
ग्रहों में सर्वाधिक शक्तिशाली एवं दैदीप्यमान ग्रह शुक्र है। इस पर दृष्टि पड़ते ही दर्शक ठगा सा रह जाता है और लगभग सम्मोमिहत सा हो जाता है। सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने वाले सब ग्रहों में शुक्र सबसे प्रभावशाली एवं दैदीप्यमान चमकीला है। पाश्चात्य जगत में शुक्र को वीनस पुकारा जाता है। रोम में लोग शुक्र को ‘गाडस ऑफ ब्यूटी एण्ड आर्ट’ कहते हैं। रोम या पश्चिमी देशो में वीनस की जो मूर्तियाँ हैं, वह अत्यंत सुंदर, कोमल अद्वितीय सुडौल, सम्मोहन शक्ति से परिपूर्ण हैं।
इन मूर्तियो में वीनस की प्रतीक लड़की का जो चित्र होता है। उसमें लड़की को यौवन के छलकते हुये सरोवर के समान प्रदर्शित किया गया है। एक कथन के अनुसार शुक्र गुरु और डायना की पुत्री थी। यह अपने पति वल्कान को पूर्णरूप से समर्पित न होकर मंगल के प्रेमपाश में फंस गई। मंगल से कठोरता, दृढ़ता एवं जिद्दीपन मिला। कामदेव इसके पुत्र हैं। यही कारण है कि शुक्र से काम, रोमांस, प्रेम विवाह, सौन्दर्य इत्यादि का अध्ययन किया जाता है। हमारे अनुभव में यही आया है कि ज्योतिष जगत में शुक्र प्रभावित व्यक्ति और मंगल प्रभावित व्यक्तियों में अथाह प्रेम, मोहब्बत, मित्रता रहती है। शुक्र से प्रभावित व्यक्ति बचपन से ही भोग विलास व शृगारिक वस्तुओं में रुचि लेने लगते हैं तथा कई बार उन्हें कुटेव भी पड़ जाती है। जो आगे चलकर हानिप्रद हो जाते हैं। हस्तमैथुन, समलिंगी मैथुन, कृत्रिम मैथुन सब शुक्र प्रभावित व्यक्तियों के कुलक्षण हैं।
शुक्र का रंग सफेद है। शुक्र प्रधान व्यक्तियों को सफेद वस्त्र व सफेद वस्तुएं अधिक भाती हैं। परन्तु हमारे अनुभव में सफेद रंग के साथ-साथ हल्का आसमानी (फिरोजी) रंग भी शुक्र प्रभावित रंग है। उसके अनुसार शुक्र प्रभावित स्त्रियाँ रंग-बिरंगे वस्त्र पहनना पसंद करती हैं।
शुक्र की धातु वीर्य है। शुक्र के बलवान व क्षीणता से ही नपुसंकता, कामोत्तेजक व संतान की संभावनाओं का विचार किया जाता है। उदाहरणार्थ सप्तम भाव में शुक्र व्यक्ति को कामोत्तेजक बनाता है। इसी प्रकार 12वेंं भाव का शुक्र पुरूष को वीर्य की अधिक मात्रा प्रदान करता है। क्योंकि 12 भाव व्यय का होता है। इसी प्रकार छठे भाव में शुक्र की पूर्ण 7वीं दृष्टि 12वें भाव पर रहती है। छठे भाव में शुक्र होने से व्यक्ति खा-पी-कर मस्त सोता है। अर्थात् पूर्ण ऐशो-आराम दिलाता है। जबकि 12वें भाव का शुक्र व्यक्ति को कामोत्तेजक, व्यभिचारी बनाकर बदनामी भी दिला देता है, क्योंकि विद्वानों ने शुक्र का निवास शयन कक्ष (वेश्या) या प्रेमिकाओं के गुप्त स्थान बतलाया है। यही कारण है कि 12, 6वें भावस्थ शुक्र इन स्थानों में वीर्य का व्यय करवायेंगे।
शुक्र वसंत ऋतु का प्रतिनिधित्व करता है। अतः इस ऋतु में शुक्र प्रभावित कार्य, योजनाएं विशेष सफलता प्रदान करती है। शुक्र की दिशा अग्नि कोण है। शुक्र का रस खट्टा है। अर्थात् शुक्र प्रभावित व्यक्ति खट्टी, चटपटी वस्तुओं के परम प्रिय होंगे। मीठी वस्तुओं की अपेक्षा नमकीन मसालेदार चीजों की ओर रूझान अधिक रहता है शुक्र का वर्ण वैश्य वर्ग है? अर्थात् व्यापार लेन-देन शुक्र प्रभावित व्यक्ति नौकरी की अपेक्षा व्यापार में अधिक सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
शुक्र का इष्ट कार्तवीयार्जुन है। परन्तु कुछ लोग शुक्र का इष्ट लक्ष्मी को भी मानते हैं। परन्तु अनुभव व तर्कों के अनुसार कार्तवीर्यार्जुन ही शुक्र के इष्ट ठीक लगते हैं। यजुर्वेद का स्वामी शुक्र वृष व तुला राशियों का स्वामी है। भरणी, पूर्वाफाल्गुनी तथा पूर्वाषाढ़ा इन तीन नक्षत्रों पर प्रभुत्व शुक्र का है। शुक्र की उच्च राशि मीन है। कन्या राशि में यह नीच हो जाता है। शुक्र की बुध, शनि, राहु से मित्रता है तो मंगल, गुरु से वह समभाव रखता है। सूर्य, चंद्र, इसके शत्रु ग्रह हैं। स्थूल रूप से एक राशि पर दो माह विचरण करता है। पूर्व से अस्त एवं पश्चिम में उदय होता है। शुक्र को भृगु, भृगुसुत, काव्य, सित, आच्छ, दानवेज्य, आस्फुजित शृंगारिक गुरु भी कहा जाता है।
शुक्र का स्वभाव अत्यंत सौम्य सरल शान शौकत, भोगी व ऐश्वर्यशाली ढंग से रहने वाला है। शुभ्र वर्ग कद मध्यम, आकृति गोल, सुन्दर व सौम्य नेत्र, रुचिकर एवं स्मरणीय शरीर पतले एवं रस भरे होठ, मधुरवाणी, कोमल हृदय शुक्र प्रधान व्यक्तियों के लक्षण हैं। पाश्चात्य विद्वान तभी तो इसे ळवककमे वि ।तजए सवअमए ठमंनजल ंदक ंजजतंबंजपवद कहते हैं। यही कारण है कि रत्नों में सबसे बहुमूल्य रत्न हीरा इसका प्रतिनिधित्व करता है।
शुक्र प्रधान व्यक्ति अधिकतर कलात्मक वस्तुओं, शृंगारिक एवं कला क्षेत्र में पाये जाते हैं जैसे फिल्मी क्षेत्र या नाटक के क्षेत्र में अभिनेता, संगीतज्ञ, कवि, लेखक, ज्योतिषी, मंत्र-तंत्र शास्त्री, बड़े होटलों के मालिक, सफेद खाद्य पदार्थ बेचने वाले-डिस्ट्रीब्यूटर अनेक वाहनों के स्वामी व डॉक्टर, प्रसाधन विक्रेता, मंत्री, वीर्य एवं पुरुषत्व बढ़ाने वाली औषधि निर्माता व विक्रेता, कण्ठ, कान, गला के व्यवसाय में लगे व्यक्ति शुक्र के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं।
रोमांस में शुक्र का महत्वपूर्ण योगदान है। शुक्र चूंकि शृंगार व भोग विलास का कारक है। इसलिये प्रेम, रोमांस व प्रेम विवाह में इसका विशेष प्रभाव होता है। प्रेम के लिये प्रसिद्ध है कि यह किया नहीं जाता बल्कि हो जाता है। निष्कर्ष यह निकला कि जो प्रेम किया जाता है उसमें वासना का अंश होता है और जो स्वयं हो जाता है उसमें प्रेम के कण होते हैं। वासनायुक्त प्रेमियों में बाधा होना स्वाभाविक ही है। किन्तु प्रेम के पुजारी तो प्रेम में विघ्नों को पार कर प्रेम विभोर हो जाते हैं। प्रेम की तीन श्रेणियाँ होती हैं- सात्विक, प्राकृतिक एवं राजसिक। सात्विक प्रेम- वस्तुओं से अथवा निराकार वस्तुओं में इस प्रकार किया जाये कि उसमें विलीन हो जाये सुध-बुध ही खो जाये और शून्य हो जाये इसे सात्विक प्रेम कहेंगे। जो प्रेम मानव या मानव द्वारा निर्मित वस्तुओं में किया जाये वह प्रेम मोह या लगाव प्राकृतिक प्रेम कहलाता है। राजसिक प्रेम में- पुरुष या स्त्री अपनी पत्नी/पति व संतान से जो प्रेम करते हैं वे प्रेम रजो गुण से प्रेरित होता है अर्थात राजसी है।
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