
आजकल प्रायः सभी दैनिक साप्ताहिक मासिक पत्रों में राशि फल छपता है। लोग अपनी जन्म राशि अथवा नाम-राशि से अपना भविष्य फल जानना चाहते हैं। ज्योतिष के प्रसार की दृष्टि से यह उत्तम है, चूंकि यह स्थूल फल होता है, इसलिये जब कभी राशि-फल सही नहीं उतरता तो सामान्य जन की आस्था डगमगाने लगती है और कभी-कभी पाठक ज्योतिष शास्त्र की अलोचना भी करने लगते हैं।
यह सामान्य ज्ञान की बात है कि संसार की जनसंख्या को 12 भागों में या 27 भागों में विभाजित करें तो उनका समान फल कैसे हो सकता है? जब कि कभी-कभी एक ही लग्न और राशि में उत्पन्न दो जुड़वा बच्चों के जीवन की घटनाओं में भी बहुत अन्तर रहता है। संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपनी किस्मत का अकेला मालिक है, इसलिए कुछ बातें एक राशि वालों की मिल सकती है, सब नहीं।
लग्नांश, ग्रहांश, उनकी नाक्षत्रिक स्थिति, भाव-स्थिति, पारस्पिरिक संबंध, दशा, अन्तर, प्रत्यंतर इनके अन्तर्गत गोचर में ग्रह अपना प्रभाव डालते हैं फलतः एक ही लग्न और राशि के दो व्यक्तियों के गोचर फलों में अन्तर पड़ जाता है। सूक्ष्म एवं निश्चय भविष्य फल गोचर का जानने के लिए द्रक् सिद्ध ग्रहांश, सप्तवर्ग, षडबल, अष्टक वर्ग, गणित से युक्त जन्म पत्रिका आवश्यक है। कुछ का मत है कि गोचर फल प्रमुख होता है, किन्तु ऐसा मानने से दशाओं का महत्व समाप्त हो जाता है। जातकादेशमार्ग कहता है-
ग्रह चारोक्त कालानां बहूनां सगति र्यदा।
तदा तदनुकूलोक्त दशादौ तत्फलं वदेत् ।।
अर्थात् बहुत से ग्रह, गोचर में शुभ जा रहे हों तो भी अनुकूल दशा का ध्यान रखकर फल कहें। यद्यपि थोडा विषयान्तर हो रहा है फिर भी आवश्यक होने से कहना पड़ता है, कि जन्म पत्रिकाओं में षड्बल गणित तो बहुत बडी बात है, सप्तवर्ग, ग्रहों की नाक्षत्रिक स्थिति भी कम देखने में आती है। अष्टकवर्ग तो दुर्लभ हो गया है। यह सही है कि शेध्य पिंड निकालने तक काफी गणित करना पडता है, किन्तु इतना तो हो ही सकता है कि ग्रहों का अष्टकवर्ग और उनका एक प्रस्ताव चक्र समुदायाष्टक वर्ग के लिये बना लिया जाये। क्या ज्योतिषी बन्धुओं पर इनका दोषारोपण हो सकता है? कदापि नहीं। हमेशा से प्रत्येक सनातन के यहाँ जन्म से मृत्योपरांत तक ज्योतिष का उपयोग होता आया है, किन्तु केवल जन्मांग चक्र बनवाना और सांगोपांग जन्मपत्रिका निर्माण में बड़ा अन्तर है, सौ, दो-सौ रूपये में ज्योतिषी क्या गणित करेगा? डाक्टर को रोग का निदान करने में मुहँ मांगी फीस दे दी जायेगी, किन्तु दैवज्ञ जो कि सारे जीवन का विश्लेषण करता है। उसके प्रति सम्माननीय और उदार दृष्टिकोंण नहीं है। ज्योतिषी को जो कुछ दिया जाता है उसकी संज्ञा ‘दक्षिणा’ है। वास्तव में यह शब्द परिश्रमिक या फीस होना चाहिये। दक्षिणा शब्द से दान और दाता की दया की गंध आती है। डाक्टर और वकील दक्षिणा नहीं फीस लेते हैं। ज्योतिषी का कार्य उससे अधिक गरिमामयी और उत्तरदायित्व का है। दैवज्ञ बन्धु और परामर्श लेने वाले दोनों ही इस पर विचार करें। महर्षि पराशर ने कहा है–
सामान्यांशो विशेषांशो ज्यौतिशास्त्रं द्धिधोदितम् ।
प्रोक्तः समान्यभागस्तु निश्चयांशस्तु कथ्यते ।।
वृहत् पराशरी में ज्यौतिष पर विस्तृत व्याख्यान के अंत में महर्षि ने मैत्रेय से कहा कि ज्यौतिष के सामान्य और विशेष दो भाग हैं। सामान्य कह चुका अब निश्चयांश (विशेष) भाग (अष्टक वर्ग) कहता हूँ। अष्टकवर्ग निश्चयांश क्यों है? इसका समर्थन आचार्य मत्रेश्वर की फलदीपिका में मिलता है-
सर्व कर्म फलोपेतमष्टवर्गकमुच्यते ।
अन्यथा बल विज्ञानं दुर्ज्ञेयं गुण दोष जम् ।।
फलादेश करते समय भाव में कितने शुभ बिन्दु हैं? इनको अवश्य दृष्टि में रखना चाहिये, अन्यथा भाव का फल, गुण-दोष जानना कठिन होगा। अष्टकवर्ग के गणित को यहाँ देने की आवश्यकता नहीं है। ज्योतिष के अनेक शास्त्रीय ग्रन्थों में विस्तार से गणित और फलित दिया गया है। कुछ में शुभ चिन्ह रेखा और कुछ में बिन्दु कहा है बस इतना ही अन्तर है। चन्द्राष्टकवर्ग और सूर्याष्टकवर्ग में पराशर और वराहमिहिराचार्य में कुछ अन्तर है जो कि नगण्य है।
भारतीय पद्धति में सभी ने गोचर फल जन्मकालीन चन्द्रमा से लिया है। काटवे ने जन्म लग्न से गोचर के फल को महत्व दिया है, पृथ्वी के निकटतम होने से मनुष्य, जीवजन्तु, बनस्पति, सभी पर चन्द्रमा का निकटतम और व्यापक प्रभाव अनुभव सिद्ध है। अस्तु जन्मराशि से ग्रहों के शुभाशुभ स्थान और वेध देखकर सामान्य फल कहने की पद्धति है। प्रायः यह अनुभव में आता है कि गोचर ग्रह वेध रहित शुभ स्थान पर है, परन्तु शुभफल नहीं दे रहा है, अथवा एक ही राशि वाले दो व्यक्तियों को विभिन्न मात्रा और प्रकाश मे फल मिल रहा है। अशुभ स्थानों के विषय में भी ऐसा ही अनुभव में आता है, ऐसा क्यों है?
केवल, चन्द्रमा से ग्रहों की स्थिति का हम विचार करते हैं, लग्न तथा अन्य ग्रहों से ग्रह की स्थिति ;त्मसंजपअम च्वेपजपवदद्ध भी तो अपना महत्व रखती है। गोचर फल् चन्द्र लग्न अथवा सूर्य से देखें, अष्टकवर्ग इसका समाधान कर देता है। मैने सूर्य का उल्लेख इसलिये किया कि, पाश्चात्य ज्योतिषी सूर्य को विशेष महत्व देते हैं और पराशर ने भी सुदर्शनचक्र में सूर्य लग्न को महत्व दिया है। अष्टकवर्ग लग्न सहित सातों दृश्यग्रहों को महत्व देता है। इसलिये यह पद्धति अपने में पूर्ण है। गोचर के शुभ अशुभ फल की मात्रा तथा प्रकार की जानकारी के लिये निम्नांकित तथ्यों पर ध्यान रखना आवश्यक है-
1. जन्मकालीन चन्द्र राशि के अतिरिक्त वह जिस भाव का स्वामी होकर जिस स्थान पर है और उसका पक्ष बल ।
2. दशा, अन्तर और प्रत्यन्तर।
3. ग्रह के अपने अष्टक वर्ग में जिसमें कि वह भ्रमण कर रहा है, प्राप्त शुभ बिन्दु।
4. सर्वाष्टकवर्ग में गोचरस्थ राशि में प्राप्त शुभ बिन्दु।
5. जन्म समय में ग्रह की स्थिति अर्थात ग्रह लग्न और चन्द्र से किस भाव का भावेश है। नैसर्गिक और लग्न के हिसाब से शुभ है या अशुभ?
उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुये निश्चित फल कहे जा सकते हैं। उदाहरणार्थ शनि की साढेसाती को लीजिये। प्रायः सभी के जीवन में यह आती है। एक ही राशि मे जन्में लोगों को विभिन्न मात्रा और प्रकार से शुभ-अशुभ फल अनुभव में आते हैं। वृष और तुला लग्न वाले को शनि की साढेसाती क्या वैसा ही फल देगी, जैसा कर्क या सिंह लग्न को? वृष और तुला दोनों के लिये शनि योगकारक है, फिर भी वृष के लिये शनि बाधकाधिपति भी है जब कि तुला के लिये नही। फिर जिन तीन राशियों में शनि भ्रमण करेगा वे शनि की मित्र, शत्रु, या सम हैं अथवा स्व, उच्च या नीच हैं? यह देखना होगा। जन्म लग्न में उन राशियों में सूर्य, मंगल या राहू तो नहीं है, और इन सब के ऊपर अष्टक वर्ग का विचार यह सब तथ्य साढेसाती के प्रभाव को सपष्ट करेंगे। यदि सर्वाष्टक वर्ग में चन्द्र अधिष्ठत राशि तथा उससे द्वितीय और द्वादश में 30 से अधिक शुभ बिन्दु हैं तो साढ़ेसाती विशेष कष्टदायक नहीं होगी इन तीन राशियों मे जिसमें 30 से जितनी कम संख्या होगी उस राशि के ढाई वर्ष उतने ही अधिक कष्टदायक व्यतीत होंगे ।
प्रत्येक ग्रह के अष्टकवर्ग में अधिकतम 8 शुभ बिन्दु होते हैं जो कि किसी राशि में प्राप्त हो सकते हैं। 3 बिन्दु प्राप्त होने पर सम उससे अधिक प्राप्त होने पर शुभता बढ़ती और कम होने पर शुभता घटती है। यों समझना चाहिए कि यदि कोई ग्रह गोचर से ऐसी राशि में जा रहा है जहाँ उसके अष्टक वर्ग में 6 शुभ बिन्दु है तो वह लग्न सहित 6 ग्रहों से शुभ है, 2 से नहीं। अर्थात् शुभ फल 75 प्रतिशत होगा। 8 शुभ बिन्दु से 100 प्रतिशत। बिन्दुओ की संख्या न्यून होने पर इसी प्रकार अशुभता की मात्रा का स्पष्ट चित्र सामने आ जाता है ।ज्योतिष के अन्य मान्य सिद्धान्तः जैसे कि ग्रह गोचर में स्व, उच्च, मित्र राशि में उपचय (3-6-10-11) में शुभ फल देता है का क्या होगा? इसके लिये यह नियम हैं-
1. ग्रह स्थित राशि में शुभ बिन्दु अधिक हों।
2. ग्रह उच्च, स्व, मित्र राशि में हों।
3. उपचय में हो तो शुभ फल अधिक होंगे इसी प्रकार-
1. बिन्दु संख्या कम।
2. नीच शत्रु ग्रही।
3. अनुपचय में तो पूर्ण अशुभ फल।
यदि मिली जुली स्थिति है तो तारतम्य करके फल कहना होगा। आचार्यो ने कहा है कि यदि ग्रह अशुभ स्थान नीच और शत्रु गृही भी है किन्तु बिन्दु संख्या अधिक है तो अशुभ फल कम हो जायेंगे। ग्रह उच्च, स्व, मित्र राशि, उपचय में है किन्तु उसके अष्टकवर्ग में शुभ बिन्दु कम हैं तो शुभ फल कम हो जायेंगे।
त्रिकोण शोधन, एकाधिपत्य शोधन के पश्चात् ग्रहों का शोध्य पिंड प्राप्त किया जाता है उससे आयु एवं ग्रहों की नाक्षत्रिक स्थिति से सूक्ष्म फल जानने की पद्धति शास्त्रीय ग्रन्थों में दी हुई है।
सर्वाष्टकवर्ग से बाहर भावों का सपष्ट चित्र सामने आ जाता है जिन भावों में 28 से अधिक शुभ बिन्दु हैं वे बलवान माने जाते हैं, अष्टकवर्ग द्वारा भविष्य कथन की एक सटीक पद्धति है जो वैज्ञानिक आधार पर विस्तृत विवेचन सम्बन्धित ग्रन्थों में देखी जा सकती है।
मुहूर्त के लिये भारतीय ज्योतिष में प्रमाणित विस्तृत स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं किन्तु, पराशर का यह कथन-
अष्टवर्गेण ये शुद्धास्तेशुद्धा सर्व कर्मसु।
अतोऽष्ट वर्ग संशुद्धिरन्वेष्या सर्व कर्मसु।।
तावद् गोचरमन्वेष्यं यावन्न प्राप्यतेष्टकम्।
अष्ट वर्गे तु सप्राप्ते गोचरं विफल भवेत्।।
अर्थात् जो राशि अष्टकवर्ग से शुद्ध (बलवान) है वह सब कार्यो में शुभप्रद है इसलिये सब कामों में अष्टकवर्ग शुद्धि देखनी चाहिये, जो राशि अष्टक वर्ग में शुद्ध न हो उसी की गोचर शृद्धि देखना विचारणीय है।
प्रत्येक ग्रह के अलग-अलग कारकत्व हैं, जो कार्य जिस ग्रह के कारकत्व में हो उसके अष्टकवर्ग में जब ग्रह का भ्रमण 5-6-7-8 बिन्दु प्राप्त राशि में हो रहा हो तब करना चाहिये।
उदाहरणार्थ– सूर्य चार से अधिक शुभ बिन्दु वाली राशि में हो तो लम्बी यात्रा, अथवा राजकीय पुरूष से मिलना फलदायक होगा।
चन्द्र 4 से अधिक बिन्दु की राशि में हो तो विवाह, मित्रता, विद्याध्ययन आरम्भ करना चाहिये।
मंगल के अष्टक वर्ग मे जिस राशि में सर्वाधिक बिन्दु हों जब मंगल उस राशि में हो तो जमीन, मकान खरीदना या मुकद्दमा दायर करना चाहिये।
बुध जब सर्वाधिक बिन्दु पर हो तो शिक्षा आरंभ साहित्यिक कार्य करने चाहियें।
सर्वाधिक संख्या वाली राशि में जब गुरू हो तो आध्यात्मिक सिद्धि के कार्य करने चाहियें, धन प्राप्ति, धर्मिक अनुष्ठान एवं गर्भाधान के लिये समय शुभ है।
कुछ विद्वानों का मत है कि सर्वाधिक बिन्दु वाली राशि अहोरात्रि में जब उदित हो रही हो उस समय गर्भाधान करने से पुत्र प्राप्त होता है। मेरे विचार से इस विषय में बीज स्फुट-क्षेत्र तथा वृहज्जातक में निषेकाध्याय में दिये नियमों को भी ध्यान में रखना चाहिये। शुक्राष्टक वर्ग में अधिकतम संख्या की राशि में शुक्र के होने पर नृत्य, गान, चित्रकला एवं नवीन वस्त्रों का क्रय करना चहिये। शनि जब सर्वाधि बिन्दु पर हो तो फैक्ट्री निर्माण, कृषि कार्य को करें। सम्पूर्ण शुभ कार्यो यात्रा आदि के लिये वह समय चुनिये, जबकि सर्वाष्टक वर्ग से सर्वाधिक बिन्दु वाली राशि उदित हो।
इसका तात्पर्य यह नहीं कि मुहूर्त ग्रन्थों में दिये नियमों की अवहेलना कर दी जाये वरन् अष्टकवर्ग के नियमों से उनका तारतम्य करके मुहूर्त निर्णय किया जाये तो अवश्य सफलता मिलेगी ऐसा मेरा अनुभव और विश्वास है। अष्टकवर्ग पद्धति जो कि शास्त्रीय ग्रथों में दी हुई है, प्रयोग में बहुत कम लाई जा रही है, इसलिये जन्म पत्रिकाओं में ग्रहों के अष्टक वर्ग और उनका एक प्रस्तार चक्र बनाकर समुदायाष्टकवर्ग का एक चक्र दे दिया जाये तो गोचर फल देखने में अधिक निश्चितता आ जायेगी। अष्टकवर्ग का सम्पूर्ण गणित भी उन जन्मपत्रिकाओं में जिनका कि उचित पारिश्रमिक मिलता है दिया जा सकता है।
Tags: ashtakavarg, ashtakvagr, astrologer, astrology, auspicious time, horoscope, muhurat, muhurat time, remedies