कुंडली के विभिन्न योगों का विश्लेषण

कुंडली के विभिन्न योगों का विश्लेषण

संतान प्राप्ति योग :- लग्नेश, सप्तमेश, पंचमेश व गुरू पंचम भाव को देखते हां तो इन ग्रहों की दशांतर्दशा में पुत्र प्राप्ति का योग बनता है। जब गोचर काल में लग्न का पति पंचमेश के साथ दृष्टि सम्बंध करे तो पुत्र प्राप्ति होती है। पंचम का पति वा उस स्थान की राशि का पति नवांश में बली व राशिपति पंचम स्थान का एवं पंचमेश ग्रह दोनों गोचर में आपस में दृष्टि सम्बंध करें तब भी पुत्र प्राप्ति होता है।

संतान न होने के कारण :- यदि सूर्य ग्रह संतान के विषय में बाधा करता हो तो शिव मूर्ति का पूर्व जन्म में खण्डन व पितृजों का अपमान किया है। इसके दोष से स्त्री के पेट में गाँठ पड़ जाती है व कृश हो जाती है। चंद्रमा यदि बाधक हो तो भगवती उमा की मूर्ति का खण्डन, व किसी समय पूर्व जन्म में गुरूजन व माता-पिता का बृहद अपमान किया हो, या मित्र के साथ धोखा किया हो इस कारण संतानोत्पत्ति नहीं होती है। इस ग्रह से स्त्री का गर्भ सूज जाता है।

यदि मंगल ग्रह संतान में बाधा उत्पन्न करता हो तो पूर्व जन्म में ग्राम देवता का अपमान, स्वामी कार्तिकेय का अपमान किया। इस कारण संतान प्राप्ति नहीं होती, इन दोषों से कोई शत्रु गर्भ-योनि मंत्र तंत्र से बंद कर देता है। यदि बुध ग्रह के कारण संतान प्राप्ति न हो तो पूर्व जन्म में किसी बिल्ली या बिलाव का वध किया, या किसी बच्चे को अधिक पीटने से उसके श्राप से संतान प्राप्ति नहीं होती। इसमें स्त्री के गर्भ यंत्र में प्रजनन शक्ति नहीं रहती है। यदि गुरू ग्रह बाधक हो तो, इष्ट देवता का अपमान, ब्राह्मण का श्राप, फल युक्त वृक्ष काटने से संतान नहीं होती। शुक्र बाधक हो तो किसी सती माता का अपमान, व बैल-गाय के वध के कारण संतान प्राप्ति नहीं होती है। शनि ग्रह बाधक हो तो, पीपल के काटने से, भूत प्रेतादिक बाधा से अथवा यम दोष से संतान नहीं होती। इससे पुरूष नपुंसक होता है एवं स्त्री प्रजनन शक्ति युक्त नहीं होती है। राहु व केतु बाधक हो तो सर्प के मारने वा ब्राह्मण को जहर देने के दोष से संतान प्राप्ति नहीं होती। इससे गर्भ पर चर्बी चढ़ जाती है।

विशेष नोट :- इन दोषों की शांति कैसे हो? इसका किस कारण से दोष दूर हो, व संतान प्राप्ति हो इसकी विशेष जानकारी के लिये कार्यालय में सम्पर्क करें एवं संतान प्राप्ति के वास्ते विशेष कर प्रजापति देवता की आराधना विधिवत् करें।

स्त्री प्राप्ति योग :- जिसकी जन्म कुंडली में द्वितीय, व्यय, सप्तम वा नवम, का पति वा इन राशियों का पति त्रिकोण, मूल उच्च में गुरू दृष्टि युक्त हो अथवा गोचर में यह मूल त्रिकोण में आ जाये उस समय स्त्री प्राप्ति होती है। शुक्र दृष्टि से युक्त यह ग्रह हो तो सौभाग्यवती सुन्दर पुत्र युक्ता, यदि बुध दृष्टि युक्त हो तो लड़ाकू चरित्रहीन संतानहीन स्त्री प्राप्त होती है।

भार्या लाभ किस दिशा से :- सप्तमेश ग्रह व राशि की दिशा, सप्तमेश जिस राशि में हो, उसकी दिशा, शुक्र जिस राशि में हो उसकी दिशा में स्त्री लाभ वा गुरू यदि सप्तम में हो तो उसमें पंचम ग्रह की दिशा में भी स्त्री लाभ होता है।

स्त्री न हो ऐसे योग :- यदि सप्तम भाव में अष्टम राशि का शुक्र सप्तम में वृष राशि का बुध, व नीच का गुरू, शनि मंगल कर्क में, ऐसे ग्रह दशम व चतुर्थ स्थान के राशिपति ग्रह से दृष्टि सम्बंध करते हों तो स्त्री लाभ नहीं होता।

नपुंसक योग :- शनि युक्त शुक्र दशम स्थान में वा आठवें या शनि छठे या व्यय में नीच का विषम राशि का सूर्य सम राशि का चंद्रमा विषम राशि सूर्य सम का मंगल विषम राशि गत चंद्रमा सम राशिगत बुध यह नपुंसक योग बनाता है। पिता के मृत्यु समय का ज्ञान :- नवम स्थान में सूर्य या भौम हो, नवमेश द्विस्वभाव राशिगत हों, या दो पाप ग्रहों के साथ हो, या गोचर में इन्हीं राशियों में राजयोगकर्त्ता ग्रह हों तो पिता के लिए मारक होता है।

स्त्री नपुंसक योग :- यदि नवम स्थान में शत्रु क्षेत्री शुक्र या द्वितीय स्थान में उच्च का शनि वा पंचम स्थान में शत्रु क्षेत्री बुध हो तो स्त्री नपुंसक होती है।

भ्रातृकष्ट योग :- तृतीय स्थान में नीच व शत्रु क्षेत्री ग्रह या तृतीय स्थान से पंचम या नवम स्थान में शुक्र शत्रु क्षेत्री हो तो भ्रातृ नाश या कष्ट होता है।

कार्य या नौकरी प्राप्ति योग :- लग्नेश पंचमेश, भाग्येश, राज्येश एवं लाभेश का कहीं भी किसी भी स्थान पर सहदृष्टि सम्बंध हो, उसकी दशान्तर्दशा वा गोचर में त्रिकोण भ्रमण समय नौकरी, या व्यापार योग होता है।

वायुयान या सेना में नौकरी योग :- षष्ठेश मंगल या शनि उच्च का हो तो सेना में अच्छा पद प्राप्त कर सकता है कमाण्डर चीफ का यदि षष्ठेश में और सौम्य ग्रह उच्च के या स्वक्षेत्री हो तो वायुयान की नौकरी प्राप्त करता है।

डाक्टर वैद्य, ज्योतिषी योग :- गुरू से चतुर्थ, या लग्न से चतुर्थ स्थान में सूर्य-बुध योग कर्क राशि में हो या चंद्रमा से अष्टम स्थान में ऐसा योग हो तो उपरोक्त पदवी प्राप्त होती है।

यश प्राप्ति योग :- दशम का मालिक, मूलत्रिकोण, स्वक्षेत्री होकर, व्यय भाव में पड़े तो, देश-देशान्तर में यश प्राप्ति होती है।

महादरिद्र योग :- लग्न से चौथे भाव में कोई ग्रह न हो, शुक्र से दशवें कोई ग्रह न हो एवं चंद्रमा से अष्टम में कोई ग्रह न हो, ऐसा जातक कई जन्म तक दरिद्रता प्राप्त करता है।

बालक के जन्म समय मृत्यु-योग लग्न में व सप्तम में पापी ग्रह हो और चंद्रमा पापी ग्रहों के साथ स्थित हो, उस चंद्रमा को सौम्य ग्रह न देखते हों तो उत्पन्न हुआ बालक शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होता है।

चंद्रमा पापी ग्रह से युक्त हुआ लग्न, द्वादश, सप्तम अष्टम इनमें से किसी स्थान में हो, शुभ ग्रह केन्द्रों में न हों, चंद्रमा भी शुभ ग्रहों की दृष्टि से वर्जित हो तो जन्म लेने वाले को मृत्यु देने वाला होता है। क्षीण चंद्रमा लग्न में हो, केन्द्रों में आठवें चर पापी ग्रह हों, इस योग में उत्पन्न हुआ बालक मृत्यु को प्राप्त होता है। इसी तरह पापी ग्रहों के मध्य चंद्रमा शुभ लग्न में हो और सातवें आठवें पापी ग्रह हों, यदि बलवान शुभ ग्रह से चंद्रमा दृष्ट न हो तो बालक माता-पिता के साथ मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि बलवान शुभ ग्रहों से चंद्रमा देखा जाता है तो माता-पिता की मृत्यु नहीं होती। द्वादश स्थान में शनि हो, सूर्य नवम हो, चंद्रमा लग्न में, मंगल अष्टम स्थान में हो और ये सब ग्रह यदि बलवान गुरू से दृष्ट न हों तो उत्पन्न बालक की शीघ्र मृत्यु हो जाती है। यदि बलवान गुरू किसी को न देखे व बलहीन गुरू सबको देखे तो शीघ्र मृत्यु नहीं होती। यदि गुरू सबको देखता हो तो वह फल नहीं होता। पापी ग्रह से युक्त चंद्रमा पंचम, सप्तम, नवम, द्वादश, लग्न और अष्टम स्थानों में हो, नवांश में बुध, गुरू और शुक्र इनमें से किसी एक से भी युक्त-दृष्ट न हो तो यह योग नहीं होता।

चंद्रमा जन्म लग्न से आठवें स्थान में हो और पापी ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होता है। इस चंद्रमा को पापी ग्रह न देखते हों और शुभ ग्रह देखते हों, तो आठ वर्ष तक जीवित रहता है। पापी ग्रह और शुभ ग्रह दोनों देखते हों तो चार वर्ष जीता है। शुभ या पापी ग्रह कोई नहीं देखता हो तो यह योग नहीं होता। शुभ ग्रह से युक्त और शुभ क्षेत्र से छठे स्थान में चंद्रमा हो तो मृत्यु नहीं देता। कृष्ण पक्ष में दिन का जन्म हो, शुल्क पक्ष में रात्रि का जन्म हो और छठे आठवें स्थान में शुभ व पापी ग्रह से दृष्ट हो तो शुभ फल देने वाला नहीं होता।

माता-पिता का अरिष्ट योग-
पिता के लिये सूर्य तथा दशम स्थान से और माता के लिये चंद्रमा तथा चतुर्थ स्थान से विचार करना चाहिये। यदि बालक की जन्म कुंडली में सूर्य के साथ दशम स्थान में पापी ग्रह बैठे हों या देखते हों या सूर्य पाप ग्रहों के मध्य में पड़ा हो तो उस बालक के जन्म समय पिता को कष्ट जानना चाहिये। यदि सूर्य से 4।6।8 स्थान में पापी ग्रह हों, शुभ कोई भी न हो, शुभ नवांश में स्थित शुभ ग्रहों से देखे जाते हों, तो भी पिता को कष्ट जानें।
इसी प्रकार चंद्रमा तथा चतुर्थ भाव से माता का विचार करें। चंद्रमा के साथ 2।12वें स्थान व 4।6।8 स्थान में पापी ग्रह हों, शुभ न हो तो माता को कष्ट जानें।

अरिष्ट भंग योग :- यदि बलवान गुरू लग्न में विराजमान हुआ अनेक प्रकार के अरिष्टों को दूर करता है। लग्नपति अति बलवान केन्द्र स्थित शुभ ग्रहों से देखा जाता हो तो दीर्घायु देता है। ग्रहों की वर्गों में स्थिति हो तो वे अरिष्टों को दूर करते हैं।
मूक योग :- छठे घर का स्वामी बुध के साथ लग्न में बैठा हो तो जबान तोतली या गूँगा होता है। चंद्रमा लग्न में हो और छठे घर की राशि मिथुन या कन्या हो अथवा दूसरे घर का स्वामी बृहस्पति के साथ 6।8वें या 12वें घर में हो, अथवा शुक्ल पक्ष का चंद्रमा मंगल के साथ लग्न में हो तो तोतली जबान और गूँगा होता है।

ऋण योग :- धन स्थान में पापी ग्रह हो, लग्नेश द्वादश स्थान में स्थित हो और नवमेश लाभेश से दृष्ट व युक्त हो तो जातक ऋणी होता है। धनेश नीच राशिगत हो धन व अष्टम भाव पापयुक्त रहे तो जातक ऋण से दबा रहे।
लाभेश की राशि जिस नवांश में हो उसका स्वामी दृष्ट भाव में पापयुक्त हो तथा क्रूर षष्ठांग में हो तो मनुष्य ऋण ग्रस्त होता है।

सन्यास योग :- लग्नेश पर केवल शनि की दृष्टि हो अन्य की नहीं, अथवा शनि को लग्नेश देखे और लग्नेश शनि देखें, बल रहित हो तो सन्यास योग होता है।

बालारिष्ट योग :- जन्म लग्न से 6-8-12 स्थान में स्थिर चंद्रमा को यदि क्रूर ग्रह देखते हों तो वह बालक अल्यापु जानना। यदि पूर्वोक्त चंद्रमा को शुभ ग्रह देखते हों तो बालक की आयु 8 वर्ष की जानना। शनि अथवा शुभ ग्रह 6-8-12 इन स्थानों में हों वह वक्री तथा क्रूर ग्रहों से देखे भी जाते हों, लग्न में कोई शुभ ग्रह नहीं हो, तो बालक की आयु एक मास जानो। जिसके लग्न से पाँचवें स्थान में सूर्य, मंगल और शनि ग्रह तीनों पड़े हों तो उस बालक की माता सहित मृत्यु जानना तथा भाई को हानि हो। जिनके सप्तम स्थान में शनि छठे चंद्रमा और सातवें स्थान में मंगल हो उस बालक की माता सहित मृत्यु जानना। जिसके लग्न में शनि हो, चंद्रमा आठवें हों, बृहस्पति तीसरे हों उस बालक की शीघ्र मृत्यु जानना। जन्म लग्न का बारहवें स्थान में कोई भी ग्रह शुभफल करने वाला नहीं होता परन्तु सूर्य चंद्रमा शुक्र और राहु को विशेष कष्ट कारक जानें तथा इनकी दृष्टि भी शुभ नहीं है। जिसके जन्म लग्न से बारहवें, आठवें तथा दूसरे क्रूर ग्रह पड़े हों तथा लग्न क्रूर ग्रहों के बीच में हो तो बालक की शीघ्र ही मृत्यु जानना।

छठे, आठवें तथा जन्म लग्न में बुध हो तो चौथे वर्ष बालक की मृत्यु हो। मंगल के घर में बृहस्पति और छठे आठवें चंद्रमा हो तो आठवें वर्ष बालक की मृत्यु हो, जन्म लग्न के दसवें राहु तथा जन्म में राहु हो तो सोलहवें वर्ष में बालक की मृत्यु हो, जिसके लग्न या अष्टम स्थान में चंद्रमा सहित राहु हो तो उस बालक की दस दिन में मृत्यु होती है।

अरिष्ट भंग योग :- बुध, बृहस्पति, शुक्र इनमें से एक भी ग्रह केन्द्र (1।4।7।10) में हो, बलवान होकर केवल यदि बृहस्पति ही लग्न में हो। बली होकर लग्न का स्वामी यदि केन्द्र में हो। शुक्ल पक्ष में रात्रि का जन्म हो तथा लग्न शुभ ग्रहों से देखा जाता हो, इसी प्रकार कृष्ण पक्ष में दिन का जन्म हो और पूर्ववत् लग्न शुभ ग्रहों से दृष्ट हो इन पाँच योगों में से एक भी योग पडे़ तो ऊपर दिये हुये अरिष्टों को भंग करने वाला योग जानना।

माता-पिता अरिष्टम् :- हर एक पुरूष के लिये सूर्य से पिता का विचार और चंद्रमा से माता का विचार करना चाहिये। अतएव जिस बालक की जन्म कुंडली में सूर्य के साथ पापी ग्रह बैठे हों अथवा देखते हों या सूर्य पापी ग्रहों के बीच में पड़ा हो तो उस बालक के जन्म समय पिता को कष्ट जानना चाहिये। इसी प्रकार सूर्य से 4।6।8 स्थान में क्रूर ग्रह हो तो भी पिता को कष्ट जानना। इसी प्रकार चंद्रमा के साथ 2।12 स्थान में शुभ न हो तो माता को कष्ट जानना।

त्रिखल जन्म फलम् :- तीन पुत्रों के बाद कन्या हो या तीन कन्याओं के पश्चात् पुत्र हो तो त्रिखल नामक दोष होता है। इससे माता को अरिष्ट, महाभय, धन-हानि आदि होवे। त्रिखल शांति करें।

पितृपरोक्षज्ञानम् :- बालक के जन्म समय पिता घर में था कि नहीं? इसका विचार इस प्रकार से करना चाहिये कि जन्म कुंडली में लग्न को यदि चंद्रमा नहीं देखता हो तो बालक के जन्म के समय उसका पिता घर में नहीं था, ऐसा कहना इसमें इतना कथन विशेष है कि यदि सूर्य जन्म लग्न में अष्टम, नवम, एकादश तथा द्वादश स्थान में चंद्रमा राशि का होकर पड़ा हो तो पिता बालक के जन्म के समय दूसरे देश में था, परन्तु घर में नहीं था। इसी प्रकार सूर्य के द्विस्वभाव में होने पर मार्ग में कहे। परन्तु इन सब योगों में लग्न को चंद्रमा देखता हो तो पिता घर में ही था, ऐसा जानना चाहिये। जन्म समय शनि लग्न का हो अथवा मंगल सातवें स्थान में हो और दूसरा द्वितीय स्थान में पड़ा हो, तो भी पिता के परोक्ष में बालक जन्म जानना, परन्तु यह चंद्रमा का बुध शुक्र के बीच में दोनों अंशों का योग भी जान लेना जैसे बुध स्पष्ट पाँच अंश हो, चंद्रमा दश अंश शुक्र पन्द्रह अंश हो, और तीनों एक ही राशि में बैठे हों तो पूर्वोक्त योग जानना।

मूक योग :- तीसरे स्थान में शुक्र हो, सिंह या मेष के गुरू हों 10वें सूर्य या मंगल हो तो वह बालक मूक होता है।
वर-कन्या मिलाप :- कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक गिनें, वैसे ही वर के नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तक गिनें। जोड़कर 9 का भाग देवें। जो 3-5-7 आये तो वश्य है बाकी शत्रु जानें।

स्त्री जातक विचार :- जिस स्त्री के लग्न या सातवें स्थान में पाप ग्रह हों तो उस स्त्री का पति सात वर्ष में मर जावे और चंद्रमा छठ,े आठवें हो तो आठ वर्ष में मरे। लग्न से पाँचवें सूर्य हो तो उस स्त्री के एक ही बालक हो और मंगल पाँचवें हो तो तीन पुत्र हों और बृहस्पति पाँचवें हो तो पाँच पुत्र हों। जिस स्त्री के पाँचवे चंद्रमा हो तो 2 कन्या हों और बुध पाँचवें हो तो चार कन्या हों तथा शुक्र पाँचवें हो तो सात कन्या हो। जिस स्त्री के नवें शुक्र हो तो छः कन्यायें तथा सातवें राहु हो तो एक पुत्र हो। गुरू या शुक्र छठे-आठवें हां तो उसके बालक न जियें। मंगल छठे आठवें स्थान में हो तो गर्भ में ही बालक नष्ट हो जाये। जिस कन्या के लग्न में पाप ग्रहों के बीच में चंद्रमा हो तो वह कन्या पिता और ससुर दोनों के कुलों का नाश करें। सातवें शुक्र हो तो कुल दोष करने वाली हो तथा कर्क राशि में मंगल हो तो इच्छापूर्वक घर घर में घूमे।
जिस कन्या का कर्क लग्न में जन्म हो, सातवें सूरज हो और लग्न पर बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि हो तो वह स्त्री विद्यावती हो तथा रानी हो, पुत्र-पौत्र बहुत हों।

स्त्री के सप्तम भाव में किसी ग्रह की दृष्टि या कोई ग्रह नहीं हो तो उसका पति उसका अकिंचन होता है। यदि बुध या शनि की राशि सप्तम भाव में हो तो उसका पति नंपुसक होता है। यदि सप्तम द्विस्वभाव राशि हो तो उसका पति विदेश वासी होता है। यदि स्थिर राशि, सप्तम भाव हो तो उसका पति सदा पास में रहता है।

राजयोग :- नवें स्थान का स्वामी दसवें में हो और दसवें स्थान का स्वामी नवें में हो तो राजयोग होता है।

नेत्र नाश योग :- (1) शनि, मंगल, सूर्य, चंद्रमा 8।6।2 अथवा 12वें हों तो अंध योग जानना होता है। (2) पापयुक्त मंगल लग्न में होने से भी अंध योग होता है। (3) मंगल व चंद्रमा 12वें हों तो बांयां नेत्र और यदि सूर्य व राहु 12वें हों तो दाएं नेत्र का विनाश हो।

पितृ-नाश योग :- (1) यदि सूर्य के दसवें पापी ग्रह हों या दशमेश पापयुक्त हो तो बालक का पिता महान कष्ट पावे अथवा मर जावे। (2) सूर्य से 7वें मंगल या शनि हो तो पिता को कष्ट हो। (3) मंगल व शनि के मध्य में सूर्य हो यानि लग्न में चंद्रमा 6ठें और मंगल 7वें हो तो बालक का पिता न जीवें। (4) चौथा व दसवाँ स्थान पाप ग्रहों से युक्त हो तो पिता का अनिष्ट हो। (5) दसवें मंगल शत्रु राशि का हो तो पिता की मृत्यु हो, शत्रु स्थिर राहु व गुरू हो अथवा 1, 2 हों तो 23वें वर्ष में पिता का नाश हो। (6) लग्न में शनि, सातवें मंगल हो और चंद्रमा बुध व शुक्र के मध्य होकर लग्न को न देखे तो जन्म से पूर्व ही पिता की मृत्यु हो।

मातृ-नाश योग :- (1) चंद्रमा से सातवें मंगल या शनि हो तो माता रोग से पीड़ित हो (2) मंगल व शनि के मध्य में चंद्रमा हो तो माता की मृत्यु हो, (3) छठे या बारहवें पाप ग्रह हो तो माता का अरिष्ट हो, (4) क्षीणता बलहीन चंद्रमा से 4 या 11वें पाप ग्रह हो तो माता की मृत्यु हो।

गर्भ योग :- वर्ष कुंडली में लग्नेश पाँचवें या सातवें पड़ा हो और पंचमेश या सप्तमेश लग्न में पड़ा हो तो उस वर्ष गर्भ योग होता है। शुभ ग्रह पाँचवें हो और पंचमेश देखता हो तो गर्भ योग होता है। गुरू की राशि में चंद्रमा हो और मंगल शुभ राशि में हो या शुक्र की राशि में स्थित हो और शुक्र अपनी राशि में बैठा हो तो भी गर्भ योग होता है।

मामा नाश योग :- बुध से छठे पापग्रह, पाप युक्त तथा बलहीन नीच राशि नवांश के में हो तो मामा का नाश हो।

भ्रातृ नाश योग :- (1) तीसरे स्थान में सूर्य बड़े भाई को, शनि छोटे भाई को और मंगल छोटे बालकों का नाश करता है (2) मंगल और तीसरे पापी ग्रह हों तो भाइयों का सुख दूर हो।

उच्च योग :- शुक्र बुध युति में बृहस्पति 1।4।7।10वें हों तथा जिसके दसवें मंगल हो तो उच्च योग जानना (2) मंगल, सिंह राशि में चंद्रमा 5वें और राहु 12वें हो तो बालक कुल दीपक समान जानना, (3) लग्न से या 7वें मंगल, 5वें सूर्य और बारहवें राहु हो तो बालक बहुत प्रसिद्ध हो, (4) तीन ग्रह उच्च के हों तो राजा, अपने घर के हों तो मंत्री जरूर हो।

नीच योग :- (1) जन्म लग्न से 4वें और 7वें शनि हो तो बालक म्लेच्छ हो। (2) जो जन्म-पत्र में तीन ग्रह नीच के हों तो दास, तीन अंत के हों तो मूर्ख हो, (3) सूर्य और चंद्रमा 7वें शनि से दृष्ट हो तो नीच काम करें।

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