ज्ञान की साधना

ज्ञान की साधना

निष्काम साधना, भक्ति साधना और योग साधना की तरह एक और साधना है- ज्ञान की साधना! इस ज्ञान की साधना की पद्धति श्रुति इस प्रकार बतलाती है-

आत्मज्ञान का दर्शन करना चाहिये। दर्शन करने का उपाय भी श्रुति इस प्रकार बतलाती है कि पहले श्रवण करना चाहिये, उसके बाद मनन करना चाहिये, तदनन्तर शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिये, ध्यान करना चाहिये। आत्मज्ञान शास्त्र और गुरुमुख दानों से श्रवण होता है, श्रुत विषय के मन में बार-बार चिन्तन को मनन कहते हैं और स्वाध्याय उस विषय में तल्लीन हो जाना होता है। मन को एकाग्र करना ध्यान कहलाता है, एकाकारवृत्ति प्रवाह भी इसी को कहते हैं। आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव या ज्ञान ही आत्मादर्शन कहाता है।

जिस श्रवण से मनन और ध्यान अपने आप हो, उसी को यथार्थ में श्रवण कहते हैं; क्योंकि श्रवण का फल ही मनन और ध्यान है। लौकिक जगत् में भी जिस श्रवण का फल नहीं होता, उसे श्रवण नहीं कहते। जैसे किसी को एक गिलास जल लाने को कहा जाये और वह आदमी सुनकर भी जल न देकर दूसरे काम से चला जाये, तो यही कहा जाता है कि उसने मेरी बात नहीं सुनी। क्योंकि सुनने का फल जल देना उससे नहीं हुआ। भोजन का फल है क्षुधा की निवृत्ति। यदि कोई मनुष्य भोजन करने के लिये बैठे और केवल थोडा सा भात खाकर उठ जाये तो लोग कहेंगे कि उसने आज भोजन नहीं किया है। खाने की वस्तु मुँह में चबा कर पेट में निगल जाने का नाम भोजन है। वह तो थोड़ा भात खाने से भी हो गया। परन्तु उससे भोजन का फल क्षुधानिवृत्ति न होने से उसे भोजन नही कहा जाता। भोजन तभी सिद्ध होगा, जब उसका फल क्षुधा की निवृत्ति होगी। लौकिक कार्य के विषय का श्रवण तभी सिद्ध होगा, जब उसके अनुसार कार्य होगा। इसी प्रकार आत्मा के विषय का श्रवण तभी सिद्ध होगा, जब उसके अनुसार मनन और ध्यान अपने आप होता रहेगा। एक दूसरे दृष्टान्त से इस विषय को और भी स्पष्ट किया जाता है। किसी सच्चरित्र युवक को एक प्रतिष्ठित पुरुष ने बहुत से आदमियों के सामने झूठ-मूठ कह दिया कि तुम उस दिन एक कुलटा स्त्री से एकान्त मे क्यों बाते करते थे। युवक ने दस बात का प्रतिवाद किया। पर उसकी कौन सुना है। उन प्रतिष्ठित पुरुष का कहना ही सब लोगों ने मान लिया और उसका तिरस्कार किया। निदान युवक वहाँ से लौटा। वह मन में सोचने लगा कि उन्होंने मुझे इस प्रकार क्यों बदनाम किया, मैंने तो ऐसा काम नहीं किया। जब वह घर आया तो भी वही चिन्ता बारबार मन में उठने लगती है, पुस्तक उठाकर पढ़ने की चेष्टा करने लगता है, तो भी वही चिन्ता! झुँझलाकर वह उस बात को भूलने की चेष्टा करता है, तो भी थोड़ी देर मे वही बात मन में उठने लगती है- उन्होंने मेरी ऐसी बदनामी क्यों की? खाने नहाने, चलने, फिरने में वही चिन्ता! उस पुरुष ने इस युवक को ऐसा श्रवण करा दिया कि उसका फल मनन अपने आप होने लगा, भूलने की चेष्टा करने पर भी मनन बंद नहीं हुआ। ठीक इसी प्रकार संसार के दुःखों से तापित व्यक्ति मुक्ति की इच्छा से आत्म स्वरूप जानने के लिये जब गुरु के पास जाता है, तब गुरु उसे आत्मस्वरूप का उपदेश देते हैं। वह उपदेश उसके हृदय मे बद्धमूल हो जाता है। और उसके अनन्तर उस आत्मस्वरूप के श्रवण के अवश्यम्भावी परिणाम रूप मनन अपने आप होने लगता है। वह मुमुक्षु पुरुष उसमें लीन हो जाता है। किसी भी विक्षेप से उसकी वह आत्मचिन्ता नहीं छूटती। इसी अवस्था के एकाकर वृत्ति प्रवाह को ही ध्यान कहते हैं। इसी का अव्यवहित परिणाम आत्मदर्शन है। यही ज्ञान का साधन है।

अब देखना चाहिये कि आत्मतत्त्व के श्रवण करने के पश्चात् मनुष्य मनन अपने आप क्यों करता है, उसे छोड़ क्यों नहीं देता? इसलिये कि, संसार की सारी वस्तुओं से आत्मा सर्वाधिक प्रिय है। पुत्र, स्त्री, वित्त आदि भी प्रिय हैं; परंतु अपना शरीर, इन्द्रियाँ, आदि उनसे अधिक प्रिय है; और आत्मा उनसे भी प्रियतम है।

बृहदारण्यक उपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते है- न वा अरे पत्युः वामाय पतिः प्रियो भवति, आत्म नस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति।

‘अरे मैत्रेयी! पति की दृष्टि में कोई स्त्री पति को प्रिय नहीं समझती अपने सुख के लिये पति को प्रिय समझती है।’

इसी प्रकार और भी कहा है कि स्त्री के लिये, पुत्र के लिये, देवता के लिये, वित्त के लिये या सारे संसार के लिये कोई व्यक्ति स्त्री, पुत्र, देवता, धन या सारे संसार को प्रिय नहीं समझता, बल्कि अपने सुख के लिये ही इनको प्रिय समझता है। इस कारण आत्मा सबसे अधिक प्रिय अर्थात् प्रियतम है। वेदान्त पंचदशी में लिखा भी है-
अयमात्मा परानन्दः परप्रेमास्पदं यतः।
मा न भूंव हि भूयासमिति प्रेमात्मनीक्ष्यते।।

‘परम प्रेम का विषय होने के कारण आत्मा परमानन्दस्वरूप है। क्योंकि मेरा अभाव कभी न हो, मेरा अस्तित्व सदा बना रहे। इस प्रकार अपने ऊपर प्रेम सभी जीवों मे दिखायी पड़ता है।’

एक दृष्टान्त से यह विषय और भी स्पष्ट हो जायेगा। एक बड़े आदमी के घर में आग लग गयी। सब लोग भाग निकले, परन्तु खोजने पर एक छोटा बालक नहीं मिला, वह भीतर ही रह गया था। पिता ने सब लोगों से कहा, ‘जो मेरे पुत्र को निकाल लावेगा, उसे मैं एक लाख रूपया दूँगा।’ एक पड़ोसी ने सुनकर कहा, ‘आप खुद ही जाकर लाइये न, क्यों एक लाख रुपया खोते हैं?’ परन्तु एक लाख रुपये या पुत्र से भी अपना शरीर प्रिय है; इसलिये पिता आग के भीतर नहीं जाता। इसी प्रकार यदि उसके हाथ, पैर, नाक, कान आदि अंग काट भी डाले जायँ तो भी वह जीना चाहता है; ऐसे ही यदि उसकी आँखे फूट जायँ, वह अंधा हो जाये, वह बहरा हो जाये, उसकी नाक में सूँघने की या जिव्हा् में स्वाद लेने की शक्ति न रहे, कोढ़ होकर शरीर में स्पर्श ग्रहण करने की शक्ति भी लुप्त हो जाये यानी सारी इन्द्रियाँ नष्ट हो जायें, मन विक्षित और बुद्धि क्षिप्त (पागल) हो जाये तो भी वह अपनी आत्मा को लेकर जीना चाहता है। इससे क्या यह सिद्ध नहीं होता कि आत्मा से बढ़कर प्रिय वस्तु संसार में कोई नहीं है? उस आत्मा का स्वरूप जानने के लिये जब मुमुक्षु के भीतर तीव्र इच्छा होती है और सत्तगुरु उसे आत्मतत्त्व का उपदेश देते हैं, तब साधक उस अपने स्वरूप को कभी नहीं भूलता। वह विवश होकर उसका मनन करेगा, फिर निरन्तर उस आत्मस्वरूप का ध्यान करते करते आत्मसाक्षात्कार लाभ करेगा। इसी आत्मज्ञान का फल मुक्ति है। श्री भगवान् कृष्ण गीता में कहते हैं।-
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम- चिरेणाधिगच्छति।।

‘ज्ञान लाभ प्राप्त करके मनुष्य थोड़े ही समय के पश्चात् परम शान्ति अर्थात् मुक्ति प्राप्त कर लेता है।’

अब विचारना चाहिये कि आत्मा का स्वरूप क्या है। आश्चार्य की बात यह है कि हम संसार की सारी वस्तुओं को तथा सारी विद्याओं को जानने की चेष्टा करते हैं; परन्तु जो आत्मा हमारा परम प्रिय है, जो हमारा अन्तरतम पुरुष है और जो हमारा अपना स्वरूप है उसे जानने की एक बार भी चेष्टा नहीं करते।

पहले प्रतिपादित किया गया है कि शरीर, इन्द्रिक, मन या बुद्धि के विकृत हो जाने पर भी मनुष्य अपनी आत्मा को जीवित रखना चाहता है। इससे स्पष्ट हुआ कि आत्मा शरीर, इन्द्रिय, मन तथा बुद्धि से परे या पृथक् है।

लोग कहते हैं ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा कोई नहीं करता। मेरा वस्त्र, मेरा मकान, मेरा राज्य-कहने से जिस प्रकार दोनों में भेद प्रतीत होता है, ठीक उसी प्रकार कहने से भी ‘मैं’ शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण, और बुद्धि से पृथक् हुआ। मैं शुद्ध चेतन आत्मा हूँ। परन्तु लोग ‘मेरी आत्मा’ भी तो कहते हैं। अतः मुझको आत्मा से भी भिन्न होना चाहिये? नहीं यदि मैं आत्मा से भी भिन्न होऊँ, तो मेरा वास्तविक स्वरूप क्या होगा? शरीर में जितने प्रकार के पदार्थ या अंग हैं, सबसे भिन्न और सबके भीतर आत्मा है आत्मा के भीतर और कोई वस्तु नहीं है। इस लिये आत्मा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है। अतः ‘मेरी आत्मा कहना भूल है।’

शरीर में चेतन तत्त्व ही आत्मा है। देह, इन्द्रिय, मन ओर बुद्धि अचेतन हैं। मन और बुद्धि चेतन आत्मा की छायामात्र पाकर चेतन की तरह क्रिया करती है। जिस प्रकार आतिशि काँच (लेंस) के भीतर से सूर्य किरण आने से उसकी दूसरी ओर के कागज या पतली लकड़ी में आग लग जाती है, ठीक उसी प्रकार स्वच्छ अन्तः करण में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ने से उसमें ज्ञान शक्ति का आविर्भाव हो जाता है और उसके सम्बन्ध से शरीर भी चेतन की तरह क्रिया करने लगता है।

प्रत्येक जीव ‘मैं हूँ’ इस प्रकार अपने स्वरूप का समान्य रूप से अनुभव करता है। आत्मा के चेतन होने में यही सबसे प्रबल प्रमाण है। शरीर के परिणाम से ‘मैं बालक हूँ’, मैं युवक हूँ, मैं वृद्ध हूँ, मैं रोगी हूँ, मैं बलवान् हूँ- आदि भिन्न भिन्न प्रकार का अनुभव औपाधिक है। परन्तु सब जीवों में सब अवस्थाओं में ‘मैं हूँ’ यह अनुभव एक सा है।

आत्मा सूक्ष्म तथा व्यापक है। परमाणु और आकश दोनों सूक्ष्म हैं। आत्मा आकाश की तरह सूक्ष्म और व्यापक है। किसी का कहना है कि आत्मा अणु समान है, क्योंकि दो इन्द्रियों का ज्ञान एक साथ नहीं होता। देखते समय दृश्य के ऊपर ध्यान रहने से कान से सुनायी नहीं पड़ता; ऐसे ही ध्सान दूसरी ओर रहने से सामने की कोई भी वस्तु दिखायी नहीं पड़ती। आत्मा शरीर मे भी व्यापक होने से एक साथ दो, तीन, चार इन्द्रियों का ज्ञान होता है, आत्मा में नही। मन अणु समान है, इस कारण दो इन्द्रियों का ज्ञान एक साथ नहीं होता।

आत्मा केवल शरीर में ही व्याप्त नहीं है, बल्कि शरीर के बाहर ब्रह्माण्ड में भी व्याप्त है; जड़ चेतन सभी पदार्थों में एक ही आत्मा व्याप्त है सब जीवों की आत्मा एक जैसी है। इस विषय मे किसी का कहना है कि यदि सब जीवों में एक आत्मा है, तो एक शरीर में दुःख होने से दूसरे शरीर में उसकी उपलब्धि क्यों नहीं होती? एक को भूख लगने से दूसरे को भूख क्यों नही लगती? इसका भी उत्तर वही है। सुख, दुःख, भूख, प्यास आदि की उपलब्धि मन मे होती है। मन प्रति शरीर में भिन्न भिन्न है, इसलिये एक शरीर के सुख दुःखादि दूसरे शरीर मे उपलब्ध नहीं होते। आत्मा सुख दुःखादि से परे है। गीता मे भगवान् ने कहा हैं- अन्तवन्त इमे देहा नित्यास्योक्ताः शरीरिणः।

अर्थात् नित्य शरीरी आत्मा के देह समूह नाशवान् हैं। यहाँ आत्मा को एक वचन में तथा शरीरों को बहुवचन में बतलाया गया है। भाव यह है कि आत्मा एक है और उसके शरीर अनेक हैं। कठोपनिषद् में कहा है-
अग्निर्यथै को भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्व- भूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्व।।

‘जिस प्रकार एक अग्नि सारे संसार में प्रविष्ट है और नाना रूपों में प्रकट होती है, उसी प्रकार सब प्राणियों की अन्तरात्मा एक है; वह नाना प्रकार के जीवों के शरीरों में प्रकट होती है तथा शरीर के बाहर भी है।’ शरीर के बाहर आत्मा को सीमाबद्ध करने के लिये कोई वस्तु समर्थ नहीं है। इस लिये शरीर के बाहर आत्मा दस दिशाओं में अनन्त है। गीता में लिखा भी है-
नित्यः सर्वगतः स्थागुणरचलोऽयं सनातनः।

‘आत्मा नित्य है, सर्वगत यानी ब्रह्माण्ड में सर्वत्र व्यापक है, स्थिर, अपरिणामी तथा अनादि है।’

आत्मा नित्य है, त्रिकाल में भी इसका नाश नहीं है। जो छोटा यानी सीमाबद्ध होता है, वही नाशवान् है- जैसे घट, शरीर, वृक्ष आदि। घट, शरीर, वृक्ष आदि सीमावद्ध हैं, इनका नाश भी लोगों ने प्रत्यक्ष किया है। इसी प्रकार आत्मा भी यदि शरीर में सीमाबद्ध हो तो उसका भी नाश अवश्यम्भावी हो जाता है। इसी कारण भगवान् ने आत्मा को ‘नित्य’ और ‘सर्वगत’ एक ही साथ कहा है।

निष्कर्ष यह हुआ कि आत्मा चेतन, सूक्ष्म, व्यापक, नित्य तथा सुख- दुःखादि से परे है। सांसारिक विषयों की तथा सुख-दुःख, भूख, प्यास आदि की उपलब्धि मन में होती है। मन आत्मा को देख नहीं सकता। श्रवण, मनन, ध्यान रूप साधन के द्वारा मन आत्मा का दर्शन करने की चेष्टा करता है।; परन्तु दीपक जैसे सूर्य को प्रकाशित नहीं कर सकता, बल्कि सूर्य के समाने निष्प्रभ हो जाता है, उसी प्रकार मन भी आत्मा को प्रकाशित नहीं कर सकता, बल्कि अन्तर्मुखी होकर आत्मा के सामने जाते ही वह लुप्त हो जाता है। आत्मा स्वयं प्रकाशवान है, मन के लुप्त होने पर आत्मा स्वयं ही प्रकाशित होती है। योगदर्शन में महर्षि पातजंलिने लिखा है-
‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।’

अर्थात् समाधि में द्रष्टा आत्मा अपने स्वरूप मे स्थिर रहता है। श्रुति ने इसी को आत्मदर्शन कहा है। श्रवण, मनन और ध्यान इसके साधन हैं यह पहले ही बतलाया जा चुका है।

श्रुति ने जो ‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः’ कहा है, वह वचन वाक्य मात्र हैं। मनुष्य के मन को आत्मा की ओर अभिमुखी करना ही उसका उद्देश्य है। वास्तव में आत्मा चक्षु या मन का विषय नहींं हो सकता। क्योंकि जो इन्द्रिय या मन का विषय है, वह अनित्य है। संसार के सभी पदार्थ किसी न किस इन्द्रिय के अथवा मन के विषय हैं और वे अनित्य भी हैं। आत्मा भी यदि इन्द्रिय या मन का विषय है, तो वह सांसारिक पदार्थां की तरह अनित्य हो जायगा। परन्तु आत्मा को सभी श्रुतियों स्मृतियों तथा भगवद्गीता में नित्य माना है। वास्तव में जो सूक्ष्म, निरवयव और सर्वव्यापक है वह नित्य ही है जैसे काल और दिक्। कोई स्थान संसार में ऐसा नहीं है, जहाँ काल न हो और समय भी ऐसा नहीं था या ना होगा जब काल न था या न रहेगा। इसलिये काल सर्वव्यापक और नित्य है। ऐसे ही दिक् या दिशा भी सर्वत्र व्याप्त और नित्य है।

अब यहाँ प्रश्न यह हो सकता है कि यदि मेरी आत्मा मेरे शरीर से बाहर भी है, तो बाहर मुझ को उसकी कुछ भी उपलब्धि क्यों नहीं होती। इसका उत्तर वही है, जो पहले सुख- दुःखादि के विषय में दिया गया है। हमारे भीतर उपलब्धि होती है। मन के द्वारा। मन शरीर के बाहर जा नहीं सकता। इस कारण बाहर हमें आत्मोपलब्धि नहीं होती।

लोग कहते हैं कि मन बड़ा चंचल है, वायु से भी उसकी गति प्रबल है, क्षण भर में वह दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई घूम आता है। अतः मन शरीर के बाहर भी जाता है। नहीं, मन शरीर से बाहर नहीं जाता। मन में दिल्ली, कलकत्ता, बम्बई आदि स्थानों तथा घटनाओं का स्मरण मात्र होता है, अनुभूत वस्तु या विषय का ही स्मरण होता है। शास्त्रों में कहा भी है-
‘स्मृतिरनुभवपूर्विका’ इति

अर्थात अनुभव के अनन्तर स्मृति होती है। अनुभव के द्वारा मन में जिसका संस्कार पड़ जाता है कालान्तर में किसी कारण से जब वही संस्कार मन में उठता है, तब जिस प्रकार का अनुभव पहले हुआ था, वैसा ही ज्ञान होता है। इसी को स्मरण कहते हैं। अतः मन शरीर के भीतर ही रहकर दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई आदि का स्मरण करता है। जहाँ मनुष्य गया है, जिस स्थान को उसने देखा है, उसी का वह स्मरण कर सकता है, अन्य स्थान का नहीं। मन में यदि बाहर जाने की शक्ति होती तो जहांँ मनुष्य नहीं गया है, ऐसे स्थान की बात क्यों नहीं बतलाता? जो दिल्ली या नेपाल गया है वह उन दोनों स्थानों को स्मरण कर उनकी बातें ही बतला सकता है, परन्तु उनके अतिरिक्त अन्य स्थान की बातें नहीं बतला सकता। इस से सिद्ध होता है कि मन बाहर नहीं जाता, भीतर रहकर ही अनुभूत स्थान और विषय का स्मरण मात्र करता है। स्वप्न में भी मन बाहर नहीं जाता। क्योंकि स्वप्न भी एक प्रकार की मनोस्मृति ही है। स्वप्न का लक्षण दर्शन शास्त्रों में इस प्रकार बतलाया गया है।
जागरितसंस्कारजप्रत्ययसविषयः स्वप्नः।

अर्थात् जग्रात् अवस्था के अनुभूत विषय के संस्कार से निद्रावस्था में उत्पन्न ज्ञान ही स्वप्न हैं। जाग्रत् अवस्था के अनुभव जनित संस्कार से यदि जाग्रत् अवस्था में ही ज्ञान उत्पन्न हो, तो उसे स्मृति और यदि निद्रावस्था में उस प्रकार का ज्ञान उत्पन्न हो, तो उसे स्वप्न कहते हैं। अतः स्वप्नावस्था में भी मन भीतर रहकर ही पूर्वानुभूत विषय का स्मरण करता रहता है।

विषयेन्द्रिय संयोग के दृष्टान्त से भी यह बात समझ में आ सकती है। चक्षु, कर्ण, नासिका, जिव्ह्ा और त्वचा यही हमारी पांच ज्ञानेद्रियाँ हैं। इसके साथ विषयों का जब संयोग होता है। तभी मन भीतर से रूप, शब्द, गन्ध, रस, और स्पर्श की उपलब्धि करता है चमड़े के साथ वस्तु का संयोग होने से ही मन भीतर से समझ लेता है कि वह वस्तु कठिन है या कोमल। वस्तु चमड़े से थोडा भी अलग रहे तो उसके कठिन या कोमल स्पर्श की उपलब्धि नहीं होती। मन-इन्द्रियों के बाहर आकर उपलब्धि होती है। कि वस्तु मिठी है या खट्टी। जिव्हा् से जरा भी अलग रहे, तो उसके रस की उपलब्धि नहीं होती। सुगन्धित फूल के नाक के पास आने से उसके पराग के कण नाक के भीतर पहुँच जाते हैं। उनके साथ घ्राण्न्द्रिय का स्पर्श होने पर मन फूल की सुगन्ध की उपलब्धि महसूस कराते हैं। फूल दूर रहे तो उसके पराग की रेणु नाक तक आकर नहीं पहुँचते, इस कारण उसकी गन्ध मालूम भी नहीं होती।

शब्द की लहर वायु के भीतर से आकर कान के पर्दे पर धक्का देती है। इसी से शब्द की उपलब्धि होती है, बहुत दूर शब्द होने से उसकी लहर बहुत धीमी होकर कान के पर्दे पर बहुत हल्का धक्का देती है। इससे शब्द भी धीमा मालूम होता है। और भी दूरी पर शब्द होने पर उसकी लहर कान तक आती ही नहीं। इस लिये। उसकी उपलब्धि ही नहीं होती। यदि मन में बाहर जाने की शक्ति होती, तो बाहर आने पर मन की गति को कोई रोक नहीं सकता; अतः जितनी ही दूरी पर शब्द क्यों न हों, मन वहीं जाकर उस शब्द को स्पष्ट रूप से सुन आता है। आकाश मे बिजली चमकने से प्रायः थोड़ी देर के बाद ही आवाज़ सुनायी पड़ती है। बिजली का प्रकाश उसी क्षण आकर आँखों पर पड़ता है और शब्द के आने में कुछ क्षणों का विलम्ब लगता है। यदि मन बाहर जा सकता है तो आँख के भीतर से जितनी देर में मेघ में पहुँचकर बिजली के प्रकाश को देखता, उतनी ही देर में कान के भीतर से भी जाकर मेघ से शब्द सुन लेता है। वास्तव में ऐसा नहीं होता। प्रकाश की गति बहुत तेज है, क्षणभर में वह स्हस्त्रों कोस दूर पहुँच जाता है। इस कारण वह मेघ से उसी क्षण आकर आँखों पर प्रतिफलित होता है। परन्तु शब्द की लहर वायु के स्तरों में धक्का खाते खाते अग्रसर होती हैं। इस कारण उसके कानों तक पहुँचने में दो चार क्षण का समय लग जाता है। नदी के उस पार धोबी जब घाट पर कपड़ा पटकता है, तब भी यह विषय स्पष्ट अनुभव में आता है। धोबी जब कपड़ा पटकता है, तब वह तो उसी समय दिखायी पड़ता है; परन्तु उस पटकने का शब्द तब सुनायी देता है, जब कि वह दुबारा पटकने की क्रिया कर रहा होता है।

एक व्यक्ति मकान के भीतर बैठकर बहुत ध्यान से हिसाब कर रहा है अथवा गाना सुन रहा है। उस समय किसी ने बाहर से आवाज़ दी। वह उसे सुनायी पड़ी। क्यों? इसलिये कि उसके शब्द ने वायुमण्डल में तैरते हुए भीतर के आदमी के कानों में आकर धक्का दिया और उसे शब्द सुनायी पड़े। इसी से उसका ध्यान उधर खिंच गया। यदि बाहर के व्यक्ति के मुँह में जाकर मन को शब्द सुनना पड़ता, तो शब्द होते ही सुनायी पड़ने का कोई नियम ही न रहता; क्योंकि जब मनुष्य अपनी इच्छा से मन को बाहर भेजता तभी उसे शब्द सुनायी पड़ता, अन्यथा नहीं। बाहर हजार शब्द हुआ करें। जब तक भीतर के मनुष्य का मन बाहर नहीं जायेगा तब तक कोई शब्द सुनायी न पड़ेगा। हिसाब में या गाना सुनने में जिसका मन लगा हुआ है, वह विना किसी खास कारण के अपने मन को क्यों बाहर भेजने लगा। वास्तव में ऐसा नहीं होता। जोर का शब्द होते ही सुनायी पड़ता है, इसी से प्रमाणित होता है। कि शब्द ही आकर कानों में धक्का देता है, तब वह सुनायी पड़ता है।

रात को सब लोग सोये हुये हैं। मेघ बड़े जोर से गरजा। इससे हजारों लोगों की नींद एक ही साथ खुल गयी। इसका भी वही कारण है, नहीं तो सोये हुए व्यक्ति के मन में भेजकर देखें कि कोई शब्द हो रहा है या नहीं। दूसरी बात, हजारों, व्यक्तियों को एक ही साथ ऐसी इच्छा होनी भी सम्भव नहीं। वास्तव में वस्तुस्थिति यही है कि मेघ के शब्द ने ही आकर बडे़ जोर से हजारों लोगों के कानों में धक्का दिया, जिससे सब लोग एक ही साथ जाग उठे और शब्द भी एक साथ सबको सुनायी पड़ा। अतः सिद्ध हुआ कि मन बाहर जाकर शब्द नहीं सुनता।

अब रही आँख से वस्तु के रूप देखने की बात। वस्तु का रूप आँखों पर आकर प्रतिफलित होता है। वहीं से मन उसकी उपलब्धि करता है। अंधे की आँखों में वस्तु की छाया ग्रहण करने की शक्ति नष्ट हो जाती है। इस कारण उसका मन किसी वस्तु का रूप नहीं देख सकता। मन में यदि बाहर जाने की शक्ति होती तो वह अंधे की आँखों मे से भी बाहर जाकर रूप को देख लेता। अतः सिद्ध हुआ कि मन बाहर नहीं जाता, शरीर के भीतर रहकर ही सारे विषयों की उपलब्धि करता रहता है। इसी कारण शरीर के बाहर आत्मा के विद्यमान रहने पर भी मन उसके अस्तित्व की उपलब्धि करता रहता है और यही कारण है कि दूसरे शरीर के सुख दुःखादि की उपलब्धि अपने शरीर में नही होती।

मन ही सांसारिक विषयों से सम्बन्ध करके सुख दुःख शोक मोहादि को प्राप्त होता है। अतः मन ही जीव के बन्धन का कारण है। फिर यही मन जब विषयों को छोड़कर विरक्त हो जाता है, और आत्म स्वरूप को उपलब्ध करने के लिये अन्तर्मुख होता है। तब वह मुक्ति का भी कारण बन जाता है। योग वासिष्ठ में महर्षि वसिष्ठ श्रीरामचन्द्र जी से कहते हैं-
मन एव मनुष्याणं कारणं बन्धमोक्षयोः बन्धाय विषयासक्तं मुत्त्यै निर्विष्यं स्मृतम्।।

इस मन को निर्विषय करने के लिये ही साधन की आवश्यकता है। क्योंकि आत्मा साधन निरपेष है तथा त्रिकाल में मुक्त है। ऋषियों ने निष्काम कर्म साधन, योग-साधन और भक्ति साधन आदि अनेक प्रकार के साधनों का निर्देश शास्त्रों मे किया है। परन्तु श्रुति प्रतिपादित श्रवण, मनन, ज्ञानरूप साधन जिसका वर्णन इस लेख के आरम्भ में किया गया है, सबसे सुगम तथा उत्तम, है; इसके द्वारा आत्मा सुख दुःखादि से रहित होती है, यह प्रत्यक्ष होने पर मनुष्य इस जीवन में ही जीवन मुक्ति का आनन्द प्राप्त कर सकता है।

About Post Author

Tags: , , , , , , , , ,