चोली-दामन का सम्बंध है, ज्योतिष और आयुर्वेद में

चोली-दामन का सम्बंध है, ज्योतिष और आयुर्वेद में


यह सर्वविदित है कि वेद के षडंगों में ज्योतिष वेद के निर्मल चक्षु हैं। मानव के सर्वागों में चक्षु बहुमूल्य एवं मुख्य हैं, क्योंकि बिना चक्षुओं के मनुष्य अकिंचन है। इसीलिये लिखा है संयुक्तों पीतरै कर्ण नासादि- -भिश्चक्षुषांगेन हीनो न किंचित करः। ज्यौतिष प्रत्यक्ष शास्त्र है प्रत्यकक्षं ज्यौतिषं शास्त्रम् इसकी तपःसिद्ध पवित्रात्मा वाले ऋषिमुनियों ने वर्णित की है और अपनी साधना के बल से इसकी शाखा प्रशाखाओं को पल्लवित पुष्पित किया है। इस वर्णित शास्त्र की मुख्य तीन शाखाये हैं- 1. सिद्धांत (गणित), 2. होरा (फलित), 3. संहिता (भूगौलिक तथा राष्ट्रीय फलादेश)। गणित के द्वारा ग्रह ग्रहणादि का प्रत्यक्षीकरण होता है और फलित के द्वारा जन्म से मृत्यु प्रयंन्त समय का सर्वविध तात्विक ज्ञान होता है। इस ज्यौतिष शास्त्र के द्वारा ही तिथि, नक्षत्र, करण, आदि का परिचय प्राप्त होता है। आयुर्वेद विज्ञों के लिये वह शास्त्र महत् उपादेय है, महर्षि चरक ने औषधियों के संग्रह भिषगों द्वारा रसादिक निर्माण तथा आतुरों के चिकित्सोपक्रम के लिये प्रशस्त तिथि करण, मुहूर्त नक्षत्र आदि का उल्लेख कर यह प्रतिपादित किया है कि ज्योतिष शास्त्र आयुवर्गो के लिये सर्वथा सर्वदा उपयोगी है। फलित ग्रन्थों में ज्योतिष के विद्वानों ने भिन्न-भिन्न ग्रह स्थिति से उत्पन्न होने वाले रोगों की उत्पति का उल्लेख कर आयुर्वेद के विद्वानों के लिये रोग निदान में सदैव सहायता दी है।जिस मनुष्य के जन्म समय में चन्द्रमा, शनि और मंगल से नवम में स्थित रहता है और सूर्य मकर राशिस्थ हो तो वह मनुष्य श्वास, क्षय, प्लीहक, गुल्म, विविध इन रोगों में किसी एक रोग से निश्चित रूप से पीड़ित होता है। इसी प्रकार यदि चन्द्रमा दो पापग्रहों के मध्य हो, और शनि सप्तम भाव में स्थित हो तो यह मनुष्य भी पूर्वोदित रोगों से आक्रान्त होता है। इस प्रकार इस पथ में दो योग वर्णित किये गये हैं-
1. जिस मनुष्य के जन्मकाल में छठे अथवा आठवें घर में चन्द्र और शुक्र रहते हैं यह जातक मन्दाग्नि रोग से ग्रसित होता है।
2. जिस जातक के छठे अथवा आठवें स्थान में मंगल सहित चन्द्रमा लग्नविद्ध शनि से दृष्ट हो, वह क्षय रोगी होता है। क्षय रोग जो कभी राजरोग था- आज का दूषित जलवायु और अपुष्टि कारक खाद्य पदार्थो के कारण सामान्य जन रोग हो गया है उसके विषय में दो योग और देखिये-
1. जिस जातक की जन्म कुण्डली में सूर्य ग्यारहवें स्थान में हो और शनि पंचम स्थान में हो वह क्षय रोग से ग्रस्त होता है।
2. जिस जातक के सूर्य लग्न, चतुर्थ अथवा अष्टम् स्थान में हो और शनि, मंगल दशम स्थान में हों तो वह भी क्षय रोगी होता है।

भगंदर, अर्श या वातशूल रोग-
जिस जातक के सप्तम स्थान में सूर्य, भौम और शनिश्चर हों, वह भगन्दर, अर्श वातशूल से पीड़ित होता है।

मधुमेह रोग –
1. जिसके जन्म समय मे सूर्य पंचम स्थान गत हो और शुक्र, शनि जहाँ कहीं भी युक्त स्थिति में हो वह प्रमेह का रोगी होता है।
2. जिसके जन्म समय में सूर्य लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम स्थान में हो तो वह भी प्रमेह रोग से पीड़ित होता है।
3. जिस जातक की कुण्डली में दशम स्थान में मंगल शनिश्चर से युक्त अथवा दृष्ट हो तो वह व्यक्ति प्रमेही होता है।

वातरोग योग :-
जिस मानव के जन्म समय में नवम या पंचम स्थानगत मंगल हो और शनि लग्न में हो तो वह व्यक्ति वातरोग से ग्रसित होता है।

मूत्रकृच्छ रोग-
जिसके जन्म समय में मंगल सप्तम स्थान गत हो तो वह व्यक्ति मूत्र कृच्छ रोग से पीड़ित होता है।

अनेक व्याधि रोग :-
जिसके जन्म समय में शनिश्चर नवम या पंचम स्थानगत हो वह व्यक्ति नाना रोगों से युक्त होता है।

पाण्डु कुष्ठ योगः-
जिसके जन्म समय में मेष राशि में, कर्क राशि में तुला राशि में अथवा मकर राशि में शुक्र चन्द्रमा चतुर्थ स्थान में स्थित हों वह मनुष्य पाण्डु या कुष्ठ रोगी होता है।

इस प्रकार के अनेक योग विशेष जो कि विभिन्न ग्रन्थों में दिये गये है चिकित्सकों के लिये अत्यन्त उपयोगी हैं। प्राणी की अरिष्ट निवृति हेतु तथा क्रूरग्रहों की शान्ति हेतु शास्त्रों में जप शान्ति होम आदि के जो प्रयोग वर्णित किये गये हैं, उनकी जानकारी के लिये भी वैद्यों के लिये ज्यौतिष शास्त्र का ज्ञान परमावश्यक है। दैव व्याश्रित चिकित्सा में इस विधि की परमाश्यकता है।

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