
मनुष्य व प्राणीमात्र जब इस सांसारिक वातावरण में जन्म लेता है, तब इस भौतिक देह धारी शरीर में पंचतत्व का भी उसी समय प्रवेश हो जाता है, देह तब तक ही सजीव कहलाती है, जब तक पंचतत्व उसमें रहते हैं। पंचतत्व के विलीन होते ही शरीर को मृत मृत की संज्ञा देदी जाती है। चाहे लखपति हो या करोड़पति वह मृत घोषित होने के बाद राख में मिलने के लिये अग्नि संस्कार कर दिया जाता है यह क्रम सृष्टि के प्रारम्भिक काल से लेकर आज तक यथावत बना हुआ है। मनुष्य व प्राणी जन्म लेता है, और अपनी कालावधि को पूर्ण करके इस संसार से न जाने कहां विलीन हो जाता है।
विज्ञान के चरमोत्कर्ष साधनों की उपलब्धि भी इस विषय के लिये अब तक रिक्तभास बनी हुई है। यही एक प्रश्नचिन्ह ईश्वर की ओर आस्था और ग्रहों की ओर मानव मस्तिष्क को प्रभावित करता है, अन्यथा इस युग में जहां सच्चाई और इमान की कोई कीमत नही वहां इश्वर पर आस्था? जो कभी किसी की तपस्या पर भी दर्शन देने के लिये इस घोर कलियुग में प्रकट नहीं होते, किन्तु फिर भी मनुष्य उन पर वही आस्था बनाये हुये है। इससे स्पष्ट है कि इस संसार की समस्त क्रियाओं में निश्चिय ही अदृश्य शक्ति कार्यरूप है, जो देहधारी शरीर को पग-पग पर संकेत करती है। अदृश्य शक्तियों में हमारे ज्यौतिष जगत नव ग्रह का पूर्ण अधिपत्य है।
क्योंकि प्रत्येक ग्रह का अपना क्षेत्र है। स्वतन्त्र स्वभाव है, और वे अपना प्रभाव प्राणी मात्र को बताते ही है। अर्थात् जन्मकालिक स्थिति में जिस ग्रह का जैसा प्रभाव होता है, उसी के अनुरूप जीवधारी शरीर तद्सम्बन्धी क्रिया को लक्ष्य पूर्ति का साधन बनाता है, और उसे चरितार्थ करता है, यहां शुक्र ग्रह की प्रकृति और उसके द्वादश राशि व द्वादश भावों पर जन्मकालिक प्रभाव दिये जा रहे हैं, जो शास्त्र मतानुसार ही है।
शुक्र ग्रह की प्रकृति- सोम्य प्रकृति, स्त्री संज्ञक, आंलकारिक वस्तु का द्योतक, क्रियात्मक कला, संगीत, नृत्य इत्यादि सौन्दर्य प्रधान, श्वेत वस्तु का कारक, कामभावना को जन्म देने वाला, विलासिता की वस्तु की ओर प्रेरित करने वाला ग्रह है। किन्तु शुक्र की प्रकृति का शुभ फल स्वक्षेत्री राशि, मित्रक्षेत्री राशि या उच्च राशि पर शुक्र होने पर ही मिलता है। शत्रु क्षेत्री व नीचस्थ शुक्र के रहने पर नहीं।
लग्न स्थान पर शुक्र ग्रह- (स्वराशि, मित्र राशि या उच्चराशि) होने पर जातक उसके शुभ फल को भविष्य में प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति में निम्न प्रकार की बातें विशेषतः लागू होती है। किसी विशिष्ट कला का मर्मज्ञ, व्यवहार कुशल, प्रिय वाणी बोलने वाला सुन्दर देह वाला, आकर्षण व्यक्तित्व वाला, श्वेत वस्त्रों को धारण करने वाला, कामकला में निपुण, उत्साहशील, संगीतानुरागी व चित्रकला इत्यादि में प्रवीण होता है।
द्वितीय स्थान पर शुक्र ग्रह- यह क्षेत्र अन्य किसी पाप ग्रहों से दृष्ट किवा युक्त न हो, और उस पर शुक्र ग्रह का प्रभाव हो, तो ऐसा व्यक्ति अलंकारिक वस्तु को अधिक महत्व देने वाला, सुन्दर नेत्रों वाला, कुलभूषण, अन्न, धन व वाहन से युक्त, विद्यावान, गायन कला में दक्ष होता है।
तृतीय स्थान पर शुक्र ग्रह- यह क्षेत्र शुक्र ग्रह के लिये उतना शुभ लक्षण कारक नहीं होता है। इसका, कारण यह स्थान पराक्रम का विशेष तौर पर है। उसके बाद, इस स्थान का महत्व भाई बहिन और मित्रवर्ग का होता है। इसलिये पराक्रम पर शुक्र का प्रभाव उतना फलदायी नहीं होगा। ऐसे व्यक्ति शिथिल और आलस्य पूर्ण रहते हैं। छोटा-सा कार्य भी यदि सिर पर आ जावे तो ऐसा आभास करने लगते है, जैसे बहुत बडा पहाड़ खोदना हो। प्रायः ऐसे व्यक्ति जहां तक बचने का यत्न करते हैं। और जब सिर पर आ ही जाता है तब किसी भी गैर व्यक्ति से निजी समस्या को हल करने का यत्न कर लेते है।
चतुर्थ स्थान पर शुक्र ग्रह- शुक्र का इस क्षेत्र पर बैठना शुभ फलदायी है, क्योंकि यह स्थान सुख सुविधाओं का स्थान है। यहां शुक्र अनेक प्रकार के सुख साधनों को प्रदानकर्ता बन जाता हैं। मकान, वाहन, अलंकृत वस्तु, प्रियात्मक वस्तु, मातृसुख, सम्पत्ति इत्यादि के लिये शुक्र का प्रभाव श्रेष्ठ फलदायी है।
प´चम स्थान पर शुक्र ग्रह- इस क्षेत्र पर शुक्र का प्रभाव विद्या, बुद्धि, ललित कलाओं एवं सन्तान में विशेष कर कन्या रत्न की विशेषता को संकेत करता है। इससे प्रभावित व्यक्ति काव्य में, कला में, संगीत, नृत्य, गायन मे दक्ष होता है।
शत्रु भाव स्थित शुक्र ग्रह- इस स्थान पर शुक्र ग्रह का फल फलदायी नहीं होता। इतना सम्भव अवश्य होता है कि शुक्र ग्रह यदि इस स्थान पर स्वक्षेत्री होकर स्वतन्त्र हों, अर्थात् अन्य किसी ग्रह का दुष्प्रभाव न हो तो शत्रुपक्ष की बड़ी सूझ-बूझ के साथ समस्या हल करने में सफल होते है। ‘जातकमरण’ तो इस क्षेत्र के लिये शुक्र ग्रह को बिलकुल महत्व नहीं देता। उसमें स्पष्ट लिखा है।
अभिमतो न भवे त्प्रमदा जने ननु मनो भव दीन तरो नरः।
विबलता कलितः किल संभवे भृगु सुतेऽरि गतेऽरिभयान्वितः।।
सप्तम भाव स्थित शुक्र ग्रह- सप्तम भाव दाम्पत्यभाव होने से शुक्र इसके कारक ग्रह है। इस स्थान के समस्त शुभ फल मनुष्य को जीवन में मिलते है। अर्थात् स्त्री, सौख्य, सौन्दर्य, प्रधान किसी विशिष्ट कला में प्रवीण, स्त्री द्वारा भाग्य वृद्धि का द्योतक है।
अष्टम भाव स्थित शुक्र ग्रह- इस स्थान पर शुक्र ग्रह यश प्राप्ति और निर्भयता के लिये जातक को प्रेरित करके उत्साह बढ़ाते है। जीवन के उतार चढाव में मनुष्य सन्तुलन नहीं खोता है। इतना शुक्र ग्रह इस स्थान पर अपना प्रभाव बताते है।
नवम भाव स्थित शुक्र ग्रह- इस स्थान पर शुक्र का शुभ प्रभाव भाग्यवृद्धि कारक होता है। अन्य किसी दूषित ग्रहों का प्रभाव न हो तो ऐसा व्यक्ति स्वतन्त्र व्यक्तित्व बनाता है। आर्थिक स्थिति में सुदृढ़ यश (मान सम्मान) प्राप्त करने वाला, वाहन इत्यादि के सुखोपभोग प्राप्त करने वाला व धार्मिक कार्यो में व धार्मिक यात्रा में पूर्णतः सम्मिलित होता है।
दशम भाव स्थित शुक्र ग्रह- शुक्र ग्रह इस स्थान पर बैठकर व्यक्ति को राज्यवृद्धि (उच्च पद) देते है। व उचित प्रतिष्ठा, सुख सम्पदा कारक होता है।
एकादश स्थान पर शुक्र ग्रह-जन्म पत्रिका में इस स्थान को लाभ स्थान, आय स्थान की संज्ञा दी जाती है। जीवन में मनुष्य कहां से, कब, कितना, धन प्राप्त करेगा? उसका बोध इसी स्थान से होता है। शुक्र का इस स्थान पर बैठना शुभ फलदायी है। शुक्र का इस स्थान पर बैठना चंचल व सोम्य प्रकृति का द्योतक है। तथा इससे प्रभावित व्यक्ति किसी विशिष्ट कला का मर्मज्ञ होता है। धार्मिक कार्यादि में दक्ष होता है।
द्वादश स्थान पर शुक्र ग्रह- शुक्र ग्रह इस स्थान पर आकर अपने सम्पूर्ण शुभ लक्षण को न देकर विपरीत फल देते है। यह स्थान विशेषतः यात्रा प्रवास, व्ययस्थान व चिन्ता कारक होता है। इस पर शुक्र का उसी तरह विपरीत फल दायी होता है। जिस प्रकार गुण्ड़ो की बस्ती में एक सभ्य व्यक्ति अपना चरित्र व जीवन को बचाने के लिये तात्कालिक स्वभाव बदल देता है।
द्वादश राशियों पर प्रभाव-
मेष राशि में स्थित शुक्र ग्रह- जन्मपत्रिका में शुक्र ग्रह मेष राशि पर होने से जातक आर्थिक दृष्टि से, सम्पन्न होकर वाहनसुख का भोग प्राप्त करता है। तथा जीवन में अनेक प्रकार के सुख भोगों को प्राप्त करता है और अपने स्वाभाविक गुणों से शत्रुपक्ष में सफलता प्राप्त करता है।
वृष राशि स्थित शक्र ग्रह- इस राशि का अधिपति ही शुक्र है। इसलिये स्थानवृद्धि तो उसका अपना अधिकार ही है। इसके अतिरिक्त शुक्र इस राशि पर होने से सर्वसम्पदा, स्त्री सौख्य व गन्धयुक्त वस्तु (जो दूसरों को भी प्रिय हो) को ग्रहण करने वाला होता है। एवं काव्य कला, ललितकला, नृत्य व गायन कलाओं में सिद्ध हस्त होता है।
मिथुन राशि स्थित शुक्र ग्रह- शुक्र इस राशि पर बैठकर जातक को श्रेष्ठ कार्यो की ओर प्रेरित करता है, तथा विशिष्ट कला में प्रवीण, वाक्चातुर्य, व्यापारिक क्रिया में निपुण, प्रसन्सन, सौन्दर्य प्रधान वस्तु को प्राप्त करने वाला, निन्दित वस्तुओं से दूर रहता है।
कर्क राशि स्थित शुक्र ग्रह- कर्क राशि पर शुक्र के स्थित होने से जातक प्रियवाणी बोलने वाला, विशिष्ट विद्या वाला, श्रेष्ठ कार्यो में रूचि रखने वाला, विद्वान, चंचल प्रकृति व उत्तम वस्तुओं को ग्रहण करने वाला होता है।
सिंह राशि स्थित शुक्र ग्रह- इस राशि पर शुक्र का स्थित होना इतना महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि सिंह राशि उग्र प्रकृति कारक है और शुक्र सौम्य प्रकृति कारक है। अतः ऐसा जातक कब क्रुद्ध हो जावे और आपसी वातावरण में गम्भीरता बन जावे, एकाएक कहा न जा सकता। स्वार्थ के वशीभूत होकर झुकना, इत्यदि इसकी विशेषता है।
कन्या राशि स्थित शुक्र ग्रह- इस राशि पर शुक्र ग्रह का प्रभाव अच्छा फलदायी होता है। ऐसा व्यक्ति धार्मिक विचारक, आर्थिक स्थिति से सुदृढ, श्रेष्ठ आचार विचार वाला, अल्पभाषी होता है।
तुला राशि स्थित शुक्र ग्रह- इस राशि पर शुक्र का आधिपत्य होने से स्थान वृद्धि कारक एवं विशिष्ट कला में निपुण, शास्त्र एवं काव्य कला की अभिरूचि रखने वाला, प्रिय वाणी बोलने वाला, अंलकृत वेशभूषा धारण करने वाला होता है।
वृश्चिक राशि स्थित शुक्र ग्रह- यह राशि मंगल (उग्र) ग्रह की होने से यहा पर भी शुक्र का प्रभाव अल्प रहता है। प्रायः मंगल से सम्बन्धित व प्रभावित ही फल जातक को मिलता है। ऐसा व्यक्ति स्वभाव से क्रूर, कठोर हृदय वाला, किसी की पर्वाह नहीं करने वाला व व्यसनशील होता है।
धनु राशि स्थित शुक्र ग्रह- यह राशि शुभ ग्रह ग्रहण के अधिपत्य होने से यहां शुक्र का प्रभाव सामेश्रित फलदायी होता है। जातक श्रेष्ठ विचारक, स्त्री, पुत्र, धन, व सौख्य को प्राप्त करता है। शिक्षा क्षेत्र में प्रगति करने वाला व विशिष्ट कला विज्ञ होता है।
मकर राशि स्थित शुक्र ग्रह- इस राशि पर शनि ग्रह का आधिपत्य होने से शुक्र का प्रभाव यहां प्रायः शनि से सम्बन्ध व प्रभावों से युक्त जातक को मिलता है, व शुक्र के विपरीत फल जातक को प्रभावित करते है। अर्थात् अप्रिय कार्य की ओर जातक रूचि बढ़ाता है। फलतः स्वास्थ्य के कारण चिन्तित बना रहता है।
कुम्भ राशि स्थित शुक्र ग्रह- इस राशि पर भी शनि ग्रह का प्रभाव होने से शुक्र के प्रभावों की अपेक्षा जातक मिश्रित फल प्राप्त करता है। जातक श्रेष्ठ कार्य की अपेक्षा अप्रिय व निन्दक कार्य की ओर रूचि बढाता है। फलतः आय के साधन होते हुये भी व्यक्ति व्यर्थ कार्यों में आपध्याय करने से कभी-कभी अर्थाभाव के कारण कर्जदार होता है।
मीन राशि स्थित शुक्र ग्रह- इस राशि पर शुभ ग्रह गुरू का आधिपत्य होने से शुक्र का मिश्रित फलजातक को मिलता है अर्थात् ऐसा व्यक्ति शुभ कार्यां की ओर दक्ष होता है तथा प्रतिष्ठावान, सम्पतिवान व स्त्री, पुत्रादि के सुख भोगों को प्राप्त होता है।
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