कामना सिद्धि शाबर प्रयोग

कामना सिद्धि शाबर प्रयोग

इस शाबर मंत्र में काली तथा भैरवदेव से साधक प्रार्थना करता है कि मेरी इच्छित मनोकामना पूर्ण करें।
इस मंत्र साधना की यह विशेषता है कि इस मंत्र का प्रयोग यदि विधि-विधान पूर्वक किया जाये, तब संम्बंधित देवी-देवता साधक की प्रमुख मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं।

विधि विधान- होली, दीपावली (काल-रात्रि) अथवा ग्रहण काल के समय चौमुखा दीपक जलायें। त्रि-खूँटा चौका लगाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। कनेर के फूल, लड्डू, सिन्दूर, लौंग-जोड़ा और पुष्प-माला सामने रखें। उक्त मंत्र का जप एक हजार की संख्या में करके, दशांश हवन करें। इस प्रकार यह मंत्र सिद्ध होता है। मंत्र सिद्धि होने पर गुरू से आर्शिवाद ग्रहण करें। जब आवश्यकता हो, तब इच्छित कामना हेतु गुरू आज्ञा लेकर मंत्र की 1 माला जपकर काली तथा भैरवदेव से कार्यसिद्धि की प्रार्थना करें, तो वह कामना अवश्य पूर्ण होती है।
ऊँ काली, कंकाली महा-काली के पुत्र कंकाल-भैरूँ ! हुकुम हाजिर रहे ! मेरा भेजा काल करे, मेरा भेजा रक्षा करे। आन बाँधूँ, वान बाँधूँ, चलते फिरते औसान बाँधूँ, दसो सुर बाँधूँ, नौ नाड़ी बहत्तर कोठा बाँधूँ।

फल में भेजूँ, फूल में जाय। कोठे जो पड़े, थर-थर काँपे, हल-हल हले, गिर- गिर पड़े। उठ-उठ भागे, बक-बक बके।
मेरा भेजा सवा घड़ी, सवा पहर, सवा दिन, सवा मास, सवा बरस कूं बावला न करे, तो माता काली की शय्या पर पग धरे। वाचा चूके, तो उमा सूखे। वाचा छोड़, कुवाचा करे, तो धोबी की नाँद-चमार के कुण्ड में पड़े।

मेरा भेजा बावला न करे, तो रूद्र के नेत्र की ज्वाला कढ़े, शिर की लटा टूटि भूमि में गिरे, माता पारवती के चीर पर चोट पड़े। बिना हुकुम नहीं मारना हो, तो काली के पुत्र कंकाल-भैरौ। फुरो मन्त्र-ईश्वरो वाचा । सत्य नाम, आदेश गुरू का।

भूत प्रेत निवारक शाबर मंत्र-
ं कुछ ऐसे कीटाणु होते हैं, जिन्हें प्राचीन तंत्र ग्रन्थों में भूत-प्रेत के नाम से उल्लेखित किया गया है। जब ये कीटाणु किसी निर्बल मन वाले मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं, तब इन दूषित कीटाणुओं के कारण उस दुर्बल मन वाले शरीर में कुछ मानसिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं, तब वह व्यक्ति अस्वाभाविक बातें करने लगता है, जो साधारण मनुष्य को विचित्र लगती है। (जैसी भूत-प्रेत-बाधा होने पर देखी जाती हैं।) प्रायः स्त्रियों को यह रोग अधिक होता है। जब किसी स्त्री को यह भूत-रोग लग जाता है, तो वह मूर्च्छित हो जाती है, अनाप-शनाप बकने लगती है, उसके अवचेतन मन में पुरानी बातें स्मरण हो आती हैं। ऐसी दशा में देव-बाधा, प्रेत-बाधा अथवा पागलपन समझकर लोग उसका उपचार करते हैं।
पुरूष या स्त्री किसी को भी यदि उक्त भूत-रोग हो जाये, तो उसे सामने बैठाकर अथवा चारपाई पर लिटाकर उक्त मंत्र से हवन कर मंत्र पढ़ते हुये भस्म से फूँक मारकर उसके मस्तक और हृदय में भस्म लगानी चाहिये।

अथवा भोजपत्र पर चन्दन से अनार की कलम द्वारा उक्त मंत्र लिखकर इसी मंत्र से हवन करके भोजपत्र को हवन के धुँऐं से धूपित कर ताँबे की ताबीज में धारण करना चाहिये।

ऊँ हृं भ्रीं फट् स्वाहा। परबत- हंस, परबत-स्वामी ! आत्म-रक्षा सदा भवेत्। नौ नाथ, चौरासी सिद्ध्या की दोहाई। हाथ में भूत, पाँ में भूत, भभूत मेरा धारण। माथे राखो अनाड की जोत, सबको करो सिंगार। गुरू की शक्ति, मेरी भक्ति, फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा, दोहाई भैरव के।

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