अंगुलियों में है आपके सुखी जीवन का रहस्य

अंगुलियों में है आपके सुखी जीवन का रहस्य

वैज्ञानिकों के अनुसार मानव शरीर विभिन्न नाड़ियों, शिराओं, धमनियाँ एवं कोशिकाओं का जाल है। ये सब मनुष्य के मस्तिष्क से जाकर जुड़ती हैं। मस्तिष्क के आस-पास चौबीस करोड़ रक्त वाहिनियों और सिराओं की एक मोटी पट्टी बनी हुई है। शरीर का प्रत्येक अंग मस्तिष्क के द्वारा ही संचालित होता है। अब मैं इसी संदर्भ में बात करना चाहता हूँ- हाथ की अगुलियों की, जिनमें विभिन्न ग्रहों से संबंधित रत्नों की अंगूठियाँ धारण की जाती है। इनके मूल में वैज्ञानिक आधार ही है। ज्योतिष विज्ञान में प्रत्येक अंगुली का सम्बन्ध ग्रह से जोड़ा गया है। वहीं योग विज्ञान में अंगुलियों का सम्बन्ध पंच तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश से जोड़ा गया है। लेकिन यह सब विज्ञान सम्मत ही है। प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक इन तथ्यों से भली भाँति परिचित थे।

अंगुलियों का सम्बन्ध हमारे मास्तिष्क से किस प्रकार बनता है इसके वैज्ञानिक पहलू को समझते हैं।
1 .तर्जनी (फेयर फिंगर, इनडाक्स फिंगर)ः- इस अंगुली के मूल में कुछ ऐसी छोटी-छोटी नाड़ियाँ हैं जो मस्तिष्क से सीधा सम्बन्ध बनाती हैं। इस अुगुली के मूल में यदि कोई छल्ला या अंगुठी धारण की जाये तो उन संवेदनशील नाड़ियों पर शीघ्र प्रभाव पड़ता है और वे सक्रिया हो जाती हैं। दिमाग सही कार्य करने लगता है स्मरण शक्ति तीव्रता हो जाती हैं। ये नाड़ियाँ जाग्रत होकर व्यक्ति को राज्य उन्नति, लेखनकला में कुशलता, परीक्षा प्रतियोगिता में सफलता तथा विभिन्न प्रकार की उन्नति आदि अच्छे फल प्रदान करती हैं। हस्त रेखा विज्ञान में गुरू ग्रह का पर्वत इसी अंगुली के मूल में रहता है। प्रजनन गुरू के हिस्से आता है। गुरू राज कृपा कारक भी है। महिलाओं के लिये पति एवं पुत्र संतान कारक है गुरू। अतः यहाँ स्वर्ण मुद्रिका में गुरू का रत्न पुखराज धारण किया जाता है।

2. मघ्यमा (मिडल फिंगर)ः- हथेली के मघ्य भाग में या अंगुलियों के मघ्य में होने से इसे मघ्यमा कहा गया है। यह अंगुली शनि ग्रह से सम्बधित है तथा इसके मूल में शनि पर्वत है जहाँ भाग्य रेखा आकर समाप्त होती है। इसके मूल में जो नाड़ियाँ हैं वे लक्ष्मी प्राप्ति, आर्थिक प्रगति, व्यापार वृद्धि, भाग्योदय, शत्रुनाश, शत्रुओं पर विजय आदि दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं इनमें धारण किये जाने वाले अंगुठी, छल्ले एवं रत्न इन संवेदनशील नाड़ियों को शीघ्र सक्रिय कर देते हैं। परिस्थितियाँ अनुकूल बनने लगती हैं भाग्योदय होने लगता है। शनि रत्न नीलम इसी अंगुली में धारण किया जाता है। भाग्य के साथ-साथ मलोत्सर्जन क्रिया भी शनि ग्रह के हिस्से में आती है अतः इन नाड़ियों की सक्रियता व्यक्ति को सुंदर बना देती है।

3. अनामिका (रिंग फिगंर)ः- इस अंगुली के मूल में सूर्य पर्वत होता है। भोजन पचाना सूर्य का कार्य है जिससे शरीर में रस-रक्त एवं वीर्य तथा ओज बनाता है। इस अंगुली मूल में प्रणय नाड़ियाँ होती हैं जो कि प्रेम, स्नेह, वैवाहिक जीवन मधुरता आकर्षण आदि की संवाहक होती हैं। इसलिये विवाह के समय पति शादी की अंगुठी इसी अंगुली में पहनाता है। सूर्य से सम्बधित रत्न माणिक्य एवं मंगल ग्रह जो कि सूर्य का मित्र ग्रह है उससे सम्बधित रत्न मूँगा आदि इसी अंगुली में धारण किये जाते हैं। इस अंगुली का सम्बन्ध प्रसिद्धि यश, मान-सम्मान आदि से भी है। इसमें पहनी गई अंगूठी या छल्ले इन्हीं संवेदनशील नाड़ियों को जाग्रत कर व्यक्ति को सफलता की ओर ले जाते हैं।

4. कनिष्ठिका (लिटिल फिंगर)ः- यह अंगुली बुध की अंगुली है। इसके मूल में बुध पर्वत होता है। बुध वाणी का कारक ग्रह है। यह सबसे छोटी अंगुली भोग, विलास, ऐश्वर्य, आकर्षण, पुखराज सम्मोहन आदि से सम्बन्ध रखती है। इसके मूल में छोटी-छोटी नाड़ियाँ होती हैं जो शरीर स्थित इन सभी भावनाओं को केन्द्रित करती हैं। विवाह रेखा एवं प्रणय रेखायें भी इसी अंगुली के मूल स्थान के नीचे ही होती हैं। यह अंगुली सम्मोहन एवं सौदर्य का अद्वितीय संगम है। बुध ग्रह का रत्न पन्ना इसी अंगुली में धारण करते हैं।

बुध के नियंत्रण में शरीर का नाड़ी संस्थान एवं स्नायु आते हैं। काम वासना शुक्र ग्रह के हिस्से में आती है। बुध, शुक्र आपस में मित्र ग्रह हैं। कनिष्ठका के ठीक सामने शुक्र पर्वत अर्थात शुक्र क्षेत्र होता है अतः शुक्र ग्रह को बल देने के लिये भी हीरा आदि इसी अंगुली में धारण करते हैं।
जीवन में यदि हम प्रगति चाहते हैं तो इन अंगुलियों के मूल के महत्व को समझना चाहिये। दोनों हाथों में समान रूप से प्रभाव होता है। चाहे हम बाँये हाथ में पहनें या दाहिने हाथ में। श्रेष्ठ धातुओं की अंगूठी में हम यदि यंत्र अंकित कर धारण करें तो शीघ्र परिणाम प्राप्त होता होता है। ये यंत्र हो सकते हैं बीसा, चौबीसा, चौंतीसा, छत्तीसा आदि।

प्राचीन काल से शरीर के विभिन्न अंगो में पुरूष एवं महिलायें जो आभूषण धारण करते आये हैं उनके मूल में भी यही सिद्धान्त कार्य करता है। यह सब क्रिया मनुष्य को पूर्णतः स्वस्थ एवं सुखी रखती थी। प्रत्येक क्षेत्र से संबंधित संवेदनशील नाड़ियों को जाग्रत कर मनुष्य के मन मस्तिष्क को तद्नुरूप बनाती थी। पैरों की सभी अंगुलियों में, हाथों की अंगुलियों में, पैरों में, कम कलाईयों में भुजाओं में, नाक में, कान में एवं गले में विभिन्न के आभूषण धारण किये जाते थे जो सौंदर्य के साथ-साथ मन मस्तिष्क एवं शरीर को भी स्वस्थ बनाते थे। आधुनिक फैशन की दौड़ में महिलाओं के शरीर से आभूषण गायब होने के कारण ही उन्हें विभिन्न बीमारियों ने जकड़ा है। कारण विभिन्न संवेदनशील नाड़ियों का जाग्रत न होना ही है।

हर धातु किसी न किसी ग्रह से सम्बधित है। धातु धारण करने सें ग्रहों का प्रभाव अनुकूल होता है। राजा महाराजों के मुकुटों में एवं आभूषणों में विभिन्न रत्नों एवं धातुओं का उपयोग होना ग्रहों के प्रभाव का अनुकूल होना तथा इस कारण उनका पराक्रमी, अजेय एवं प्रसिद्ध होना ही था। अब लोगों का रूझान फिर से रष्त्न, आभूंषण, छल्ले, कड़े एवं अंगूठियाँ आदि धारण करने की ओर हुआ है और इसके सकारात्मक परिणाम भी आ रहे हैं।

जप में माला आदि निश्चित अंगुलियों से चलाना, देवी देवताओं के सामने पूजा के समय विभिन्न मुद्रायें प्रदर्शित करना जो अंगुलियों से ही बनती हैं। यज्ञ हवन आदि में भी हवन की आहुति की मुद्रायें भी अंगुलियों से ही बनती हैं। योग में भी विभिन्न मुद्रायें इन अंगुलियों से ही बनती हैं। वेद पाठ में जो संकेत प्रकट कियें जाते हैं। वे सब अंगुलियों से ही बनते हैं। स्पर्श चिकित्सा में तथा सम्मोहन में अंगुलियाँ ही कार्य करती हैं।
इन अंगुलियों से मस्तिष्क की ओर जाने वाली संवाहिकाओं को योग विज्ञान में भी विभिन्न मुद्राओं के द्वारा जाग्रत कर लाभ लेने की प्रक्रिया है।

योग शास्त्र कहता है-
नास्ति मुद्रा समंकिंचित् सिद्धिदं क्षितिमंडले
इस धरती पर मुद्रा के समान सफलतादायक कुछ भी नहीं है। योग की भाषा में ये पाँच अंगुलियाँ पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन अंगुलियों से बनने वाली मुद्रायें मनुष्य के शरीर में पंच तत्वों को व्यवस्थित कर सुखी एवं स्वस्थ जीवन प्रदान करती हैं। हमारे हाथ में अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व अंगूठा, वायु का तर्जनी, आकाश का मध्यम, पृथ्वी का अनामिका तथा जल का कनिष्ठिका करती है। अग्नि एवं वायु मिलकर जलाने का कार्य करते हैं अतः धनुष-बाण तथा आग्नेयास्त्र आदि चलाने में अंगूठा एवं तर्जनी का ही प्रयोग होता है।

विभिन्न अंगुलियों को मिला कर व्यवास्थित करने से प्रायः निम्न मुद्रायें मुख्यतः हमारे लाभ की हैं। 1. ज्ञान मुद्रा या ध्यान मुद्रा। 2. वायु मुद्रा। 3. शुन्य मुद्रा। 4. पृथ्वी मुद्रा। 5. प्राण मुद्रा। 6. अपान मुद्रा। 7. सूर्य मुद्रा। 8. वरूण मुद्रा। 9. लिंग मुद्रा आदि विभिन्न मुद्रायें बनती हैं। कहने का तात्वर्य यह है कि ये सब हमारी प्राण शक्ति को ही बढाती हैं और हमें लाभ पहुँचाती हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मनुष्य के शरीर में यद्यपि सभी अंग आवश्यक एवं अति महत्वपूर्ण हैं तथा वे विधाता द्वारा निर्धारित सभी क्रियाएं पूर्ण करते हैं लेकिन उनमें अंगुलियाँ भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। बिना हाथों एवं अंगुलियों के कुछ भी नहीं किया जा सकता है। हमारे मन एवं मस्तिष्क का नियंत्रण अंगुलियों में निहित है चाहे विज्ञान की, धर्म शास्त्र की, हस्त रेखा विज्ञान की, योग शास्त्र की, ज्योतिष विज्ञान की तथा तंत्रशास्त्र आदि किसी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण हैं। हमें अंगुलियों की शक्ति को पहचान कर उससे लाभ अवश्य ही लेना चाहिये।

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