
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि। इन आठों चिरंजीवीयों की जो मनुष्य प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक स्तुति करता है, वह सब रोगों से मुक्त होकर सुखपूर्वक सौ वर्ष की आयु को प्राप्त होता है। तथा उसकी कीर्ति सदा सर्वदा रहती है।
इसपर तार्किक कहते हैं कि ‘अश्वत्थामा’ ने उत्तरा का गर्भपात करने के लिये ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। द्रौपदी के सोते हुये सात पुत्रों का वध किया ऐसे दुष्टात्मा को चिरंजीवी कहना अनुचित है। बलि ने गर्दभ की योनि प्राप्त की, व्यास का जन्म शुद्रा से हुआ, विभीषण ने वंश क्षय किया, परशुराम ने क्षत्रियों का विनाश किया, ऐसे दोषयुक्त पुरूष स्मरण करने योग्य नही हैं। इस पर आस्तिक संत समाधान करते हैं कि महाभारत अनुशासन पर्व में सावित्री स्तोत्र में वर्णन है कि ये आठ चिरंजीवी दिव्य मुनि हैं। इस लोक में इनमें से प्रत्येक मुनि सात-सात प्रकार से शान्ति और कल्याणकारी दिक्पाल कहे गये हैं। ये जिस दिशा में हैं, उस ओर मुख रखने वाले की शरणागत के समान रक्षा की जाती है। ये लोकों को पवित्र करने वालें हैं। इन का कीर्तन करने वाला यदि संतान की कामना करता है तो उसको संतान की प्राप्ति होती है। निर्धन धन पाता है। और धर्म, अर्थ, काम में सिद्धि प्राप्त करता है। जो प्रभु की शरण में चले जाते हैं, वे घोर पातकी होने पर भी पाप से मुक्त हो कर दिव्य स्वरूप को प्राप्त होते हैं।
विभीषण के लिये गोपाल सहस्त्रनाम में उल्लेख आया है कि लंकाधिपकुलघ्वंसी विभीषणवरप्रदः। श्री भगवान् रावण का नाश करते हैं। और विभीषण को वरदान देते हैं। भगवान् भक्त पुण्यात्मा को सदैव वरदान दिया करते हैं। अतः विभीषण सब तरह से दोष युक्त होकर भी अमरता को प्राप्त हुये। मानस में भी वर्णन आया है कि जब विभीषण भगवान् श्रीरामचन्द्रजी की शरण में पहुँच कर प्रार्थना करते हैं –
अब कृपाल निज भगति पावनी।
देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा।
मांगा तुरंत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तब इच्छा नाहीं।
मोर दरस अमोध जग माहीं।।
अस-कहिं राम तिलक तेही सारा।
सुमन वृष्टि नभ भई अपारा।।
सारांश यह है कि जिस मनुष्य को किसी प्रकार भी श्रीभगवान् का संस्पर्श प्राप्त हो जाता है। वह सब पापों से मुक्त हो कर परम विशुद्ध अमरत्व को प्राप्त करता है। ऐसी ही कृपा भगवान् श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा परा कर के उसे उच्च पद प्रदान किया। महाभारत शान्तिपर्व में वर्णन है कि बलि ने दान कर के इन्द्रासन प्राप्त किया, तब इन्द्र ने सब असुरों सहित राजा बलि पर विजय करके ब्रह्मा जी से हाथ जोड़ कर पूछा कि ‘हे ब्रह्मन! दान करते हुये जिसका धन कभी कम नही हुआ, उस बलि को मैं नहि पा रहा हूँ। उसका पता मुझे बताइये।’ इस पर ब्रह्माजी ने कहा- ‘वह जीवोत्तम बलि किसी उजड़े-फूटे स्थान में ऊँट, गधा, बैल अथवा घोड़ा होगा।’ इन्द्र बोले-हे ब्रह्मन! यदि मै उससे एकान्त स्थान में मिलू तो उसे मारना उचित है या नही। यह आप मुझको उपदेश दीजिये। ब्रह्माजी ने काह कि ‘इन्द्र! बलि को कभी न मारनाः वह मारने के योग्य नही है, क्योंकि मैने उसको चिरंजीवी (अमरत्व) का वरदान दे रखा है। तुम उससे इच्छा के अनुसार कारण पूछने के योग्य हो।’
इस प्रकार ब्रह्माजी के समझाने पर इन्द्र ऐरावत हाथी पर सवार होकर पृथ्वी पर घुमने लगे। तब इन्द्र ने गधे की सूरत में किसी उजड़े हुए मकान में बैठे राजा बलि को देखा। ब्रह्मा जी के कथनानुसार इन्द्र ने कहा कि ‘दैत्य! तुम इस समय गधे की योनि में होकर तृण खाने वाले बने हो, तुम्हारी यह योनि नीच है। इस पर तुम्हें कुछ विचार होता है या नही? बड़े कष्ट की बात है कि आज मै तुमको शत्रुओं के अधीन, तेज, बल, लक्ष्मी से रहित, इष्ट-मित्रों से पृथक गुप्तरूप में रेख रहा हुँं। किसी समय तुम हजारों सवारियों के साथ अपने इष्ट-मित्रों से घिरे सब लोकों को तपाते हुये हम लोगों को तुच्छ समझते चलते थे। तुम्हारे राज्य में पृथ्वी बिना बोये-जोते भी अन्न उत्पन्न करती थी। अब इस भयानक दुखः में हो। इसकी तुम्हें चिन्ता होती या नही?’ इन्द्र के ऐसे हृदय विदारक बचन सुनकर बलि ने इन्द्र को तत्वज्ञान का उपदेश दिया। जिससे इन्द्र ने प्रसन्न होकर बलि से कहा कि ब्रह्माजी की आज्ञा से मै तुम्हें नही मारता हुँ। तुम दक्षिण दिशा में जाकर निवास करो। वहाँ तुम अमरत्व को प्राप्त होओगे। इस तरह ब्रह्माजी और इन्द्र से वरदान पाकर गर्दभ- योनी से मुक्त हो बलि अमरत्व को प्राप्त हुये। इससे तार्किक को शान्ति प्राप्त हुई।
जो पुरूष गुरूवार को दक्षिण दिशा में प्रातःकाल खड़ा होकर राजा बलि का ध्यान करता है, वह सुवर्ण प्राप्त करता है। ब्रह्मपुराण में यह निर्देश है।
श्री व्यासजी पर तार्किक की जो शंका हैं, उसका आस्तिक संत समाधान करते हैं कि व्यासजी की माता उच्चकोटि के तपस्वियों की सेवा सुश्रूषा बड़े सद्भाव से किया करती थी। उनके भुक्त अन्न के सेवन करने से व्यासजी के पूर्वजन्मकृत पाप नष्ट हो गये। फिर माहेन्द्र पर्वत पर जाकर वे समाधिस्थ हो गये। ब्रह्माजी ने उनको दर्शन दिया। उनकी जिव्हा पर सरस्वती बीज लिखकर पुराणों की रचना की आज्ञा दी और यह वरदान दिया कि तुम सदैव अमर बने रहोगे। प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को संसार भर में व्यासपूजा की जाती है। इसको गुरू पूर्णिमा भी कहते हैं, बृज में इसी को मौनी पूर्णिमा भी कहते हैं। प्रतिवर्ष गोर्वधन पर्वत पर उत्सव मनाया जाता है। परिक्रमा में लाखों मनुष्य एकत्र होते हैं। परिक्रमा करते समय वृद्ध संत के रूप में व्यासजी के दर्शन होते हैं, ऐसी मनुष्यों की भावना चली आ रही है। विद्याध्ययन के आरम्भ में भगवान की कथा के आरम्भ में श्री व्यासजी की पूजा प्रथम करने का नियम सृष्टि के आरम्भ से चाला आ रहा है। जो विद्यार्थी प्रति पूर्णिमा को व्यासजी की प्रतिमा की पूजा करता है, वह सदैव प्रथम श्रेणी मे सफलता प्राप्त करता है।
श्री हनुमानजी वायु पुत्र हैं। वायु सृष्टि के आदि-अन्त तक रहता है। इसी के साथ ये हनुमानजी भी अमर हैं। इनकी शनिवार को उपासना करने से मनुष्य के सब मनोरथ पूर्ण होते हैं। जो मनुष्य शनिवार को श्री हनुमानजी की प्रतिमा पर मीठे तेल की धारा देता है, उसको शनिदेव की पीड़ा नही होती।
श्रीमार्कण्डेय ऋषि की उपासना करने से मनुष्य शतायु होता है। एक तोला गोमुत्र को इनके नाम से शत बार आभिमन्त्रित करके जो पीता है, उसको कभी ज्वर नही आता है। उसकी बुद्धि तेज होती है। शरीर में स्फुर्ति आती है। प्रतिवर्ष जब मनुष्यों की जन्म-तिथि आती है, उस दिन धर्मात्मा और आस्तिक भद्रपुरूष नूतन वर्ष की पूजा करते हैं। उस समय दीर्घायु-प्राप्ति के लिये श्री मार्कण्डेय ऋषि की स्तुति करते हैं-
ऊँ मार्कण्डेय महाभाग सप्तकल्पान्त जीवन।
चिरंजीवी यथात्व भे भविष्यामि तथा मुने।।
रूपवान् वित्तवांश्चैव श्रिया युक्तश्च सर्वदा।
आयुरारोग्यसिद्धयर्थ प्रसीद भगवन् मुने।।
चिरंजीवी तथा त्वां भो मुनीनां प्रवरो द्विजः।
कुरूष्व मुनिशार्दूल तथा मा चिरंजीविनम्।।
नववर्षायुतं प्राप्य महता तपसा पुरा।
सप्तैकस्य कृत येन ह्यायुम सम्प्रयच्छतु।।
इस प्रकार प्रार्थना करके एक पात्र में दो पल दूध तथा तिल-गुड़ मिलाकर पीने से मनुष्य शतायु होता है। निद्रा टुटते ही सर्वप्रथम जो उपर्यूक्त चिरंजीवी का स्मरण करते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं।
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