
नमस्ते ब्रह्मविद्ये में, हृदब्जष्यूतमे श्यामे।
शरण्ये नन्दनोऽहं ते सदाशिव आविरेधि द्राक्।।1।।
शरणार्थी को शरण देनेवाली मेरे हृदयकमल स्वामिनी हे ब्रह्मविद्ये! हे श्यामे! श्री उमे! मैं तेरा नन्दन सदाशिव हूँ। तू तुरन्त प्रकट हो जा।
कियन्ते कालमार्तोऽहं, प्रतीक्षे त्वामिहातिष्ठन्।
न हृत्स्थावीक्ष्यसे मातः कथं शान्ति लभे शाश्वत्।।2।।
माँ! मै यहाँ दुःखी रहता हूँ। मैं कब तक तेरी प्रतीक्षा करूँ? तू हृदय में रहती हुई भी देख नहीं पड़ती है। अतः मै निरन्तर किस प्रकार शान्ति प्राप्त करूँ ?
सुधासिन्धा मणिद्वीपे, स्थितां कल्पद्रु मोद्याने।
कथं त्वां प्रेक्ष आनन्द, लभे चिन्तामणी धाम्नि।।3।।
मैं सुधासिन्धु के मणिद्वीपस्थित कल्पवृक्ष उद्यान के भीतर चिन्तामणिधाम में रमती हुई तुझे कैसे देखूँ और आनन्द प्राप्त करूँ?
क्षणः प्रतिभाति में कल्पोः निरीक्षे त्वामद्दश्यां क्व।
रमे जीवन्विमुक्तश्चापरोक्षी कृत्य चात्मानं।।4।।
तेरे विरह मे मेरा एक-एक क्षण एक-एक कल्प के समान जान पड़ता है। तू अदृश्य रहती है। मैं कहाँ ढूंढू जो तेरा अपरोक्ष आत्मदर्शन कर जीवनमुक्त हो जाऊँ।
त्वमन्तर्यामिनी शक्ति,पराविधासि मातमे।
जगत्सृष्टिस्यितिप्रलयं करोषि त्व महामाये।।5।।
मेरी माँं तू सर्वान्तर्यामिनी शक्ति पराविद्या है। इसलिए हे महामाये! तू ही संसार को उत्पन्न पालन और प्रलय करती है।
व्यतीताशीतिवर्षोऽहं निराशो नोन्मनाः किषताम्।
कथं साक्षात्करोमि त्वां, रमै निर्भय इहामुत्र।।6।।
मुझको निराश वा उत्कण्ठितचित्त मत कर।
मैं किस प्रकार तुझे साक्षात् करूँ और यहाँ-वहाँ सर्वत्र निर्भय विचरूँ ?
असअंगश्चानिकेतोऽहं, भ्रमामीतस्ततो विश्वम्।
कथं सुतवत्सले कुरूषे, विलम्बं दर्शने मातः।।7।।
मेरा न कोई साथी है, न घर है, मैं संसार में इधर-उधर भ्रान्त धूमता-फिरता हूँ। हे पुत्रवत्सला माता! तू दर्शन देने में क्यों विलम्ब कर रही है?
अह त्वद्दर्शनार्थ किं करोमि क्व ब्रजाम्यम्ब।
कथं पादाब्जकि×जल्के, लुठभ्युड्डीय गु×जामि।।8।।
मैं तेरे दर्शन के लिये क्या करूँ? और कहाँ जाऊँ? तेरे चरणारविन्द के केसरां में कैसे भ्रमण हो और कैसे लोटपोट करूँ और उड़-उड़ कर गूँजूँ अर्थात् तेरे चरणों की धूलि और यशोगान से कृतार्थ हो जाऊँ।
बिना त्वां जीवितु नेहे, वियोगी सर्त्यधर्माऽहम्।
अनाथोऽस्म्यागतः शरणं, द्रुतं वह योगक्षेम माम्।।9।।
तेरे बिना मृत्युलोक में रहकर मैं वियोगी बनकर जीना नहीं चाहता हूँ। मै अनाथ हूँ और तेरी शरण में आ गया हूँ, अतः अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति और प्राप्त वस्तु की रक्षा इन दोनों का योगक्षेम तू ही वहन कर।
सदाशिव ब्रह्मविद्ये यं. वरं देयात्स्मृतोपास्या।
उपासीनस्य कल्याणं, क्रियात्पाठाद्धि वात्सल्यात्।।10।।
यह सदाशिव ब्रह्मविद्याः वात्सल्यभाव से पढ़ते और सुमिरते उपासक को वरदान दे और कल्याण कर! ‘ऊँ तत्सत्। ब्रह्माविद्यार्पणमस्तु।’
-प0 पू0 श्री 1008 स्वामी सदाशिव तीर्थ ब्रह्मविद्या
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