
कर्मयोगी का अर्थ है कर्म करते समय जो ऐसी भावना रखता है कि कर्म करने वाला, कर्म कराने वाला, कर्म और कर्म फल यह सब प्रभु है अर्थात् मुझ में प्रभु हैं, प्रभु का कर्म है, प्रभु कराने वाले हैं, और जो फल मिला वह भी प्रभु का ही है। इस प्रकार की भावना से कर्म करने वाले योगी को कर्मयोगी कहते हैं।
श्रीहनुमान निष्काम कर्मयोगी हैं कर्मयोग के सभी गुण श्रीहनुमानजी में विद्यमान हैं।
श्रीहनुमानजी को कपीस कहा गया जय कपीस तिहुँ लोक उजागर कपीस तो बाली और सुग्रीव थे। यहाँ कपीस से तात्पर्य जो हृद्वय पर राज करे वह राजा है। सीता को खोजने के बाद जब हनुमानजी लंका से वापस लौटते हैं तब हनुमान जी की प्रशंसा करते हुए वानरों ने कहा था-
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना।
राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
रा-च.मा./सु.का 28/3
हे नाथ! हनुमानजी ने सभी कार्यो को सिद्ध किया तथा सभी वानरों के प्राण बचाए, वे हम सभी के प्राण रक्षक हैं इसलिए श्रीहनुमान को कपीश का सम्बोधन दिया गया।
हनुमानजी को महावीर की संज्ञा दी गई महावीर विक्रम बजरंगी- ग्रंथों में दान, दया युद्ध और धर्म में जो पारंगत है उसे दानवीर, दयावीर, शूरवीर और धर्मवीर कहा जाता है लेकिन श्रीहनुमान चारों में पारंगत हैं।
हनुमानजी को पवन सुत कहते हैं। पवन अर्थात् वायु की एक विशेषता होती है। वायुदेव सबकी सेवा करते हैं पर दिखाई नहीं देते। पाँचों तत्व में आकाश, जल पृथ्वी, अग्नि सभी दिखाई देते है। इनके बिना हम कुछ समय जी सकते हैं पर वायु के बिना हम जीवित नहीं रहे सकते। जो दिखाई दिए बिना सबकी सेवा करता रहे निःस्वार्थ एवं मौन ऐसे कर्मयोगी हैं श्रीहनुमान। श्रीहनुमान को अति चतुर बताया गया है-
विद्या वान गुनी अतिचातुर, रामकाजकरिवे को आतुर।
विद्वानों को गुणी भी होना चाहिये साथ में चतुर भी होना चाहिए। विद्वान में यदि दुर्गुण है तो उसकी विद्वता बेकार है, यदि विद्वान गुणी है और चतुर नहीं है तो वह संसार में एक पग नहीं चल सकता। हनुमानजी सीता की खोज में लंका जा रहे थे तब मैनाक पर्वत के साथ चतुराई दिखाई। मैनाक पर्वत ने कहा कि हनुमान थोड़ा आराम कर लो तब हनुमान ने उन्हें स्पर्श कर प्रणाम किया और कहा कि श्रीराम का काम किए बिना में विश्राम नहीं कर सकता। यहाँ मैनाक पर्वत सुख सम्द्धि का प्रतीक है। श्री हनुमान सुख समृद्धि को ठुकराते नहीं है उसे स्पर्श तो करते हैं पर अपने लक्ष्य को नहीं भूलते। कर्मयोगी संसार में रहकर सुख समृद्धि में रहकर उसमें लिपायमान नहीं होता अपने लक्ष्य (परमात्मा) को कभी नहीं भूलता।
हनुमान तेहि पर साकर पुनि कीन्ह प्रणाम।
राम काजु कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम।।
रा. च. मा./सु का.।
जब श्रीहनुमान आगे बढ़ते हैं तब सुरसा नामक राक्षसी से पाला पड़ता है। राक्षसी ने जब अपना मुँह खोलकर उन्हें खानेचली तो श्रीहनुमानजी छोटे बनकर उसके मुँह मे प्रवेश करके बाहर निकल गए।
जस जस सुरसा वदनु बढ़ावा, तासु दून कपि रूप देखावा।
सत जोजन तेहि आनन कीन्हा, अति लघु रूप पवन सुत कीन्हा।।
रा. च. मा./सु. का. 1/5
कहने का तात्पर्य यह है कि लघुरूप अर्थात् विनम्रता जोकि हर हाल में विजय दिलाती है। यहाँ हनुमान जी युद्ध भी कर सकते थे लेकिन अपने लक्ष्य को भूलकर अपनी ऊर्जा और समय को नष्ट करना चतुराई नहीं है।
प्रभुचरित्र सुनिवे को रसिया।
राम लखल सीता मन बसिया।।
यहाँ हनुमान जी को रसिया कहा गया। श्री राम कथा, श्रीराम संकीर्तन जहाँ भी होता है वहाँ श्री हनुमान उपस्थित रहते हैं। जिसके हृदय में राम बसे हैं वहाँ स्वतः हनुमान विराजमान हो जाते है। श्रीराम ज्ञान की सीता भक्ति की और लक्ष्मण कर्म के प्रतीक हैं। श्रीहनुमान के अन्दर इन तीनों का पूर्ण सन्तुलन है। श्री हनुमान कर्मयोगी हैं श्री हनुमान सेवा धर्म के प्रतीक हैं। सेवक के हृद्वद में ज्ञान, कर्म, भक्ति का सन्तुलन होगा वहाँ हनुमान स्वतः विराजमान हो जाएंगे।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा-
यदि पराशक्ति तक पहुँचना है तो सूक्ष्म बुद्धि का प्रयोग करना होगा। श्रीराम अपनी भुजा उठाकर प्रतिज्ञा करते हैं कि मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूँगा। इस कार्य को हनुमान ने स्वयं अपने ऊपर लेकर श्रीराम के संकल्प को पूरा किया।
कर्मयोग के माध्यम से सेवा के माध्यम से मनुष्य उन उँचाईयों को छू लेता है। जहाँ आसमान की ऊँचाई भी छोटी पड़ जाये। श्रीहनुमान ने जब संजीवनी लाकर लक्ष्मण को जीवित किया तब श्रीराम ने उन्हें हृद्वय से लगा लिया। यह कोई साधारण बात नहीं है। किसी को हृदय से तब लगाया जाता है जब हम किसी से अति प्रसन्न होते हैं।
श्रीरघुदीप हरषि उरलाए।
भगवान ने हनुमान के हृदय में स्वयं को स्थापित किया और उन्हें निकटता प्रदान की थी। सेवा भाव ने श्री हनुमान को इतना ऊपर उठा दिया के भगवान उन्हें भाई की संज्ञा देकर कहते हैं-
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई। कर्मयोगी के अन्दर स्मरण शक्ति और व्यवस्थित रहने की कला होनी चाहिए। श्रीहनुमान ने सुग्रीव को राम से मिलवाकर उन्हें अभय दान दिया, राजपद दिया। राज पद को पाकर सुग्रीव ने श्रीराम का कार्य भुला दिया, तब हनुमानजी सुग्रीव के पास पहुँचकर कहते हैं-
निकट जाइ चरनन्हि सिरूनावा।
चरिहु विधि तेहि कहि समुझावा।।
रा. च. मा./ कि. का. 18/1
साम दाम दण्ड भेद चारो विधि से श्री हनुमान ने सुग्रीव को समझाकर वापस लाते हैं।
कर्म योगी को मोह से परे हो जाना चाहिए। मोह से परे हो जाना मानव के लिए बहुत चुनौती है। सीता भक्ति की प्रतीक है यदि भक्ति का अपहरण हो जाये तो मोह का सागर पार करने में संकोच मत करना ऐसा ही तो किया था श्रीहनुमानजी ने।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहिं जलधि लाँघ गए अचरज नाहीं।
कर्मयोगी के अन्दर होना चाहिए अनुग्रह का भाव। जब श्रीराम और लक्ष्मण को अपने कंधो पर बिठाकर हनुमान जी चलते हैं, कंधा डगमगाया, राम लक्ष्मण ने हनुमान के मस्तक को पकड़ लिया। श्री हनुमान कहते हैं जिसे सारी दुनियाँ पकड़ने के लिए भागती है वह मुझे पकड़ रखा है। यह है अनुग्रह का भाव।
श्री हनुमान से हमे प्रेरणा मिलती है कि ज्ञान अंहकार रहित होना चाहिए प्रभु के प्रति निःस्वार्थ प्रेम होना चाहिए तथा आसक्ति का त्याग करके अकर्ता बन कर संसार में वह कर्म करना चाहिए जो प्रभु की प्रसन्नता के लिए हो।
अतुलित बलधामं स्वर्णशैलाभदेंह। दनुजवल कृशानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।।
सकल गुण निधानं, वानराणामधीशं । रघुपति प्रियभक्त, वात जातं नमामि।।
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