
सर्व कामना सिद्धि प्रयोग
सौंदर्य लहरी आदि शंकराचार्य की रचना है। इसके विषय में कहा जाता है कि- एक बार आदि शंकराचार्य महादेव शिव शंकर के दर्शन करने के लिये कैलाश पर्वत गये थे। दर्शनोपरांत उन्होंने महादेव से सौंदर्य लहरी के लिये याचना की। महादेव ने प्रस्रन्न होकर उन्हें सौंदर्य लहरी ग्रन्थ के रूप में प्रदान की। जब आदि शंकराचार्य यह ग्रन्थ लेकर कैलाश की सीमा से बाहर निकले ही थे की उस अलौकिक ग्रन्थ पर नन्दी की दृष्टि पड़ी। नन्दी ने झपट कर वह अलौकिक ग्रन्थ आदि शंकराचार्य से छीनने का प्रयास किया, परंतु इस अमूल्य ग्रन्थ का अर्द्धांश ही उनके हाथ लगा शेष ग्रन्थ लेकर श्री शंकराचार्य अपने लोक में लौट आये। यहाँ आकर उन्होंने महादेव की कृपा से उस नष्ट अंश का भी पुनरूद्धार कर लिया।
सौंदर्य लहरी एक ऐसी श्रुति है जिसके प्रत्येक श्लोक का सद्बुद्धि द्वारा सफल प्रयोग कर प्रत्येक साधक अपने उद्देश्य को सहज ही प्राप्त कर सकता है। आदि शंकराचार्य द्वारा इस अलौकिक तंत्र ग्रन्थ में 101 श्लोकों की रचना की गई है। जिनमें से प्रत्येक श्लोक एक विशिष्ट प्रयोग है। महादेव की कृपा से आप का भविष्य के आगामी अंकों में इस अलौकिक रचना में से 1 श्लोक (एक प्रयोग) स-क्रम प्रकाशित किया जायेगा।
विनियोग- ऊँ अस्त श्री त्रिपुर सुन्दरी महा विद्या शताक्षरी बीज मंत्राणां ‘सुधा सिन्धोर्मध्ये सुर विटपि वाटी परिवृते’ इति अष्टम मंत्रस्य ईशान भैरवो ऋषिः। गायत्र्य नुष्टुप् छन्दसी। श्रीमहात्रिपुर सुन्दरी देवता। ‘सुं’ बीजं। ह्नी शक्तिः। आं ह्नीं कीलकं। मम सर्व कामना सिद्धि जपे विनियोगः।
ऋष्यादि न्याय- ईशान भैरवाय ऋषये नमः शिरसि। गायत्र्यनुष्टुप् छन्दोभ्यां नमः मुखे। श्रीमहा त्रिपुर सुन्दर्यै देवतायै नमः हृदि। ‘सुं’ बीजाय नमः लिगें। ह्नीं शक्तये नमः नाभौ। ऊँ आं ह्नीं कीलकाय नमः पादयोः। मम सर्व कामना सिद्धि जपे विनियोगाय नमः अ´जलौ।
करन्याय- ह्नां अंगुष्ठाभ्यां नमः। ह्नीं तर्जनीभ्यां स्वाहा। ह्नूं मध्यमाभ्यां वषट्। ह्नैं अनामिकाभ्यां हुं। ह्नौं कनिष्ठाभ्यां वौषट्। ह्नः करतल कर पृष्ठाभ्यां फट्।
अंगन्याय- ह्नां हृदयाय नमः। ह्नीं शिरसे स्वाहा। ह्नूं शिखायै वषट्। ह्नैं कवचाय हुँ। ह्नौं नेत्र-त्रयाय वौषट्। ह्नः अस्त्राय फट्।
ध्यान- लौहित्य निर्जित जपा कुसुमानुरागं, पाशांकुशौ धनुरिपूनपि धारयन्तीम्। ताम्रेक्षणामरूण माल्य विशेष मूषां, ताम्बूल पूरित मुखीं त्रिपुरां नमामि।।
पंचोपचार पूजन-
लं पृथिव्यात्मकं गन्ध समर्पयामि नमः।
हं आकाशात्मकं पुष्पं समर्पयामि नमः।
यं वाय्वात्मकं धूपं घ्रापयामि नमः।
रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि नमः।
वं जलात्मकं नैवेद्यं समर्पयामि नमः।
सर्व तत्तवात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि नमः।
मंत्र- सुधा सिन्धोर्मध्ये सुर विटपि वाटी परि वृते। मणि-द्वीपे नीपोपवन-वति चिन्तामणि-गृहे।।
शिवाकारे म´चे परम शिव पर्य्यकं निलयाम्।भजन्ति त्वां धन्याः कति चन चिदानन्द लहरीम्।।8
मणि द्वीप के चारों ओर अमृत का समुद्र है। यह समुद्र वायु सघंटन योग से बहु दिव्य तरगं-वाला है। रत्न मयी दिव्य प्रकाश युक्त रेती उस समुद्र के किनारे फैली हुई है। मणि द्वीप में चार द्वार हैं। वह स्थान अनेक सिद्ध पुरूषों के निवास स्थानों से आवृत है। सहस्त्रों दर्शनातुरो के विमानों की वहाँ भीड़ लगी रहती है। वहाँ के वृक्ष दिव्य मणियों के दिव्य वृक्ष से दिखते हैं। वहाँ बहुत सुन्दर वाटिका है। स्वयं बसन्त इस वाटिका का माली है। वहाँ सभी वृक्ष, निरन्तर नव पल्लव फूल फल से युक्त रहते हैं। वाटिका आनन्द मय दिव्य सुगन्ध से भरी हुई है।
पù मणि (अन्ना) के समान हरित भूमि में अनेक सुन्दर रस मय अमृत वारि के झरने प्रस्फुरित होकर मधुर कलरव करते हुए धीरे धीरे बहते हैं। ऐसे बहुत से झरने श्रीमणिद्वीप की प्राकृतिक शोभा को बढ़ाते हुए द्रष्टाओं में महा शक्ति उत्पन्न करते हैं। इन झरनों के जल पान से ब्रह्मानन्द पीयूष गुण सहित जागता है। शुक-मैना आदि पक्षी तत्व विज्ञान चर्चा मय मधुर स्वर में मीठी वाणी बोलते हैं। यह उत्तम वन सुगन्ध मय नीरोग कर पवन से भरपूर हितानन्द कर है। विश्वसार इस मणि द्वीप के मध्य में कल्प वृक्ष का आराम है। कल्प वृक्ष की डालियाँ सुवर्ण मय कान्तिवाली हैं। यह महा दिव्य द्वीप दशावरण वाले श्रीचक्र के आकार का है। यथा-
1. अमृत-सागर = भू-पुर - आधार-चक्रे ध्यानं।
2. लोह-दुर्ग = वृत्त-त्रय - स्वाधिष्ठाने ध्यानं।
3. कांस्य-दुर्ग = षोडश-दल-पù - मणिपूरे ध्यानं।
4. ताम्र-दुर्ग = अष्ट-दल - अनाहच्चक्रे ध्यानं।
5. सीसक (प्लेटिनम) दुर्ग = चतुर्दशार - विशुद्ध-चक्रे ध्यानं।
6. रौप्य-दुर्ग = बहिर्दशार - आज्ञा-चक्रस्य अधो-भागे ध्यानं।
7. स्वर्ण-दुर्ग = अन्तर्दशार - आज्ञा-चक्रस्य अधो भागे ध्यानं।
8. सुर-विटप-वाटी (कल्प-वृक्ष-वन) = अष्टार - आज्ञा - चक्रस्य ऊर्ध्व-भागे ध्यानं।
9. चिन्तामणि-गृहे = त्रिकोण (मूल-योनि)- सहस्त्रारस्य बहिर्भागे ध्यानं।
10. श्रीमहामाया महा शक्ति स्थान = बिन्दु - सहस्त्रारस्य अन्तर्भागे ध्यान।
श्रीकल्प वृक्ष वन की सुवर्ण मय डालियों में रगं-बिरंगे रत्न समान दिव्य पत्र पुष्प-फलादि लगे हैं। कल्प वृक्ष की इस महा-सुगन्धित रम्य वाटिका के मध्य में चिन्तामणि की ईटों से प्रस्तुत महा दिव्य महल कोटि वालादित्य वत् प्रकाशमान है। उसके मध्य में शिवाकार मंचस्थ परम शिव पर्यकांसन पर विश्व सुन्दरी परा शक्ति विराजमान हैं।
हे विश्व धात्री माँ। हे चिदानन्दा महा विद्या, हे दिव्यास्तित्व की चिदान्न मयी दिव्य लहर! है चित् स्पन्द कारिणी महा गति शक्ति! क्वचिल्लब्ध वे महा पुरूष धन्य हैं, जो सहस्त्रार के ज्योतिर्मय सुधा सिन्धु में, पूर्ण कामत्व रूप कल्पवृक्ष वाटी से घिरे हुए मणि द्वीप में, प्रशान्त एकाग्रता की मस्ती के कदम्ब पवन में, कामना रहित चिन्तामणि गृह में, शिवाकार मचं पर परम शिव पर्यकांसनस्था आप श्री का ध्यान तथा स्मरण करते हैं।
‘‘परम शिव पर्य्यकं निलयां’’ शिव शक्ति की एकात्मता का भाव है- ‘शिवों बिन्दुः’ शक्तिर्नादः।’ इस श्लोक में ‘क्लीं’ बीज का आविर्भाव कहा गया है। इसका भाव अत्यन्त सुन्दर है।
अनुष्ठान-विधि- पहले पूजन यंत्र (देखें लेख के आरम्भ में) की विधि वत् स्थापना करें। फिर उक्त यंत्र में श्रीमहा त्रिपुर सुन्दरी का आवाहन पूजन करे। तब ‘बीजाक्षर’ - ‘सु’त्र‘सू$ उ’ का ध्यान करें। यथा-
स्- करीष भूषितागीं च, साट्टहासां दिगम्बरम्। अस्थि माल्यामष्ट भुजां, वरदामम्बुजेक्षणाम्।।
नागेन्द्र हार भूषाढ्यां, जटा मुकुट मण्डिताम्। सर्व सिद्धि प्रदां नित्यां, धर्म कामार्थ मोक्षदाम्।
एवं ध्यात्वां स-कारं तु, तम्न्त्रं दशधा जपेत् सकारं श्रृणु चार्वगिं! शक्ति बीजं परात्परम्। कोटि विद्युल्लताकारं, कुण्डली मय संयुतम्।। पचं देव मयं देवि! पचं प्राणात्मकं सदा।
रज सत्व तमा युक्तं, त्रिविन्दु सहितं सदा।।
उ- पीत कर्णां त्रिनयनां च, पीताम्बर धरां पराम्। द्वि-भुजां जटिलां भीमां, सव सिद्धि-प्रदायिनीम्।
एवं ध्यात्वा सुर श्रेष्ठां, तन्मन्त्रं दशधा जपेत्।।
उकारं परमेशानि! अधः कुण्डलिनी स्वयम्। पीत चम्पक सकांशं, प´च देव मयं सदा।
प´च प्राण मयं देवि! चतुर्वर्ग प्रदायकम्।।
हवन के बाद 10 बार मार्जन करें। मार्जन मंत्र - ‘सुं मार्जयामि नमः।’ मार्जन के बाद 10 बार तर्पण करें। तर्पण-मन्त्र- ‘सुं तर्पयामि नमः।’ तर्पण के बाद 10 बार श्लोक का पाठ करें और 1 बार श्लोक पढ़कर आहुति दें।
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