
भारतीय जीवन-शैली में गृहस्थ आश्रम का विशेष महत्व है, गृहस्थ जीवन की शुरुआत पाणिग्रहण संस्कार से आरंभ होती है। प्रण-सूत्र में बंधना सुखदायी हो या दुःखदायी, यह दोनों के ग्रहों पर निर्भर करेगा जो कि एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। भारत में सर्वाधिक प्रचलित योग मंगली योग है, उसे कुज दोष भी कहते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि ज्योतिष के प्राचीन महत्वपूर्ण ग्रंथ, वृहत पाराशर, होराशास्त्र, सारावली, जातक पारिजात इत्यादि में मंगली योग का कहीं भी उल्लेख नहीं है। फिर भी यह योग इतना प्रचलित है कि बच्चे के जन्म लेने के बाद, विशेषकर कन्या के जन्म लेने के उपरांत माता-पिता यही चिन्ता व्यक्त करते हैं कि कन्या मंगली तो नहीं है। आज भी यही धारणा है कि मंगली योग ही वैवाहिक जीवन को नष्ट करता है अथवा लड़की की कुण्डली में यही योग वर को मृत्यु देगा। इतना भयावह रूप प्रचलित है। असल में तथाकथित झोला छाप पंडितों ने या अज्ञानियों ने तिल का पहाड़ बना दिया है। इसका परिहार होता है या नहीं। कहाँ ये अच्छा है और कहां बुरा इसका पूर्ण ज्ञान किये बिना बस जातक को भयभीत करना ही जैसे उनका अधिकार है। मंगल ग्रह के देवता हैं श्रीगणेश, श्रीहनुमान और माँ दुर्गा ये तीनों ही विघ्न बाधायें और अमंगल दूर करते हैं। अतः यह जानना आवश्यक है कि जिस ग्रह से मंगली या मांगलिक होना माना गया है उसके क्या गुण हैं? और स्वभाव क्या है?
मंगल ग्रह का नाम लौहितांग है, क्योंकि यह दूर से लाल दिखाई पड़ता है। इसका नाम कुज और भौम भी है। भूमि-पुत्र होने से कुज और पृथ्वी से पृथक हो जाने के कारण भौम नाम हुआ। चूंकि कुछ संघर्ष के उपरान्त पृथ्वी से प्रथकत्व हुआ। अतः मंगल लड़ाई-झगड़े का कारक ग्रह माना गया है। ग्रहों के कुटुम्ब में रवि, पृथ्वी के पिता और चन्द्र माता के स्थान में है। इसीलिये मंगल में रवि और चन्द्र दोनों के गुणों का मिश्रण पाया जाता है।
आचार्य वराहमिहिर द्वारा- क्रदृक तरूण मूर्ति रूद्रारः पैत्तिकः सुचपलः कृशमध्यः।
दुष्ट दृष्टिवाला नित्य युवा ही प्रतीत होने वाला, दाता, शरीर में पित्त की मात्रा अधिक, अस्थिर चित्त, संकुचित्त तथा पतली कमर, ऐसा मंगल का स्वरूप है।
पाराशर के मत से-
सत्वकुंजः, नेतोज्ञेयो धरात्मजः अत्युच्चांगोभौमः, रक्त वर्णो भौमः, देवता षडानन, भौमेनरः, भौमो अग्नि, कुजः क्षत्रियः, आरः तमः, भौमः मज्जा, भौमवार, भौम तिक्त, भौमः दक्षिणे, कुजः निशायांबली, भौमः कृष्णेचबली, क्रूरः स्वदिवसमहो रामासपर्वकालवीर्यक्रमात् श.कु.बु.गु.शु.-चराघा वृद्धितोवीर्यवत्तराः। स्थूलान् जनयतिसूर्ये दुर्भगान् सूर्यपुत्रकः। श्रीरोपेतान् तथा चन्द्रः कटुकाधान् धरासुतः। वस्त्रे रक्तचित्रे कुजस्य। कुजः ग्रीष्मः।।
सत्वगुण प्रधान तथा शक्तिशाली भौम है। मंगल नेता है। मंगल का कद बहुत ऊंचा है। भूमिपुत्र मंगल रक्तवर्ण है। इसका देवता षडानन् कार्तिकेय हैं यह पुरुष ग्रह है। भौम अग्नितत्व है। भौम क्षत्रिय है, यह तामस है। भौम मज्जासार है। वारों में भौमवार मंगल का है। इसे तिक्त रस पसंद है। इसकी दिशा दक्षिण है। यह रात्रिबली है। कृष्ण पक्ष में बली हैं। क्रूर स्वभाव है। अपने दिवस में, अपनी होरा में, अपने मास में, अपने पर्व और काल में श. भौ. बु. गु. और शु. वृद्धि क्रम से अधिक बली होते हैं। सूर्य बली हो तो जातक स्थूलकाय होता है, शनि से जातक कुरूप और अभागा होता है। चन्द्र से क्षीरयुक्त तथा रस प्रधान पदार्थ होते हैं। मंगल कुटक पदार्थों को जन्म देता है। मंगल के वस्त्र लाल और चित्रित होते हैं। मंगल-ग्रीष्म ऋतु का स्वामी है।
जहां एक ओर यह क्रूर स्वभावी है, कटुक पदार्थों का जन्म दायक है वहीं वृहत् संहिता अनुसार यह कल्याणकारी भी है।
“विपुल विमलमूर्तिः किंशुकाशोवर्णः स्पुत्रूचिरभयूश्वस्तप्तताम्र प्रभावः।
विचरतियदि मार्गे चोत्तेर मेदिनीजः शुभकृदवनिपाना हृदिदश्चप्रजानाम्।।’’
इसका आकार बड़ा होता है, वर्ण अशोक या किंशुक के फूलों जैसा लाल होता है। किरण स्वच्छ और मनोहर होते हैं, कांति तपे हुए तांबे के समान होती है। यही मंगल मार्ग से जब चलता है तब राजा और प्रजा के लिये कल्याणकारी होता है। अर्थात् इन सभी मतों से निष्कर्ष निकलता है कि मंगल ऊर्जा शक्ति है, चंचल स्वभाव, कार्य चतुर, शूर सिद्धांत वचन कहने वाला, हिंसक प्रवृत्ति, तमोगुणी, प्रतापी, साहसी, शत्रुओं को मारने में निपुण, स्वभाव में उग्र, दृष्टि में क्रूरता, कामक्रीड़ा में अतिचंचल, उदारक चपल और आलस्य रहित है। निर्भीक है, स्पष्ट जोरदार बोलने वाला है। अर्थात यदि मंगल शुभ स्थिति में है, उच्च का है, मूल त्रिकोण में है, स्वराशि में है, मित्र राशि में है, योगकारक, शुभग्रहों के साथ तथा शुभ से दृष्ट है तो उपर्युक्त गुण जातक में होंगे ही।
मंगली योग- मंगली योग जन्म कुण्डली में मंगल के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित होने से बनता है। उत्तर भारत में द्वितीय भाव में मंगल को मंगली नहीं मानते किन्तु दक्षिण भारत में मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश में कहीं भी हो वह मंगली ही माना जाता है।
अधिकांश विद्वानों का मत है कि मांगलिक दोष चन्द्र लग्न से तथा शुक्र लगन से भी देखा जाना चाहिये।
चन्द्र लग्न से मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो तो (कुज दोष) मंगली योग होता है। शुक्र लग्न से मंगल प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम या अष्टम में भाव में स्थित हो तो मंगली योग होता है।
मंगली योग चन्द्र, शुक्र से इसलिये देखा जाना चाहिये क्योंकि लग्न के साथ, चन्द्रमा मन का कारक भी है जिससे समस्त मन की अनुभूति होती है तथा शुक्र, विवाह का कारक है। इसलिये इन दोनों का वैवाहिक जीवन में महत्व है।
मंगल क्रूर ग्रह है इसका गुण अशुभ ही होता है ऐसा सत्य नहीं है। इसको जानने के लिए 1, 2, 4, 7, 8, 12 भावों में परिणाम तथा प्रत्येक बारह राशियों में परिणाम जानने होंगे क्योंकि मंगल विभिन्न राशियों में भिन्न-भिन्न फल देता है। उदाहरणार्थ यदि किसी की कुण्डली में मंगली योग है और मंगल निर्बल है तो मंगल अधिक हानि नहीं कर सकता ऐसी कुण्डली के मिलान के लिये, यह जरूरी नहीं है कि दूसरे की कुण्डली में मांगलिक योग हो। मंगल यदि अस्त है या बली क्रूर ग्रहों से दृष्ट है या संधि में है तो मंगल निर्बल होगा।
यदि किसी की कुण्डली में वैवाहिक जीवन सुखद है तथा आयु भी पूर्ण है तो उसका विवाह मंगली योग वाले से किया जाये तो कोई हानि नहीं होगी। अतः हमें यह जानना आवश्यक है कि मंगल, कुण्डली के किस भाव में स्थित है? तथा अपनी दृष्टि द्वारा किन- किन भावों को प्रभावित कर रहा है। मंगल किन ग्रहों के साथ है? तथा मंगल पर किस ग्रह की दृष्टि है। मंगल के द्वारा कौन से योग बन रहे हैं। मंगल तात्कालिक शुभ है और अशुभ। इससे पता चलेगा कि यह कुण्डली में कहां लाभ पहुँचायेगा? मंगल अपनी शक्ति अनुसार ही लाभ या हानि पहुँचायेगा। केवल मंगली होना ही वैवाहिक जीवन को खराब नहीं करता और इसका फल सभी के लिए एक जैसा भी नहीं होता। अतः भली-भांति अध्ययन करके ही मंगली और वैवाहिक योग बताना चाहिए।
यूं तो ऊपर काफी कुछ लिखा जा चुका है किन्तु मंगली-दोष का परिहार अर्थात् निरस्त्रीकरण भी होता है।
परिहार-
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