
भारतीय संस्कृति में सरस्वती पूजन का महत्व क्या है?- इसे जानने से पूर्व हमें यह जानना आवश्यक है कि भगवती सरस्वती का स्वरूप या प्रभाव क्या है? भगवती सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान व वांणी की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा शास्त्र ज्ञान को देने वाली हैं। भगवती शारदा का मूल स्थान शशांक सदन अर्थात् अमृतमय प्रकाशपुंज है। जहां से वे अपने उपासकों के लिये निरंतर पचास अक्षरों के रूप में ज्ञानामृत की धारा प्रवाहित करती हैं। उनका विग्रह शुद्ध ज्ञानमय, आनंदमय है। उनका तेज दिव्य है और वे ही शब्द ब्रह्म के रूप में स्तुत होती हैं। सृष्टिकाल में ईश्वर की आद्या शक्ति ने अपने को पांच भागों में विभक्त कर लिया था। वे राधा, पùा, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुई थी। उस समय श्रीकृष्ण के कंठ से उत्पन्न होने वाली देवी का नाम सरस्वती हुआ। ‘श्रीमद्देवीभागवत’ और ‘श्रीदुर्गासप्तशती’ में भी आद्याशक्ति द्वारा अपने आप को तीन भागों में विभक्त करने की कथा प्राप्त होती है। आद्या शक्ति के ये तीनों रूप महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के नाम से विख्यात हैं।
भगवती सरस्वती सत्वगुण संपन्ना हैं। इनके अनेक नाम हैं, जिनमें शारदा, वागीश्वरी, ब्राह्मी, वाग्देवी और वाग्देवता आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। भगवती सरस्वती की महिमा और प्रभाव असीम है। ऋग्वेद के 10/125 सूक्त के आठवें मंत्र के अनुसार वाग्देवी सौम्य गुणों की दात्री व वसु रूद्रादित्यादि सभी देवों की रक्षिका हैं। वे राष्ट्रीय भावना प्रदान करती हैं तथा लोकहित के लिये संघर्ष करती हैं। वाग्देवी को प्रसन्न कर लेने पर मनुष्य संसार के सारे सुख भोगता है। इनके अनुग्रह से मनुष्य ज्ञानी, विज्ञानी, मेधावी, महर्षि हो जाता है। वाग्देवी सर्वत्र व्याप्त है तथापि वे निर्लेप निरंजन व निष्काम हैं। सरस्वती रहस्योपनिषद्, प्रपंचसार व शारदातिलक आदि ग्रंथों में भगवती सरस्वती के दिव्य स्वरूप व उनकी उपासना का वर्णन विस्तार पूर्वक है और उनके व्रतोपवास संबंधी अनेक मंत्र, यंत्र, स्तोत्र, पटल तथा पद्धतियां उपलब्ध हैं।
वेदोक्त अष्टाक्षरयुक्त मंत्र सरस्वती का मूल मंत्र है अथवा जो उपासक जिस मंत्र में दीक्षित हो वही उसका मूलमंत्र है। अपने मूलमंत्र से अथवा श्रीं हृं सरस्वत्यै स्वाहा इस अष्टाक्षर मंत्र से प्रत्येक वस्तु क्रमशः श्रीसरस्वती को समर्पण करें। अंत में देवी सरस्वती की आरती करके उनकी स्तुति करें। स्तुतिगान के अनन्तर सांगीतिक अराधना यथा संभव करके भगवती को निवेदित गंध-पुष्प मिष्ठान्नादि का प्रसाद ग्रहण करना चाहिये। इनकी आराधना एवं पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों में अधिकांश श्वेतवर्ण की होती हैं। यथा दूध दही-मक्खन, धान का लावा, सफेद तिल का लड्ड्ू, गन्ना एवं गन्ने का रस, पका हुआ गुड़, श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प, श्वेत परिधान (रेशमी या सूती), श्वेत अलंकार (चांदी से निर्मित), खोवे का श्वेत मिष्ठान्न, अदरक, मूली, शर्करा, श्वेत धान्य के अक्षत, तण्डुल, शुक्ल मोदक, घृत, सैन्धवयुक्त, हविष्यान्न, यवचूर्ण या गोधूमचूर्ण का घृतसंयुक्त पिष्टक, पके हुये केले की फली का पिष्टक, नारियल, नारियल जल, श्रीफल, कदरीफल, पुष्प फल आदि।
देवी भागवत एवं ब्रह्मवैवर्तपुराण में श्रीमन्नारायण भगवान ने बाल्मिकी को सरस्वती का मंत्र बतलाया था। जिसके जप से उनमें कवित्व शक्ति उत्पन्न हुई थी। भगवान नारायण द्वारा उपदिष्ट वह अष्टाक्षर मंत्र इस प्रकार है- श्रीं हृं सरस्वत्यै स्वाहा इस मंत्र का चार लाख जप करने से मंत्रसिद्धि होती है। आगम ग्रंथों में इनके और भी मंत्र निर्दिष्ट हैं, जिनमें- ऐं वाग्वादिनि वद वद स्वाहा यह सबीज दशाक्षर मंत्र सर्वार्थ सिद्धिप्रद व सर्वविद्याप्रदायक कहा गया है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में प्रदिष्ट उनका एक और मंत्र इस प्रकार है- ऊँ ऐं हृं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा।
महर्षि बाल्मिकि, व्यास, वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा शौनक आदि ऋषि इनकी ही साधना से कृतार्थ हुये। महर्षि व्यासजी की स्वल्प व्रतोपासना से प्रसन्न होकर ये उनसे कहती हैं- व्यास तुम मेरी प्रेरणा से रचित वाल्मिकि रामायण को पढ़ो, वह मेरी शक्ति के कारण सभी काव्यों का सनातन बीज बन गया है। उसमें श्री रामचरितमानस के रूप में मैं साक्षात मूर्तिमती शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हूँ-
पठ रामायणं व्यास काव्यबीजं सनातनम्।
यत्र रामचरितं स्यात् तदहं तत्र शक्तिमान।।
भगवती सरस्वती को प्रसन्न करके उनसे अभिलषित वर प्राप्त करने के लिये विश्व विजय नामक सरस्वती कवच का वर्णन भी प्राप्त होता है। भगवती सरस्वती के इस अद्भुत विश्वविजय कवच को धारण करके ही व्यास, ऋष्यश्रृंग, भरद्वाज, देवल तथा जैगीषव्य आदि ऋषियों ने सिद्धि पायी थी। इस कवच को सर्वप्रथम रासरासेश्वर श्रीकृष्ण ने गोलोकधाम के वृन्दावन नामक अरण्य में रासोत्सव के समय रासमंडल में ब्रह्माजी से कहा था। तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने गंधमादन पर्वत पर भृगुमुनि को इसे दिया था।
Tags: astrology, Goddess of Education and Wisdom, Goddess of Knowledge, Goddess Saraswati, Maa Saraswati Significance, remedies