
भारतीय मान्यताओं के अनुसार उत्तर, पूर्व, पश्चिम व दक्षिण दिशाओं को माना जाता है। वास्तुकोण और कुछ नहीं वरन इन्हीं दो दिशाओं के मिलन स्थान को कहा जाता है। उदाहरणार्थ उत्तर तथा पूर्व दिशाओं के मिलन स्थान को ईशान्य कोण कहा जाता है। वास्तु के अनुसार विभिन्न दिशाओं में विभिन्न निमार्ण होते हैं, साथ ही अगर इन वास्तुकोणों पर निर्माण का ध्यान रखा जाए तो वास्तु शुभत्व की परम अनुकूल स्थिति को पाया जा सकता है। वास्तुकोणों के संर्दभ मे कुछ विशेष तथ्य अग्रलिखित हैं।
(1) ईशान कोण :-
इस वास्तुकोण का निर्माण उत्तर तथा पूर्व दिशाओं के मिलन के परिणामस्वरूप होता है, अर्थात घर के जिस क्षेत्र में उत्तर व पूर्व दिशाओं का मिलान होता है, उसे ही ईशान्य कोण कहा जाता हैं।
वास्तु के वे नियम जिनके पालन के पश्चात् इस कोण के दोषों को खत्म कर उत्तम परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं, वे निम्नानुसार हैं।
(अ) ईशान्य कोण “देवस्थान” होता है, इसलिए इस स्थान पर घर का मंदिर होना स्वास्थ्य की दृष्टि से परम शुभदायक होता है, मंदिर का निर्माण इस तरह हो कि पूजा करते समय पूजनकर्ता का मुख-उत्तर अथवा पूर्व दिशाओं में हो।
(ब) इस कोण में सिर्फ अध्यनरत् बच्चों (कुवारे बच्चों) के लिए शयन कक्ष व अध्ययन कक्ष होना चाहिए, शादीशुदा जोड़े हेतु यह कक्ष त्याज्य होता है।
(स) ईशान्य कोण में भवन का सबसे अधिक खुला स्थान अर्थात खिड़कियाँ होनी चाहिए जिससे घर में सूर्य व वायु की उपस्थिति नियमित व सुचारू रूप से हो, क्योंकि घर के सदस्यों के धनात्मक स्वास्थ्य हेतु घर में सूर्य की किरणों तथा वायु का संतुलन अत्यन्त आवश्यक होता है।
(द) उत्तर-पूर्व दिशाओं में शौचालय होना गिरते स्वास्थ्य का सबसे प्रमुख कारण होता है, इस हेतु यह शौचालय का निमार्ण करना सर्वथा वर्जित है।
(इ) किसी भी भवन के ईशान्य क्षेत्र में कटाव होना अत्यन्त अशुभ होता है। इस तरह के घर में रहने वालों को स्वास्थ्य अवनत होकर ही रहता ह,ै इसमें कोई संशय नहीं।
(ई) ईशान्य क्षेत्र का उच्च होना (अन्य दिशाओं से ) भवन-मालिक की स्वास्थ्य संबंधी व आर्थिक समस्याओं की मूल वजह बन सकता है। इसलिये इस क्षेत्र की उचाई अन्य दिशाओं से हमेशा कम रखना ही वास्तुपूरक होकर शुभ होता है।
(उ) ईशान्य क्षेत्र में अण्डर ग्राउण्ड वाटर टैंक, मंदिर, बोरिंग, व तुलसी, आंवले तथा निर्गुण्डी के पौधे को रोपने से घर का ईशान्य दोष खत्म होकर घर धनात्मक उर्जा से परिपूर्ण हो जाता है, तथा सभी सदस्य मानसिक व शारीरिक रूप से अत्यधिक बलवान होते हैं।
(2) अग्निकोण :-
यह क्षेत्र दक्षिण व पूर्व दिशाओं के मिलन का स्थान होता है, वास्तुनुसार इसमें अग्नि देवता का वास होता है।
(अ) इस कोण में रसोई घर का होना वास्तुपूरक होकर अत्यन्त शुभ होता है, रसोई घर में भी गैस, चूल्हा इत्यादि की जगह ठीक-ठीक आग्नेय कोण में करने से इस क्षेत्र का वास्तु प्रबल हो जाता है व घर से सदस्य कई प्रकार की शारीरिक परेशानियों से दूर रहते हैं।
(ब) इस क्षेत्र में नल, बेसिन, पानी के मटकों की जगह आग्नेय कोण में रखने से घर के सदस्यों की शारीरिक अवनति होती है, मुख्यतः पेट की समस्याएॅ प्रमुखता से होती हैं।
(स) खाना बनाते समय गृहिणी का मुख पूर्व दिशा में होना उसके स्वास्थ्य हेतु उत्तम माना गया है।
(द) आग्नेय कोण की अशुभता को दूर करने हेतु इस क्षेत्र में सतत् एक लाल बल्व को स्विच आन कर रखना श्रेयस्कर होता है।
(ई) किचन में उपयोग आने वाला पत्थर अथवा फर्सी काले रंग का होना शुभ होता है।
(3) वायव्य कोण :-
इस क्षेत्र के अंतर्गत घर की उत्तर व पश्चिम दिशाओं को मिलन स्थान आता है। वायव्य कोण में स्थित मुख्य द्वार पश्चिम मुखी निवास स्थान के लिए शुभ होता है। यह क्षेत्र मुख्यतः घर के वाहनों की पार्किंग, पालतू जानवरों का आश्रय स्थल, चौकीदार व नौकरी को निवास स्थान बनाने हेतु लाभदायक होता है। ऐसी कन्याएं जिनके विवाह में विलम्ब हो रहा है, उन्हें वायव्य स्थित कक्ष में निवास व शयन करने से विवाह संबंधी बाधाए दूर होती है, इस क्षेत्र का खुला होना अत्यन्त शुभ होता है। वायव्य दोष में वास्तु दोष होने पर मुख्य दरवाजे पर अन्दर देखते हुए गणेश की प्रतिमा स्िापित करना हितकर होता है।
(4) नैऋत्य कोण :-
(अ) घर में दक्षिण व पश्चिम-दिशाओं के मिलन स्थान को नैऋत्य कोण कहा जाता है।
(ब) नैऋत्य कोण में गृह स्वामी का शयन कक्ष होना श्रेष्ठ होता है।
(स) इस क्षेत्र की दीवारों की उंचाई व मोटाई घर की अन्य दिशाओं की दीवारों की मोटाई व उंचाई से अधिक होना वास्तु शुभता का धनात्मक संकेत माना जाता है।
(द) घर में मौजूद अटालें व वजनी सामानों का संग्रहण इस क्षेत्र में करना वास्तुपूरक होता है व घर में शांति रहती है।
(इ) ओव्हर हैड़ पानी की टंकी का निर्माण इस कोण में करना लाभकारी होता है।
(उ) गृह निर्माण के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिये कि निर्माण कार्य नैऋत्य में नहीं बढ़ावें, इसके विपरीत ईशान्य में निर्माण बढाना फायदेमंद साबित होता है।
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