श्री हनुमान जयंति

श्री हनुमान जयंति

हनुमान जयंती पंचांगो में दो बार क्यों? कारण और निवारण-
पंचांगों के आधार पर व्रतों का निर्णय किया जाता है उनमें हनुमान जयंती दो दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (रूप चतुर्दशी) और शुक्ल पूर्णिमा को दर्शायी जाती है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि हनुमान जयन्ती किस दिन मनाई जाये? आईये इस निष्कर्ष से पूर्व पहले यह जान लें कि हमारे शास्त्र इस विषय में क्या घोषणा करते हैं-
उत्सव सिन्धु में हनुमान जी का जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी मंगलवार को वर्णित है-

उर्जस्य चासिते पक्ष स्वात्यां भौमे कपीश्वरः। मेषलग्रे´नीगर्भाच्छिवः प्रादुरभूत स्वयम्।।

अर्थात्ः- कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी, मंगलवार, स्वाति नक्षत्र और मेष लग्न में अन्जनी के गर्भ से हनुमान जी के रूप में स्वयं उत्पन्न हुए।

व्रत रत्नाकार में भी इसी से मिलती हुई बातें लिखी हैं :-

कातिकस्यासिते पक्षे भूतायां च महानिशि। भौमवारेऽ´ना देवी हनमन्तजीजनत्।।

अर्थात्ः- कार्तिक कृष्ण की भूत तिथि (चतुर्दशी) मंगलवार के दिन महानिशा में अन्जना देवी ने हनुमान जी को जन्म दिया था।
वाल्मिकी रामायण मैं हनुमान जी के जन्म की जानकारी किष्किन्धा काण्ड़ के छाछठवें सर्ग में इस प्रकार दी गई है- जाम्बवान् ने समुद्र लांघने के समय हनुमान जी को उनका बल याद दिलाने के लिए कहा- वीर वर! तुम्हारे प्रदुर्भाव की कथा इस प्रकार है- पु´कस्थला नाम से विख्यात जो अप्सरा है वह समस्त अप्सराओं में अग्रगण्य है। तात् एक समय शापवश वह कपि (वानर) योनि में अवतीर्ण हुई। उस समय वह वानरराज महायशस्वी कुन्जन की पुत्री इच्छानुसार रूप धारण करने वाली थी। इस भूतल पर उसके रूप की समानता करने वाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह तीनों लोकों में विख्यात थी। उसका नाम अन्जना था वह वानर राज केसरी की पत्नी हुई। पवन देव ने प्रसन्न होकर मानसिक संकल्प के द्वारा तुम्हारी उत्पत्ति की। पवन देव ने यह भी वर दिया कि तुम महान् धैर्यवान, महातेजस्वी, महाबली, महापराक्रमी तथा लांघने और छलांग मारने में मेरे समान ही होंगे। इस ऐतिहासिक पुस्तक में हनुमानजी के जन्म का समय, माह, दिन आदि नहीं दिया गया है।

श्रीहनुमानजी की एक जन्मपत्रिका भी देखने को मिलती है। उसमें पाँच ग्रह अपनी उच्चराशि पर स्थित है। जनमपत्रिका में माह आदि का उल्लेख तो नहीं है लेकिन कुछ विद्वानों ने निष्कर्ष रूप में जन्मपत्रिका के आधार पर कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को ही हनुमानजी का जन्मदिन माना है।

स्कन्द एवं भविष्योत्तर पुराणों में हनुमान जी के जन्म की जानकारी इस प्रकार दी गई है- केसरी की पत्नी अंजना अनपत्य दुःख से दुःखी होकर मतंग ऋषि के पास जाकर रोती हुई कहने लगी- मुनी! मेरे पुत्र नही है आप कृप्या पुत्र प्राप्ति का कोई उपाय बताईये। तब मतंग ऋषि ने कहा- पम्पा सरोवर से पूर्व दिशा में पचास योजन पर नरसिंहाश्रम है। उसकी दक्षिण दिशा में नारायण गिरि पर स्वामी तीर्थ है उसमें एक कोस उत्तर में आकाश गंगा तीर्थ है, वहां जाकर उसमें स्नान करके द्वादश वर्ष तक तप करने से तेरे गुणवान पुत्र उत्पन्न होगा। मतंग के ऐसा कहने पर नारायणगिरि पर गयी, स्वामी पुष्करिणी में स्नान किया और अश्वत्थ की प्रदक्षिणा एवं वराह भगवान को प्रणाम करके आकाश गंगा तीर्थ में रहने वाले मुनियों एवं अपने पति की आज्ञा लेकर उपवास करती हुई बाहृ भोग छोड़कर तप करने लगी। इस प्रकार तप करते पूरे बारह वर्ष बीत गए, तब वायु देवता ने प्रसन्न होकर उसे पुत्र होने का वरदान दिया। परिणामस्वरूप अंजना ने एक उत्तम पुत्र को जन्म दिया, जिस का नाम मुनियों ने हनुमान रखा।

उक्त पुराणों में भी जन्म का विवरण आदि नहीं दिया गया है। इसके विपरीत अनेक पौराणिक गं्रथों में हनुमानजी का जन्म चैत्र मास की पूर्णिमा को बताया गया है। हनुमदुपासना कल्पद्रूम में लिखा है-

चैत्र मासि सिते पक्षे पौर्णामास्यां कुजेऽहनि। मौज्जीमेखलया युक्तः कौपीनपरिधारकः।।

अर्थात् चैत्र शुक्ला पूर्णिमा मंगलवार के दिन मूँज की मेखला से युक्त कौपीन से सयुक्त और यज्ञोपवीत से भूषित हनुमानजी का जन्म हुआ था।
आनन्द रामायण भी घोषणा करती है कि- चैत्रमासि सिते पक्षे हरिदिन्यां मद्याभिद्ये। नक्षत्रे स समुत्पन्नो हनुमान् रिपसूदनः।। महाचैत्रीपूर्णिमायां समुत्पन्नोऽव्जीनीसुतः, वदन्ति कलपभेदेन बुधा इत्यादि केजन।।

अर्थात्- चैत्र शुक्ला एकादशी के दिन मघा नक्षत्र में शत्रु सूदन हनुमानजी का जन्म हुआ था। कुछ विद्वान कल्पभेद से चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमानजी का जन्म बतलाते हैं।

निष्कर्षः कुछ लोग कार्तिक कृष्ण अमावस्या, कुछ चैत्र शुक्ल पूर्णिमा तो कुछ चैत्र शुक्ल एकादशी को हनुमानजी का जन्म दिन मानते हैं। किसी जगह मंगलवार तो किसी जगह शनिवार लिखा है। वैसे तो प्रभु की सभी तिथियाँ पुण्यमयी एवं श्रेष्ठ हैं। कहा भी गया है कि- जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी। यानि जैसी जिसकी भावना हो उसी के अनुसार उन्हें भगवान् का रूप दिखाई देता है। भावना निर्मल हो तो दयालु भगवान उसी दिन प्रसन्न होकर भक्ति भाव को अवश्य स्वीकार करेंगे। फिर भी यदि देशकाल एवं द्विजजन की मान्यता पर विचार करें तो हमें पता चलेगा कि विजयदशमी जिस दिन भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी तथा उसके बाद दीपावली, जब भगवान राम का अयोध्या आगमन पर स्वागत किया गया तथा दीप जलाये गए, उसके एक दिन पूर्व ही रूप चतुर्दशी पड़ती है अतः इस दिन को (लंका विजय के पश्चात् यह पर्व होने के फलस्वरूप) विजय महोत्सव एवं चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को हनुमानजी का जन्मदिन मानना शास्त्र सम्मत एवं उचित होगा। जयपुर एवं भारत के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों में भी चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को ही हनुमान जयंती मनाई जाती है।

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