
उपनिषदों में इस विद्या का वर्णन इसलिये हुआ है कि साधारण बुद्धि के लोग पुनर्जन्म में विश्वास करें। सदियों से पुनर्जन्म अनेक तरह से सन्दिग्ध रहा है, इस संसार में बहुत से मनुष्य इस मानव शरीर से भिन्न आत्मा को नहीं मानते। आस्तिकों में भी मतबाहुल्य हैं। इस जीव को भी विभु मानने वाले बहुत से आचार्य हैं, जब आत्मा विभु है, तब इसका परलोकादि में गमन क्यों? ओर वेदान्त में भी बहुत से सिद्धान्त पाये जाते हैं, जिनसे पूर्वजन्म की ही सिद्धि नहीं होती क्योंकि विभु आत्मा का जन्म और मरण कैसे हो सकता हैं? जो सर्वव्यापी आत्मा है, वह अत्यन्त क्षुद्र गर्भ में कैसे समा सकता है? फिर जब एक ही आत्मा है तो मरण अथवा जीवन सर्वथा असम्भव है, क्योंकि अनेकता रहने पर ही जन्म मरण हो सकता है। इसके अतिरिक्त किन्हीं श्रुतियों का तात्पर्य यह है कि यह जीव ईश्वर का प्रतिबिम्ब है। आभास पर जो ईश्वर का प्रतिबिम्ब पड़ता है, वही जीव है अथवा जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब अथवा आभास घटों में पड़े, वैसे ही ब्रह्म का आभास अनतःकरणों में पड़ता है वही जीव कहलाता है। इन दृष्टान्तों से भी पुनर्जन्म की सिद्धि नहीं होती क्योंकि घट के फूटने से घटस्थ बिम्ब किसी अन्य रूप को धारण कर कहीं अन्यत्र नहीं जाता, इस प्रतिबिम्ब की कोई विभिन्न सत्ता ही होती है जैसे पुरूष से भिन्न छाया की भिन्न सत्ता नहीं, दर्पण में मुखादि की जो छाया पड़ती है उसकी सत्ता मुख से पृथक् नहीं, अतः घट फूटने पर सूर्य प्रतिबिम्ब ज्यों का त्यों बना रहता है, तद्वत् ब्रह्म प्रतिबिम्ब जो यह जीव है वह अन्तःकरण के छिन्न- भिन्न होने पर भी ज्यों का त्यों बना रहेगा, कैसे कहीं जायेगा? इत्यादि कारणों से पुनर्जन्म में लोगों का सन्देह न हो, अतः मातृभूता परम कल्याणकारिणी श्रुति पंचाग्नि वर्णन द्वारा पुनर्जन्म का प्रतिपादन करती है।
इस प्रकार शास्त्रों में प्रश्नोत्तर के द्वारा समझाया गया है कि मनुष्य मृत्यु के उपरांत कहां जाता है? इसका उत्तर निम्न प्रकार हैं- मृत्यु के उपरांत मनुष्य की गति 3 स्थान के लिये होती है। कुछ ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मलोक को जाते हैं। द्वितीय कर्मपरायण चन्द्रलोक को जाते हैं। तृतीय सर्वथा जन्म मरण प्रवाह में डूबते और उतरते हैं।
द्वितीय प्रश्न यह पैदा होता है कि वहाँ से पुनः कैसे आत्मा लौट आती है? इसका उत्तर यह दिया गया है कि चन्द्रलोक से आकाश में, आकाश से वायु में वायु से धरती पर इत्यादि।
एक प्रश्न यह है कि देवयान और पितृयान का भेद क्या होता है? इसका उत्तर यह है कि देवयान का पथ अर्चि से आरम्भ होता है और पितृयान गामी उसमें नहीं। चतुर्थ प्रश्न यह है कि ब्रह्मलोक क्यों नही भर जाता। इसका उत्तर यह है कि मरकर सब प्राणी अथवा सब ही मनुष्य ब्रह्मलोक में ही अथवा चन्द्रलोक में ही नहीं पहुँचते, इस हेतु वह लोक नहीं भरता।
आदित्यलोक, कार्यन्य, पृथ्वी, पुरूष ओर स्त्री- ये पांच अग्नि हैं स्त्री रूप अग्नि में जो आहुति दी जाती है, उससे जल पुरूषवाची हो जाता है।
एक पौराणिक कथा इस प्रकार है-
एक समय अरूण गोत्रोत्पन्न श्वेतकेतु नाम का कुमार पांचाल देश के अधिपति प्रवहण नामक नृपति की सभा में आ पहुँचा राजा प्रवहण ने निम्नलिखित पांच प्रश्न उससे पूछे। वे प्रश्न ये हैं-
1- हे कुमार ! यहां से प्रजाएँ ऊपर को जहाँ जाती हैं, उसे क्या तू जानता है?
कुमार – राजन् ! नहीं।
2. प्रवहण- ये प्रजाएँ पुनः जैसे लौट आती है, क्या तू जानता है?
कुमार- नहीं।
3. प्रवहण- देवयान और पितृयान मार्गो का वियोग स्थान जानता है?
कुमार- हे भगवान् ! मैं नहीं जानता।
4. प्रवहण- जिस प्रकार यह लोक नहीं भर जाता, उसको तू जानता है ?
कुमार – हे भगवन् ! में नहीं जानता।
5. प्रवहण- जिस कारण पांचवी आहुति में जल पुरूषवाची होता है, उसे तू जानता है ?
कुमार- नहीं जानता।
तब राजा ने कहा कि विदित होता है कि ‘तेरे पिता ने तुझको अच्छी शिक्षा नहीं दी है।’ एवमस्तु-
तब श्वेतकेतु ने अपने पिता के पास जाकर कहा कि राजा प्रवहण ने मुझ से प्रांच प्रश्न पूछे ओर मैं एक का भी उत्तर न दे सका। पिता पुत्र को साथ ले राजा के निकट जा पहुँचा और कहा कि मुझे आप अग्निविद्या का उपदेश दीजिये।
राजा बोला कि ‘यह विद्या अब तक क्षत्रियों को ही मालूम है, अन्य किसी को नहीं, दूसरे मुझ क्षत्रिय की शिष्यता आप ब्राह्मण होकर कैसे स्वीकार करेंगे?’ गौतम ने कहा कि ‘विद्या जहाँ कहीं से मिले, ग्रहण कर लेनी चाहिये, अतः आज से मैं आप का शिष्य बनता हूँ, मुझे आप उपदेश दीजिये।’
तब राजा ने कहा कि- ‘हे गौतम! यह लोक ही एक अग्नि है, सूर्य उसकी समिधा है, किरणें धूम्र हैं, दिन लपट हैं, चन्द्रमा अंगार हैं, नक्षत्र चिनगारियाँ हैं, इस अग्नि में देवगण श्रद्धा की आहुति देते हैं, इस आहुति से सोमराजा उत्पन्न होता है, यही प्रथम आहुति है।’
हे गौतम! पर्जन्य (मेघ) द्वितीय अग्नि है, उसकी वायु ही समिधा है, अभ्र (एक प्रकार का मेघ), धूम्र, विद्युत् ज्वाला, वज्र अंगार, मेघ शब्द विस्फुलिंग हैं इस द्वितीय अग्नि में सोमराज की आहुति देवगण देते हैं, इसी से वर्षा उत्पन्न होती हैं यही द्वितीय आजाहुति है।
हे गौतम! यह पृथ्वी तृतीय अग्नि है, उसकी संवत्सर ही समिधा, आकाश धूम्र, रात्रि ज्वाला, दिशाएँ अंगार ओर अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिंग हैं। इस अग्नि में देवगण वर्षा की आहुति देते हैं, उस आहुति से अन्न उत्पन्न होता है, यह तृतीय आहुति हुई।
हे गौतम! यह पुरूष चतुर्थ अग्नि हैं, उसकी वाणी ही समिधा, प्राण ध्ूम्र, जिव्हा ज्वाला, चक्षु अंगार ओर श्रोत्र विस्फुलिंग है, इस अग्नि में देवगण अन्न की आहुति देते हैं, उस आहुति से रेतस् (वीर्य) उत्पन्न होता है, इसका ही नाम चतुर्थ आहुति है।
हे गौतम! यह स्त्री पंचम अग्नि इस अग्नि में देवगण रेतस। आहुति देते हैं, उस आहुति से गर्भ उत्पन्न होता है।
हे गौतम! इस प्रकार पाँचवी आहुति में जल पुरूषवाची होता है वह गर्भ नौ या दस मास उल्वावृत हो पेट में रह बालक रूप से उत्पन्न होता है, पुनः अपनी आयुभर सुख दुःख भोगकर मर जाता है, उसको बन्धु बान्धव अग्नि में जला देते हैं, इस प्रकार मानव जीवन का एक चक्र समाप्त हो जाता है, यही अग्निविद्या या पंचाग्नि विद्या है।
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