विवाह संस्कार में गोधूलि मुहूर्त

विवाह संस्कार में गोधूलि मुहूर्त

समस्त शुभाशुभ कार्यो के सम्यक् प्रतिपादन हेतु ज्योतिष शास्त्र में शुद्ध मुहुर्त की महत्ता को स्वीकार किया गया है। शुद्ध मुहूर्त होने से वर्ष, मास, दिन अथवा लग्न आदि के समस्त दोषों का परिहार हो जाता है। तथा कार्य सफल होते हैं :-

लग्नं दिनभवं हन्ति मुहूर्तः सर्वदूषणम्।
तस्मात् शुद्धि मुहूर्तस्य सर्व कार्येषु शस्यतें।।

कभी-कभी आवश्यक कार्यवश सर्वशुद्ध मुहूर्त इच्छित समय पर नही बनता। ऐसी दशा में सर्वकार्य सिद्धिप्रदं विजयलग्न अथवा गोधूलि वेला मुहूर्त का सहारा लेना ही प्रशस्त तथा उपयोगी सिद्ध होता है। इस विजयलग्न अथवा अभिजित् मुहूर्त का उल्लेख नारद-पुराण में मिलता है। यह दिन का आठवाँं मुहूर्त होता है। ज्योतिष शास्त्रानुसार सूर्योदय से चतुर्थ लग्न को विजयलग्न अथवा अभिजित् मुहूर्त माना गया है। यह मुहूर्त सर्वकार्य सिद्धिप्रद होता है। मुहूर्त में अन्य कितने ही दोष क्यों न हों, इस विजय लग्न से उन समस्त दोषों का परिहार हो जाता है। शास्त्रकारों का मत है कि-

अभिजित्सर्वदोशेषु मुख्य दोष विनाशकुत।
मध्यें दिनें गतौ भानौ, मुहूर्तोऽभिजिदाह्नयः।
नाशयेत्यखिलान्दोषान् पिनाकी त्रिपुर यथा।


लगभग ज्यौतिषशास्त्र के सभी ग्रन्थों में अभिजित् मुहूर्त को समस्त दोषनाशक माना गया है :-

दिन मध्यगते सूर्ये मुहूर्तेह्यभिजित्प्रभुः।
चक्रमादाय गोविन्दः सर्वदोषान्निकृन्तति।।


इस प्रकार इस मुहूर्त का समय मध्याह्न काल एक घड़ी अर्थात् स्थानीय 11 बज कर 48 मिनट से 12 बजकर 12 मिनट दोपहर तक यह सर्व सिद्धिप्रद विजय लग्न ही अभिजित् मुहूर्त कहलाता है। आवश्यकता के अनुसार सर्वसाधारण को इस विजय मुहूर्त से लाभ उठाना चाहिये।

गोधुलि-वेला-मुहूर्त-

इसी प्रकार गोधूलिबेला की महत्ता को सर्वकार्य्येषु शस्ता कह कर दैवज्ञों ने स्वीकार किया है। सांयकाल जब ग्वाले गौओं को चराकर लौटते हैं तब उस समय गाय के चलने से उठने वाली धूल के कारण उस समय के मुहूर्त को गोधूलि कहा जाता है। यह गोधूलि बेला सर्वकार्य साधक होने से इस काल में न लग्न शुद्धि की आवश्यकता होती है और न ही मुहूर्त शुद्धि की। गोधूलि वेला में नक्षत्र, तिथि, वार, तथा योगादि ससस्त दोषों की निवृति हो जाती है। सूर्यास्त के समय जब सूर्य के बिम्ब का आधा भाग क्षितिज में छिप जाता है, तो सूर्यास्त के पूर्व के 12 मिनट तथ सूर्यास्त के बाद के 12 मिनट को गोधूलि-वेला’ कहा गया है :-

निदाघें त्वर्धबिम्बेंऽर्के पिण्डी भूतें हिमागमें।
मेघाकालें तु पूर्णस्तें प्रौक्तं गोधूलिकं शुभम्।।

इस वेला के सर्व मंगल कार्येषु गोधूलिश्च प्रशस्यते कह कर सूर्योदय लग्न से सातवां लग्न गोधूलि-लग्न माना गया है। और विवाह आदि में भी शुभ माना गया हैः-

स कालों मंगलें श्री मान् विवाहादो शुभप्रदः।

अतएव यह गोधूलि वेला मुहूर्त बहुत उपयोगी सिद्ध होता है, किन्तु कुछ परिस्थतियों में गोधूलि लग्न को दैवज्ञो ने दोषयुक्त भी माना है।

वर्जित काल- ज्योतिष के सिद्धान्तुसार निम्नलिखित परिस्थितियों में गोधुलि वेला मुहूर्त को त्याज्य समझना चाहिये-   
1. शनिवार को गोधूलि वेला सूर्यास्त के पूर्व समय की शुभ फलप्रद नही मानी गई है। सूर्यास्त के बाद का समय ही उपर्युक्त माना गया है।
2. इसके विपरीत गुरूवार को सूर्यास्त के पूर्व का समय शुभ माना जाकर सूर्यास्त के बाद का समय त्याज्य समझा गया है।
3. गोधूलि लग्न के समय यदि पंचम या नवम् भाव में शनि हो, तो उस मुहूर्त को त्याज्य मानना ही उचित है।
4. गोधूलि लग्न में मृत्युभवन में मंगल, शुक्र, गुरू या बुध हों तथा लग्न में तथा रिपु अथवा मृत्यु भवन में चन्द्रमा स्थित हो, तो गोधूलि लग्न दूषित हो जाने के कारण त्याज्य है।

अष्टमें जीव भोमी च बुधश्च भार्गेवोष्टमें।
लग्ने षष्टाष्टगतश्चन्द्रों, गोधूली नाशकस्तथा।


5. कुलिक क्रान्ति, साम्य या लग्न, रिपु अथवा मृत्युभाव में चन्द्र हो, तो भी गोधूलि काल दोषयुक्त होता है।

कुलिकं क्रान्ति साम्यं च लग्नें षष्टमें शशि।
तद्वा गोधूलिकस्त्याज्य पंच दोषेश्च दूषितः।।


6. लग्न में चन्द्रमा होने से अथवा चन्द्र, बुध, गुरू, शुक्र अथवा मंगल में किसी भी ग्रह के रिपु अथवा मृत्यु भवन में स्थित होने से भी गोधूलि लग्न अशुभ फल देता है।

षष्ठाष्टमें चन्द्रश्र चन्द्र जीवे, क्षोणी सुतें वाभृगुनन्दने वा।
मूर्तो च चन्द्रे नियमेन मृत्युर्गोधूलिकं स्थादित वर्जनीयम्।।

7. गोधूलि-लग्न से 1, 6 व 8वें चन्द्रमा के स्थित होने से कन्या के लिये तथा 1, 7 व 8वें भाव में मंगल होने से वर के लिये अशुभ होता है :-

षष्टेष्ट में मूर्तिगते शशांके गोधूलि के मृत्युमुपेति कन्या।
कुजेष्टमें मूर्तिगतेऽथवास्तें वरस्य नाशं प्रवदन्ति गर्गाः।

केवल इन वर्जित कालों को छोड़ कर अन्य परिस्थितियों में गोधूलि-वेला मुहूर्त निम्न श्लोकानुसार शुभफल प्रदान करता है :-

यदा नास्तंगतों भानुर्गोधूल्यां पूरितं नमः।
सर्व-मंगल कार्येषु गोधूलिश्च प्रशस्यतें।।

इस प्रकार मुहूर्त चिन्तामणि के अनुसार गोधूलि-वेला की महत्ता सर्वोपरि तथा सर्वोपयोगी सिद्ध होती है।

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