निश्चित होने के कारण उस पर उनका दृढ़ विश्वास नहीं हो पाता। वे जब कभी कहीं दूसरे साधन की प्रशंसा सुनते हैं, तब उनका मन और भी विचलित हो जाता है, ओर वे अपने वर्तमान साधन को त्रुटि से युक्त समझकर दूसरी साधना शुरू कर देते हैं यह एक प्रकार से साधन का व्यभिचार है, परन्तु जिसका विवाह ही नहीं हुआ, उसके सतीत्व का क्या प्रश्न? यह निश्चित है कि दस वर्ष जप करने पर भी उस मंत्र के विषय में कभी भी आपके मन में संशय का उदय हुआ तो समझना चाहिये कि अभी आप वहीं हैं, जहाँ दस वर्ष पहले थे, कयोंकि आपने अनाधिकार उस मार्ग पर चलना प्रारम्भ किया है, जिसमें न तो आपको कुछ समझ है ओर न आप सही-सही अनुमान ही कर सकते हैं। आज कृष्णा का ध्यान, कल शिव का ध्यान, आज द्वादशाक्षर तो कल पंचाक्षर, आज कैलास की ओर तो कल कन्याकुमारी की ओर यह कोई साधना नहीं है, इस प्रकार कहीं भी नहीं पहुँच सकेंगे। साधना के लिये ऐसे विश्वास की आवश्यकता हैं जो आकाश से भी विशाल हो, समुद्र से भी गम्भीर हो, सुमेरू से भी भारी और वज्र से भी कठोर हो। परन्तु साधना पर ऐसा विश्वास प्राप्त कैसे हो?

ऐसा विश्वास प्राप्त होता है तब, जब साधना का उद्गम हृदय का स्पर्श करने वाला हो। ऐसा तभी हो सकता है जब हृदय के आन्तरिक रहस्य को जानने वाले और उस साधना के द्वारा लक्ष्य तक पहुंचे हुये महापुरूष ने साधक को स्पष्ट रूप से साधना से साध्य तक का मार्ग दिखला दिया हो। साध्य और साधक के बीच की दूरी ही साधना है, जो एक को दूसरे के निकट पहुंचाती है, जिसे साधक के अधिकार ओर साध्य के स्वरूप का पता नहीं है वह साधना को भला, कैसे जान सकता हैं? इससे सर्वज्ञ महापुरूष ही साधना का निर्देश करने के अधिकारी हैं। जीव का शिव से गठबन्धन कराना साधारण पुरोहित का काम नहीं है यदि ऐसा पुरोहित मिल जाये, मनुष्य उसे ढूंढ़ निकाले तो उसके पुरूषाकार का अधिकाश वहीं समाप्त हो जाता है, वे ऐसा सूत्र बांध देते हैं, जो कभी टूटता ही नहीं। परन्तु ये पुरोहित हैं कौन? मिलेंगे कहाँ? मिलें भी तो इन्हें पहचाना कैसे जाये?

वर्तमान युग को आधुनिक लोग तो उन्नति का युग कहते हैं, परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये तो अधःपतन का ऐसा निकृष्ट युग कभी नहीं आया था। प्रताडना ओर विश्वाघात तो इस युग की विशेष देन हैं। आजकल ऐसे बहुत से लोग प्रकट हो गये हैं, जो अपने को भगवान् का संदेशवाहक अथवा स्वयं भगवान् बतलाते हैं भोले-भाले साधक उनकी मीठी-मीठी बातों में आकर अथवा उनके रहस्यात्मक वाग्जाल में फंसकर अपना सर्वस्व खो बैठते हैं ऐसी स्थिति में किस पर श्रद्धा की जाये? किसकी शरण में होकर आगे का मार्ग तय किया जाये? कैसे यह विश्वास अपने गन्तव्य स्थान तक पहुँचा सकता है? ये बातें ठीक होने पर भी श्रद्धालु और लगन वाले साधक पर लागू नहीं होती। उसकी दृष्टि में संसारी संपत्तियों को कोई मूल्य नहीं होता, उसकी श्रद्धा और लगन को कोई ठग नहीं सकता। वह आंख बंद करके संसार की ओर से सचमुच अंधा होकर भगवान् की ओर चलना चाहता है। दूसरी बात यह है कि प्रायः वे ही लोग ठगे जाते हैं। जो दूसरे को ठगना चाहते हैं। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि अहिंसा की शुद्ध प्रतिष्ठा होने पर साधक के सामने पशु पक्षी तक हिंसा नहीं कर सकते। यही बात श्रद्धावान् के सम्बन्ध में भी है उसको कोई धोखा दे नहीं सकता। उसे तो कवेल अपनी श्रद्धा संपत्तियों की ही रक्षा करनी चाहिये।

तब क्या किसी पर यों ही श्रद्धा कर लेनी चाहिये? कुछ भी छान बीन नहीं करनी चाहिये? अवश्य करनी चाहिये। ओर गुरू करने के पहले तो अवश्य ही कर लेनी चाहिये। पंरतु उस छान-बीन का स्वरूप दूसरा ही होता है। गुरूदेव के नाम श्रवण, दर्शन आलाप और स्मरण मात्र से ही प्राणों में शान्ति का संचार होने लगता है, चिर दिन की प्यास बुझने लगती है, घोर अतृप्ति में भी तृप्ति का अनुभव होने लगता है, जिनकी प्रतीक्षा थी, जिनके लिये प्राण फड़फड़ा रहे थे, जिनके बिना मनुष्य अंधे की भांति भटक रहा था, उन्हीं के मिलने पर हृदय शीतल न हो जाये ऐसा नहीं हो सकता। गुरूदेव की यह सबसे बड़ी पहचान है , परन्तु यह पहचान भी सर्वसाधारण के लिये व्यावहारिक नहीं है। महापुरूष शरीर ओर अनतःकरण से ऊपर उठे रहते हैं भगवान् से एक रहते हैं इसलिये उनकी कोई व्यावहारिक पहचान होती भी नहीं। वस्तुतः वे परमार्थ स्वरूप हैं। भगवान् ही गुरू और गुरू ही भगवान् हैं, यह केवल भाव नहीं है कयोंकि परमार्थ सत्य वस्तु के सिवा ओर कौन दिखा सकता है? इसी से जन्मों तक भटकने के बाद जब अनतःकरण उनके दर्शन के योग्य होता है, तभी वे कृपा करके दर्शन देते हैं और अपने ज्ञान एवं शक्ति से अपने स्वरूप में मिला लेते हैं जिसे परमार्थतत्व अथवा भगवान्! कहते हैं उन्हीं के मूर्तिमान्! अनुग्रह का नाम गुरू है। गुरू दीख पड़ने वाला शरीर भौतिक शरीर नहीं है।, दीख पड़ने वाला रूप मनुष्य रूप नहीं है, वह तो विशुद्ध चैतन्य है, भला इस जड जगत् में विशुद्ध चेतन के अतिरिक्त ओर ऐसा कौन है, जो अज्ञान का पर्दा फाड़कर जीव को उसके स्वरूप की उपलब्धि करा दे? राजकुमार को जो यह चिरकाल से भ्रम हो रहा है कि मैं एक दीन, हीन, कंगाल भिक्षुक हूँ, उसको उसके स्वरूप और अधिकार का ज्ञान कराकर स्वपदपर सम्राट् के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले गुरूदेव ही हैं। शिष्य गुरू का उत्तराधिकारी है, अर्थात् गुरू का ज्ञान ही शिष्य के रूप में अभिव्यक्त हुआ है, ज्ञान की दृष्टि से परमात्मा, गुरू और शिष्य एक हैं। इस एकत्व के बोध में ही शिष्य की पूर्णता है, तभी तो यह शास्त्रवाक्य सार्थक हैं- गुरूः साक्षात् परं ब्रह्म इस रूप में शिष्य उन्हें पकड़ नहीं सकता, वे स्वयं ही शिष्य के सामने प्रकट होकर अपने को पकड़ा देते हैं।

गुरू की महिमा केवल शिष्य ही समझ सकता है, सो भी तभी जब गुरू उसके सामने अपना स्वरूप प्रकट कर देते हैं और कोई उन्हें जान नहीं सकता, क्योंकि वे अपने को गुप्त रखते हैं, शिष्य जानता है कि मेरे गुरूदेव सर्वज्ञ हैं, वे मेरे और चराचर जगत् के सम्पूर्ण रहस्यों के एकमात्र ज्ञाता हैं वे सर्वशक्तिमान् हैं, बडे बड़े देवता भी उनकी शक्ति से शक्तिमान् होकर अपना-अपना कार्य कर रहे हैं वे परम कृपालु हैं क्योंकि कृपावश होकर ही उनहोंने जीवों के उद्धार की लीला का विस्तार किया है। वे मेरे हृदय की बात जानते हैं, उसको पूर्ण करने की शक्ति भी रखते हैं, तब वे परम कृपालु उसे पूर्ण किये बिना रह ही नहीं सकते। यही उनका स्वरूप है जगत् में जितने भी जीवों का उद्धार करने वाले महात्मा प्रकट हैं, वे सब के सब उन्ही के लीलाविग्रह हैं। मैं उनको प्राप्त करके धन्य हो गया हूँ, शिष्य की यह दृष्टि कल्याणकारिणी नही अपितु कल्याण स्वरूपिणी है।

यद्यपि परमात्मा के ही समान गुरूदेव के लक्षण भी अनिर्वचनीय हैं, तथापि लोक व्यवहार के लिये शास्त्रों में उनका वर्णन भी होता है, उन आदर्श सद्गुण, सद्भाव और सत्कर्मों को देखकर, जो कि स्वभाव से ही सद्गुरू में होते हैं, साधक अपने जीवन का निर्माण करता है और ममुक्षु उन्हें महापुरूष के रूप में पहचानकर उनकी शरण ग्रहण करता है महापुरूषों के लिये तो लक्षणों की कोई आवश्यकता ही नहीं हुआ करती। उनका वर्णन केवल साधकों के लाभर्थ ही होता है सद्गुरू कैसा होना चाहिये? इसका वर्णन इस प्रकार मिलता हैं :-

मातृतः पितृतः शुद्धः शुद्धभावो जितेन्द्रियः।
सर्वागमानां सारज्ञः सर्वशास्त्रार्थतत्ववित्।।
परोपकारनिरतो जप पूजादितत्परः।
अमोघवचनः शानतो वेदवेदार्थपारगः।।
योगमार्गानुसन्धयी देवताहृदयगमः।
इत्यादिगुणसम्पन्नो गुरूरागमसम्मतः।।

(शारदातिलक 2 । 142-144)

जो कुलीन हो, सदाचारी हो, जिसकी भावनाएँ शुद्ध हों ओर इन्द्रियाँ वश में हों, जो समस्त शास्त्रों के सार उपाना के रहस्य को जानते हों, समस्त शास्त्रों के तात्पर्य स्वरूप ब्रह्म को जानते हों, जो परोपकार में रस का अनुभव करते हां, जप और पूजा आदि में संलग्न हों, जिसकी वाणी अमोघ हो, शान्ति जिसे कभी न छोड़ती हो, जो वेद और पदार्थ के पारदर्शी हों, योगमार्ग में जिसकी पूर्ण प्रगति हो, जो हृदय के लिये देवता के समान सुखकर हों तथा और भी अनेकों गुण जिसमें स्वभाव से ही निवास करते हों, वही शास्त्रसम्मत गुरू हैं। गुरू में अर्थात् जिसे हम गुरू बनाना चाहते हैं, चार प्रकार की शुद्धि होना आवश्यक हैं- आनुवांशिक शुद्धि, क्रियागत शुद्धि, मानस शुद्धि और विशुद्ध चैतन्य में स्थिति रूप परम शुद्धि। जो जानता बहुत है परंतु करता कुछ नहीं, किया कुछ नहीं, उससे साधक को साधना में दृढ़ और स्थिर होने की शिक्षा नहीं मिल सकती। जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में नहीं हैं, वह दूसरे को जितेन्द्रिय होने की शिक्षा नहीं दे सकता, यदि दे भी तो उसकी सुनेगा कौन? इसलये गुरू ऐसा ही बनाना चाहिये, जो सिद्ध होने पर भी साधक हो और इसी से गुरू मे उपर्युक्त लक्षणों की आवश्यकता होती है। जिनमें ये लक्षण दीखते हैं उनमें स्वाभाविक ही श्रद्धा हो जाती है श्रद्धा करनी नहीं पड़ती, होती है, जिसमें श्रद्धा हो जाती है उसमें भगवान् का दर्शन और वहाँ से प्रवाहित होने वाले भागवत ज्ञान के स्वर ही गुरूवर के हैं।

जब तक हम गुरू को भगवान् के रूप में नही देख पाते, उनसे प्रवाहित होने वाले भागवत ज्ञान को नहीं स्वीकार करते और उनकी प्रत्येक क्रिया हमें लीला के रूप में नहीं मालूम होने लगती, तब तक गुरूकरण नहीं हुआ है- ऐसा समझना चाहिये। जब कि गुरू-गुरू नहीं हुये हैं तब तक चाहे जो समझ लीजिये। गुरू होने के पश्चात् उन्हें भगवान् से नीचे कुछ भी समझना पतन का हेतु है। इस भागवत स्वप्न में वे ही एक हैं, जगत् के और जितने भी गुरू हैं, वे मेरे गुरू के लीला विग्रह हैं, सर्वत्र उन्हीं का ज्ञान ओर उन्ही का अनुग्रह प्रकट हो रहा है, इसीलिये शास्त्रों में भगवान् ने स्वयं कहा है-

आदिनाथो महादेवि महाकलो हि यः स्मृतः।
गुरूः स एव देवेशि सर्वमन्त्रेषु नापरः।।
शैवे शक्ते वैष्णवे च च गाणपत्ये तथैन्देवे।
महाशैवे च सौरे च स गुरूर्नात्र संशयः।।
मन्त्रवक्ता स एव स्यानापरः परमेश्वरि।

हे महादेवि! जो आदिनाथ महाकाल अर्थात भगवान् शिव हैं, वही शैव, शाक्त, वैष्णव आदि सभी मंत्रों के एकमात्र गुरू हैं उनके अतिरिक्त और कोई मंत्रदाता ही नहीं हो सकता।

मंत्रदान के समय अथवा उसके पश्चात् जो गुरू की मनुष्य रूप में प्रतीति होती है, यह तो शिष्य की एक कल्पना है वास्तव में परमात्मा ही गुरू हैं इन गुरू की शरण ओर इनके कर कमलों की छत्र छाया पाकर शिष्य धन्य धन्य हो जाता है।

आजकल का समय ही दूसरा हैं तब उसे स्वीकार करते थे परन्तु अब तो गुरूओं की भरमार हो गयी है, और जैसे बाजार में दलाल अपनी अपनी दूकानों पर लाने के लिये ग्राहकों को परेशान करते हैं, वैसे ही गुरू कहलाने वाले लोग भी अपना शिष्य होने के लिये लोगों को तरह-तरह से प्रलोभित करते हैं सिद्धान्ततः सभी को शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके लिये बहुत ऊँचे अधिकारी की आवश्यकता होती है। अशुद्ध पात्र में अच्छी चीज रख दी जाये तो वह बिगड़ जाती है, अनाधिकारी शिष्य उत्तम साधना को सुरक्षित नहीं रख सकता। इसलिये शिष्य की परीक्षा भी आवश्यक हैं संक्षेप से यदि कहा जाये तो जो सद्गुरू को परमात्मा के रूप में पहचानकर शरीर, धन ओर प्राण और उनके चरणों में निवदेन करके उनके ज्ञान और सिद्धि को प्राप्त करने की चेष्टा करता है, वही सच्चा शिष्य है- ऐसा कहना पड़ेगा। सच्चे शिष्य का लक्षण शारदा-तिलक में इस प्रकार कहा गया है-

शिष्यः कुलीनः शुद्धात्मा पुरूषार्थपरायणः।
अधीतवेदः कुशलो दूरमुक्तमनोभवः।।
हितेषी प्राणिनां नित्यमास्तिकस्त्यक्त नास्तिकः।
स्वधर्मनिरतो भक्तया पितृमातृहितोद्यतः।।
वाड्मनःकार्यवसुभिर्गुरूशुश्रूषणे रतः।
त्यक्ताभिमनो गुरूषु जातिविद्या धनादिभिः।।
गुर्वाज्ञापालनार्थं हि प्राणव्ययरतोद्यतः।
विहत्य च स्वकार्याणि गुरूकार्यरतः सदा।।
दासवन्निवसेद्यस्तु गुरौ भक्तया सदा शिशुः।
कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ गुरूभक्तिपरायणः।
आज्ञाकारी गुरोः शिष्यो मनोविकार्यकर्मभिः।
यो भवेत्स तदा ग्राह्ये नेतरः शुभकांक्ष्या।।
मंत्रपूजारहस्यानि यो गोपयति सर्वदा।
त्रिकालं यो नमस्कुर्यादागमाचारतत्त्ववित्।।
स एव शिष्यः कर्तव्यो नेतरः स्वल्पजीवनः।
एतादृशगुणोपेतः शिष्यो भवति नापरः।।

जो कुलीन हो, सदाचारी हो सिद्धि के लिये तत्पर हो, वेदपाठी हो, चतुर हो ओर कामवासना से रहित हो, जो समस्त प्राणियों का हित चाहता हो, आस्तिक हो, नास्तिकों का संग छोड़ चुका हो, अपने धर्म में प्रेम रखता हो, भक्तिभाव से माता-पिता के हित में संलग्न हो, कर्म, मन, वांणी ओर धन से गुरूसेवा करने के लिये लालायित रहता हो, गुरू जनों के सामने जाति, विद्या, धन आदि का अभिमान न रखता हो, गुरू की आज्ञा पालन के लिये मृत्यु के लिये तैयार रहता हो, अपने काम छोड़कर भी गुरू के काम में लगा रहने वाला हो, जो गुरू के पास दास की भांति निवास करता हो, शिशु के समान आज्ञा पालन करता हो और दिन रात गुरू भक्ति में डूबा रहता हो, जो मन, वांणी, शरीर और कर्म से गुरू की आज्ञा का पालन करता हो- वही शिष्य रूप में स्वीकार करने योग्य है, दूसरा नहीं। जो मंत्र और पूजा के रहस्यों को गुप्त रखता है, त्रिकाल नमस्कार करता है और शस्त्रीय आचार के तत्वों को जानता है, वही शिष्य रूप से स्वीकार करने योग्य है, दूसरा नहीं। क्योंकि जो इन गुणों से युक्त होता है, वही सच्चा शिष्य होता है। इन लक्षणों के स्वाध्याय से मालूम होता हैं कि शिष्य का अधिकार कितना ऊँचा होता है, गुरू के सामने किस प्रकार रहना चाहिये, इसके लिये शास्त्रों में कहा है-

प्रणाम्योपविशेत्पार्श्वे तथा गच्छेदनुज्ञया।
मुखावलोकी सेवेत कुर्यादादिष्टमादरात्।।
असत्यं न वदेदग्रे न बहु प्रलपेदपि।
कामं क्रोधं तथा लोभं मानं प्रहसनं स्तुतिम्।।
चापलानि न जिह्यानि कार्याणि परिदेवनम्।
ऋणदानं तथा दानं वस्तूनां क्रयाविक्रयम्।।
न कुर्याद्रुरूणा सार्द्धं शिष्यो भूष्णुः कदाचन।

प्रणाम करके पास बैठे, आज्ञा लेकर वाहाँ से जाये, उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा करता हुआ ही सेवा करे, आदर भाव से उनकी आज्ञा का पालन करे, झूठ न बोले, उनके सामने बहुत न बोले और काम, क्रोध, लोभ, मोह, हंसी, स्तुति, चपलता, कुटिलता न करे और न रोवे-चिल्लावे। कल्याण कामी शिष्य को गुरू से ऋण लेना तथा देना और वस्तुओं का क्रय-विक्रय भी नहीं करना चाहिये।

गुरू के प्रति शिष्य के हृदय में जितनी श्रद्धा, प्रेम और उनके महत्व का ज्ञान रहता है, उन्हीं के अनुसार उनसे शिष्य का व्यवहार होता है। शास्त्रों में गुरू महिमा और शिष्य लक्षण का इतना विस्तार है और उनका इतना अवान्तर भेद है कि यदि संक्षेप से भी उनका उदारण दिया जाये तो एक बहुत बड़ा ग्रन्थ तैयार हो सकता है। संक्षेप में इतना समझ लेना चाहिये कि गुरू के बना उपासना मार्ग के रहस्य नहीं मालूम होते ओर न उसकी अड़चनें दूर होती हैं। जो उपासना करना चाहता हैं, वह गुरू के बिना एक पग भी नहीं बढ़ सकते। गुरू के सन्तोष में ही शिष्य की पूर्णता है। जिव्हा पर गुरू शब्द के आते ही वह गद्गद् हो जाता है, गुरू को स्मरण कराने वाली वस्तु को देखकर वह लोट पोट होने लगता है गुरू के स्मरण में ही समस्त देवताओं का स्मरण अन्तर्भूत है।

सहजोबाई कहती हैं- गुरू सबसे श्रेष्ठ हैं, गुरू साक्षात् भगवान् हैं, गुरू पूजा ही भगवत्पूजा है, गुरू, मंत्र ओर इष्ट देवता, ये तीन नहीं, एक हैं। गुरू के बिना शेष दो की प्राप्ति असम्भव है, शिष्य अधिकारहीन होने पर भी यदि सदगुरू की शरण में पहुँच जाये तो वे उसे अधिकारी बना लेते हैं पारस का स्वभाव ही लोहे को सोना बनाना है, इसलिये जिनके हृदय में भगवत्प्राप्ति की इच्छा है, जो वास्तव में साधना करना चाहते हैं, उनके लिये श्रीगुरूदेव की शरण में जाना सर्वप्रथम कर्तव्य है।

यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरूरो।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः।।
सहजो क्रोधी अति बुरो, उलटी समझै बात।
सबही सूँ ऐंठो रहै, करै बचन की घात।।
कूकर ज्यों भूसत फिरै तामस मिलवाँ बोल।
घर बाहर दुख रूप हें, बुधि रहै डाँवाडोल।।

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