अविनाशी है 9 की संख्या

अविनाशी है 9 की संख्या

भारतीय दर्शन और गणित में 9 के अंक का विशेष महत्व है साथ ही चमत्कारिक भी। गणित में यह सबसे बड़ी संख्या है क्योंकि 9 से आगे जितनी संख्यायें बनती हैं वे सब या तो शून्य के संयोग से बनती हैं अथवा परस्पर दो अंकों के योग से। अतः 9 की संख्या अंक शास्त्र की परम सीमा है। इसलिये इस संख्या को सृष्टि का स्वरूप भी मान लिया गया है अर्थात्् इस संख्या से परे कुछ नहीं। अब देखिए 9 की संख्या का चमत्कार। इसका पहाड़ा पढ़िये, इसकी मूलसंख्या प्रत्येक में विद्यमान है-
9 ग 1 = 9, 9 ग 2 = 18 अर्थात् 1 ग 8 = 9, 27 = 2 $ 7 = 9, 36 = 3 $ 6 = 9, 45 = 4 $ 5 = 9, 54 = 5 $ 4 = 9, 63 = 3 $ 6 = 9, 72 = 7 $ 2 = 9, 81 = 8 $ 1 = 9, 90 = 9 $ 0 = 9

उल्लेखनीय है कि जगत अर्थात् सृष्टि सदैव विद्यमान रहती है, प्रलय के बाद भी उसका स्वरूप बदल जाता है, नाश नहीं होता। सृष्टि की भांति ही 9 की संख्या अविनाशी है इसी हेतु गोस्वामी तुलसीदास जी ने नौ की संख्या को सृष्टि का रूप माना है और कहा है कि जैसे प्रत्येक परिस्थिति में 9 का मूल अंक अविनाशी रहता है। इसी प्रकार जो परमात्मा राम का आश्रय ले लेता है उसका विषम परिस्थितियों में भी अधःपतन नहीं होता-
रामचरण अवलम्ब गहु, छांड़ि सकल उपचार। जैसे घटत न अंक नव, नव के लिखित पहार।।

उल्लेखनीय है कि भगवान राम के जन्म समय भी (नवमी) तिथि थी। भारतीय गणित में सबसे बड़ी संख्या 18 अकों की है, यह संख्याएं इस प्रकार हैं- एक, दश, शत, सहस्त्र, दस सहस्त्र, लक्ष, दस लक्ष, कोटि, दस कोटि, अब्ज, दस अब्ज, निखर्व, दस निखर्व, शंकु, दस शंकु, अन्त्य, दस अन्त्य और परार्ध। यहां यह भी उल्लेख कर देना आवश्यक होगा कि ये संख्यायें भारतीय हैं विश्व की किसी भी भाषा में गणित की 18 संख्यायें नहीं हैं। इसी आधार पर प्रसिद्ध इतिहासज्ञ एवं विद्वान अल्बरूनी ने लिखा है कि गणित का आदि देश भारत है जहाँ बायीं और 18वें स्थान तक की संख्यायें मिलती हैं। 18 के दो अंकों का योग भी 1 $ 8 = 9 ही होता है।

आध्यात्मिक रहस्य- क्योंकि 9 का अंक सृष्टि का प्रतीक है इसलिये उसका आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्व है। गीता में, (अध्याय 7 श्लोक 4/5 में), स्वयं भगवान ने बतलाया है कि मेरी जो प्रकृतियाँ हैं अर्थात् यह समस्त सृष्टि मूलतः दो तत्त्वों में विभाजित है-
(1) अपरा अर्थात् जड़ जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश,
मन, बुद्धि और अहंकार इन आठ तत्वों में विभाजित है।
(2) परा-प्राणवायु रूप चेतन तत्व। अतः दर्शनशास्त्र के मत से यह समस्त सृष्टि अपरा प्रकृति के 8 तथा प्रकृति के कुल 9 तत्वों से बनी है, इन 9 तत्वों के अलावा इस सृष्टि में और कुछ नहीं है।

भूमि रापो वायुः खं मनो बुद्धिरे वच।
अहंकर इतीयं मे भिन्ना प्रकृति रष्टधा।।
अपरयेमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महावाहो यथेदं धार्यते जगत।।

इस सिद्धांत से चेतन और जड़ प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण मनुष्यों तथा प्राणियों की प्रतीक संख्या 18 हुई। इसीलिये प्राणियों के कल्याणार्थ एवं प्राणियों के सांसारिक हित के शास्त्रों से 18 का घनिष्ट संबंध है। जेसे- 18 पुराण, 18 उपपुराण, 18 स्मृतियाँ, गीता के 18 अध्याय, महाभारत के 18 पर्व इत्यादि। आपको विदित होना चाहिये कि सिद्ध महात्माओं, संतों के आगे 108 की पवित्र संख्या लिखी जाती है, माला में 108 दाने होते हैं, आध्यात्मिक ज्ञान के ग्रंथ उपनिषदों की संख्या भी 108 है, इस पर भी विचार करो। यों तो 108 की संख्या का मूल भी 1 $ 0 $ 8 = 9 ही होता है। इसके अलावा 1 प्रतीक है चेतन प्रकृति का और 8 है जड़ प्रकृति का, मध्य में बिन्दु इस बात का प्रतीक है कि 1 रूपी चेतन प्रकृति ने मायारूपी 8 जड़ प्रकृतियों पर विजय प्राप्त कर सिद्धि प्राप्त कर ली है अथवा ऐसा प्राणी, ऐसा ज्ञान, जो 8 तत्वों वाली माया नामक अपरा प्रकृति से मुक्त है। भगवान को प्राप्त करने की भक्ति भी 9 प्रकार की है।

देवताओं की निधियाँ भी 9 ही हैं। ज्योतिष तो गणित से ही संबंधित शास्त्र है। अतः वह भी 9 के प्रभाव से अछूता नहीं है- नवग्रह तो प्रसिद्ध है ही, इसके अलावा- 27 नक्षत्र = 2 $ 7 अर्थात 9,
27 नक्षत्रों के 4 चरण = 27 ग 4 = 108 अर्थात्- 9,
27 योग = 2 $7 अर्थात् 9,
वर्ष भर में 360 तिथियाँ = 3 $ 6 $ 0 9
12 राशि ग 9 ग्रह = 108 अर्थात 9,

तंत्र शास्त्र में- मंत्र एवं तंत्र शास्त्र में 9 को विशेष महत्व प्राप्त है, तंत्र शास्त्र में जो यंत्र बनाये जाते हैं उनके 9 कोष्ठक होते हैं। इसी प्रकार मंत्रशास्त्र और तंत्र में जो उपासना तथा अनुष्ठान के लिये सिद्ध यंत्र होते हैं, उनके शब्दों की मूल संख्या 9 होती है। शिव महापुराण में प्रत्येक स्वर और व्यंजनों की संख्या दी गई है, जिसके अनुसार कुछ प्रमुख सिद्ध मंत्रों की मूल संख्या इस प्रकार होती है-
अ-राधिक कृष्ण = योग 108 = 9,
आ-नमः शिवाय = योग 135 = 9,
इ-सीताराम = योग 108 = 9
ई-गायत्री मंत्र = योग 1044 = 9,

नवार्ण मंत्र को तो जन-जन जानता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि 9 का अंक हमें सृष्टि का बोध कराता है, क्योंकि समस्त सृष्टि 9 में निहित है इसलिये 9 से आगे कोई अंक ही नहीं है।

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