सौंदर्य लहरी के प्रयोग

सौंदर्य लहरी के प्रयोग

सर्व कल्याण प्राप्ति प्रयोग- 10

सौंदर्य लहरी आदि शंकराचार्य की रचना है। इसके विषय में कहा जाता है कि- एक बार आदि शंकराचार्य महादेव शिव शंकर के दर्शन करने के लिये कैलाश पर्वत गये थे। दर्शनोपरांत उन्होंने महादेव से सौंदर्य लहरी के लिये याचना की। महादेव ने प्रस्रन्न होकर उन्हें सौंदर्य लहरी ग्रन्थ के रूप में प्रदान की। जब आदि शंकराचार्य यह ग्रन्थ लेकर कैलाश की सीमा से बाहर निकले ही थे की उस अलौकिक ग्रन्थ पर नन्दी की दृष्टि पड़ी। नन्दी ने झपट कर वह अलौकिक ग्रन्थ आदि शंकराचार्य से छीनने का प्रयास किया, परंतु इस अमूल्य ग्रन्थ का अर्द्धांश ही उनके हाथ लगा शेष ग्रन्थ लेकर श्री शंकराचार्य अपने लोक में लौट आये। यहाँ आकर उन्होंने महादेव की कृपा से उस नष्ट अंश का भी पुनरूद्धार कर लिया।
सौंदर्य लहरी एक ऐसी श्रुति है जिसके प्रत्येक श्लोक का सद्बुद्धि द्वारा सफल प्रयोग कर प्रत्येक साधक अपने उद्देश्य को सहज ही प्राप्त कर सकता है। आदि शंकराचार्य द्वारा इस अलौकिक तंत्र ग्रन्थ में 101 श्लोकों की रचना की गई है। जिनमें से प्रत्येक श्लोक एक विशिष्ट प्रयोग है। महादेव की कृपा से आप का भविष्य के आगामी अंकों में इस अलौकिक रचना में से 1 श्लोक (एक प्रयोग) स-क्रम प्रकाशित किया जायेगा।
विनियोग- ऊँ अस्य श्रीत्रिपुर सुन्दरी महा विद्या शताक्षरी बीजमन्त्राणां ‘सुधा- धारा- सारैश्चरण- युगलान्तर्विगलितैः’ इति दशम मंत्रस्य ईशान भैरवो ऋषिः। गायत्र्यनुष्टुप् छन्दसी। श्रीमहा त्रिपुर सुन्दरी देवता। ‘सुं’ बीजं। ह्नीं शक्तिः। ऊँ आं हृं कीलकं। मम सर्व कल्याण प्राप्ति जपे विनियोगः।

ऋष्यादि- न्यास- ईशान भैरवाय ऋषये नमः शिरसि। गायत्र्युष्टुप् छन्दोभ्यां नमः मुखे। श्रीमहा त्रिपुर सुन्दर्यै देवतायै नमः हृदि। ‘सुं’ बीजाय नमः लिंगे। हृ शक्तये नमः नाभौ। ऊँ आं ह्नीं कीलकाय नमः पादपोः। मम सर्व कल्याण-प्राप्ति-जपे विनियोगाय नमः अंजलौ।

कर न्यास- हृं अंगुष्ठाभ्यां नमः। हृं शिरसे स्वाहा। हृं शिखायै वषट्। हृं कवचाय हुं। हृं नेत्र-त्रयाय वौषट्। हृः करतल कर पृष्ठाभ्यां फट्।

अगङ-न्यास- हृं हृदयाय नमः। हृं शिरसे स्वाहा। हृं शिखायै वषट्। हृं कवचाय हुं। हृं नेत्र त्रयाय वौषट्। हृः अस्त्राय फट्।

ध्यान- लौहित्य निर्जित जपा कुसुमानुरागं, पाशांकुशौ धनुरिषूनपि धारयन्तीम्। ताम्रेक्षणामरूण माल्य विशेष भूषां, ताम्बूल पूरित मुखीं त्रिपुरां नमामि।।

पंचोपचार पूजन- लं पृथिव्यात्मकं गन्धं समर्पयामि नमः। हं आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि नमः। यं वाय्वात्मकं धूपं घ्रापयामि नमः। रं व्ह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि नमः। वं जलात्मकं नैवेद्यं समर्पयामि नमः। सं सर्व तŸवात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि नमः।

मंत्र- सुधा धारा सारैश्चरण युगलान्तर्विगलितैः। प्रप´चं सि´चन्ती पुनरपि रसाम्नाय-महसा।।
अवाप्य स्वां भूमिं भुजग निभमध्युष्ट वलयम्। स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुल कुण्डे कुहरिणि!।।

हे विश्व जननि! कुलकुण्ड की अन्तर्गुहा में, जब आप साढ़े तीन वलयात्मिका महा विश्व कुण्डलिनी रूप में शयन करती हो तथा निजानन्द भाव में एकाग्र होकर स्वात्मानन्द के रसाम्नाय स्वाद में मग्न हो जाती हो, तब भी आपके श्रीचरण अपनी सुधा की तीव्र वर्षा से प्रपंच को सींचते हैं। अथवा, विश्राम काल में भी आप विश्व का कल्याण करती हो।

हे माँ! विश्राम-काल में भी विश्व के त्रिनाड़ी चक्र में आपका युक्त संचार उसी प्रकार रहता है, जिस प्रकार जीव देह के निद्रा काल में देह नाड़ियों में रक्त का संचार रहता है।

विशेष- पूर्व प्रकाशित प्रयोग 9 और इस प्रयोग 10 में कुण्डलिनी रहस्य का वर्णन है। 9 वें प्रयोग में कुण्डलिनी की उन्नेय भूमिका का वर्णन है। श्रीमहा कुण्डलिनी शक्ति का जागृत होकर मूलाधार से सहस्त्रार- पर्यन्त चढ़ना ही कुण्डलिनी की उन्नेय भूमिका है।

इस 10 वें प्रयोग में कुण्डलिनी की प्रत्यावृत्ति भूमिका का वर्णन है। सुषुम्ना में व्यापक होकर फिर कुल कुण्ड (मूलाधार चक्र के ऊपर कुण्डलिनी का स्थान) में वापस आकर साढ़े तीन वलयाकार में कुण्डलिनी का सो जाना ‘कुण्डलिनी’ की ‘पृत्यावृत्ति भूमिका’ है।

योगाभ्यास के द्वारा कुण्डलिनी के जागृत होने पर, अथवा सुषुम्णा मार्ग से आज्ञा चक्र का उल्लंघन होने पर उत्थित या जागृत कुण्डलिनी का पुनः संवरण करना अति कठिन होता है। श्री कुण्डलिनी के जागृत होकर सहस्त्रार गामिनी होने से जीव व्यक्ति का बाह्य स्थूल सम्बन्ध छूट जाता है तथा वह एकाग्र होकर शान्त प्रशान्त वृत्तियों में क्रमशः मग्न होने लगता है।

सहस्त्रार गत श्री कुण्डलिनी महा शक्ति का यदि पुनः संवरण हो सके, तो ईश्वरत्व की प्राप्ति होती है। इस प्रकार की साधना में साधक को भू तत्वीकरण, पंचीकरणादि हस्तामलक वत् हो जाते हैं। यह केवल व्यक्ति (स्थूल-देह) गत कुण्डलिनी साधन की शक्ति है। विश्व कुण्डलिनी सिद्ध महा माया परा शक्ति का तो कहना ही क्या! वह अनन्त अद्भुत महाशक्ति शब्दों द्वारा वर्णित नहीं हो सकती।

अनुष्ठान विधि- पहले प्रयोग के आरम्भ में दिये गये पूजन यंत्र की विधि वत् स्थापना करें। फिर उक्त मंत्र में श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी का आवाहन पूजन करें। तब बीजक्षर- ‘सुं’ (स्$उ) का ध्यान करें। (बीजाक्षर सुं (स् $ उ) का ध्यान पूर्व प्रकाशित प्रयोग संख्या 8 के अन्तर्गत दिया जा चुका है।

बीजाक्षर सुं का ध्यान कर मूलाधार चक्र में 1000 बार जप करें। जप करने के बाद रक्त पुष्प, बिल्व, तिल, यवों और घृत से 100 अथवा 10 आहुतियाँ हवन करें।

हवन मंत्र- सुं स्वाहा। हवन’ के बाद 10 बार मार्जन करें।
मार्जन मंत्र- सुं मार्जयामि नमः। मार्जन के बाद 10 बार तर्पण करें।
तर्पण मंत्र- सुं तर्पयामि नमः। ‘तर्पण’ के बाद 10 बार श्लोक का पाठ करें और 1 बार श्लोक पढ़कर आहुति दें।

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